शनिवार, 25 अक्टूबर 2014

प्रवासी कथाओं में स्त्री-विमर्श

संपादक आदरणीय सुधा ओम ढ़ींगरा तथा अतिथि संपादक डॉ. सुशील सिद्धार्थ द्वारा संपादित हिन्दी-चेतना (अक्टूबर-दिसम्बर 2014) के 'कथा आलोचना विशेषांक' में मेरा यह लेख प्रकाशित हुआ है -


प्रवासी कथाओं में स्त्री-विमर्श



हिन्दी साहित्य के आँचल में जहाँ एक ओर स्त्री-विमर्श, दलित-विमर्श, आदिवासी विमर्श, अल्पसंख्यक विमर्श आदि के बेल-बूटे दिखाई दे रहे हैं, वहीं प्रवासी विमर्श भी उभर कर चमकने लगा है।  अपनी चमक के साथ ही प्रवासी साहित्य के लिए प्रवासी कहलाने और न कहलाने पर बहस छिड़ गई है। प्रवास में लिखा गया साहित्य प्रवासी साहित्य है, जिसे मुख्य धारा का साहित्य अपने में कहीं- कहीं से चुन कर सम्मिलित कर लेता है, और प्रायः उसे मुख्यधारा का साहित्य समझ लिया जाता है। किन्तु सत्य तो यह है कि प्रवासी साहित्य आज व्यापक रूप धारण कर चुका है और उनमें से कुछेक रचनाओं का मुख्यधारा में शामिल हो जाना पूरे प्रवासी साहित्य का प्रतिनिधित्व नहीं कर सकता। इसलिए प्रवासी को पहले प्रवासी बनकर ही संघर्ष करना होगा, तत्पश्चात्  मुख्यधारा के साहित्य में सम्मिलित होने के लिए हाशिए को मिटाना होगा, जो अचानक संभव नहीं। यह भी ध्यातव्य है कि मुख्य धारा का साहित्य अपने माँ-बाप के घर अर्थात् हिन्दी क्षेत्रों में पला-बढ़ा है और प्रवासी साहित्य अनाथ की तरह। इसलिए भाषिक शुद्धता-अशुद्धता का प्रश्न भी निरर्थक है। जिस प्रकार अन्य विमर्शों ने अपनी-अपनी पहचान बनाने के लिए अपने नाम के साथ अधिकारों की माँग कर रहे हैं, उसी प्रकार प्रवासी को प्रवासी कहना और उनका अधिकार माँगना अनुचित नहीं होगा और अधिकार प्राप्ति के बाद हाशिए की लकीर प्रवासी नाम संभवतः खत्म भी हो जाए।       
      प्रवासी साहित्य की खास विशेषता है कि प्रत्येक सुख-सुविधाओं के साथ-साथ विदेशी भूमि पर देशी चूल्हा जलने से घर की रोटी की सुगंध आती है तथा यह भी ध्यान रखने योग्य बात है कि परायी  भूमि को कर्मक्षेत्र बना लेने से न तो घर की रोटी की सुगंध भूली जा सकती है और न ही पराया समाज और संस्कृति अपना लेने से अपनी मातृभूमि के प्रति प्रेम समाप्त हो सकता है एवं न ही अपनी देशी आत्मा विदेशी में परिवर्तित हो सकती है। इसलिए बार-बार इन साहित्य पर नॉस्टेल्जिया का आरोप भी लगता रहा है। कदाचित् यहीं से शुरू होती है मूल्यों की टकराहट और उससे उत्पन्न होने लगती हैं सामाजिक-सांस्कृतिक समस्याएँ; जिससे आहत होने लगती हैं संवेदनाएँ। इसीलिए स्वच्छंद पाश्चात्य के खुली छतरी के नीचे भारतीय संवेदनाएँ अपना पर फैलाने से पहले ही स्वयं में सिकुड़ जाती हैं। इससे तीन स्थितियाँ उत्पन्न होती हैं :पहला पाश्चात्य संस्कृति के अनुरूप ढल जाना, जिससे पूर्व मूल्यों का विघटन और नए मूल्यों का निर्माण होता है। दूसरा भारतीय एवं पाश्चात्य संस्कृति और मूल्यों में सामंजस्य बनाकर आगे बढ़ना; जिससे जीना आसान हो जाए और तीसरा पाश्चात्य मूल्यों को स्वीकार न कर पाना, जिससे निराशाजनक स्थिति से तंग आकर भग्नाशा का शिकार हो जाना; जो कि विकृत्त रूप धारण कर लेता है अथवा विद्रोही बन जाना; ताकि परिस्थितियाँ बदल सकें। और ये तीनों ही स्थितियाँ प्रवासी साहित्य में दृष्टिगत होती हैं।
         प्रवासी साहित्य की सबसे विशिष्ट बात यह है कि वहाँ महिला साहित्यकारों की भागीदारी पुरुष साहित्यकारों से अधिक है तथा वह भारतीय महिला लेखन की भाँति हाशिए पर नहीं खड़ा है, और न ही किसी एक बनी-बनायी परिपाटी को लेकर चल रहा है, बल्कि अपनी विषय वैविध्यता के कारण मुख्यधारा में सम्मिलित है। यह मात्र स्त्री संवेदना को ही व्यक्त नहीं करता बल्कि पाश्चात्य परिवेश में जूझ रहे प्रत्येक व्यक्ति की संवेदना को स्वर प्रदान करता है, इनमें बच्चे, बूढ़े, पुरुष, समलैंगिंक, अंतर्नस्लीय, उच्चवर्गीय, मध्यवर्गीय व्यक्ति एवं परिवार तथा मस्तमौले विदेशी भिखारी भी परिवेशगत स्थान पाते हैं। भारत में महिला-लेखन अभी चौखट पार कर रहा है, किंतु प्रवास में महिला लेखन भूमंडल में टहल रहा है । वह देख रहा है वहाँ के सच्चाइयों को, मूल्यों को, यथार्थ को और ढ़ूँढ़ रहा है संवेदना का अंतःसूत्र ।
        प्रवासी महिला कथाओं में अनेक रचनाकारों के नाम हैं
        अमेरिका से सुषम बेदी, सुदर्शन प्रियदर्शिनी, अनिल प्रभा कुमारसुधा ओम ढींगरारेनूराजवंशी गुप्ता, पुष्पा सक्सेनाप्रतिभा सक्सेना, इला प्रसादरचना श्रीवास्तव एवं आस्था नवल।
        कैनेडा से शैलजा सक्सेना, रीनू पुरोहित। 
        ब्रिटेन से ज़किया ज़ुबैरी, दिव्या माथुर, उषा राजे सक्सेना, अचला शर्मा, शैल अग्रवाल, नीना पॉल, उषा वर्मा, कादम्बरी मेहरा, कविता वाचक्नवी एवं नीरा त्यागी।
        संयुक्त अरब अमीरात से पूर्णिमा वर्मन।
        कुवैत से दीपिका जोशी।
        डेनमार्क से अर्चना पेन्यूली।
        फ्रांस से सुचिता भट्ट।
        ऑस्ट्रेलिया से- रेखा राजवंशी।
        नीदरलैंड- पुष्पिता अवस्थी। 
        चीन- अनीता शर्मा। 
        इन लेखिकाओं के साहित्य का अध्ययन करने से स्पष्ट होता है कि भूमंडलीकरण के हाहाकार में बढ़ती यांत्रिकता और मनुष्य की संवेदनहीनता ने इन्हें अंदर से झकझोर दिया है, जिससे इन्होंने अपनी जड़ों को मज़बूत बनाते हुए मन की अथाह गुफा में भारतीय मूल्यों का पुनर्मूल्यांकन एवं पुनर्स्थापित किया है । विषय-वैविध्यता तथा एक ही विषय में संवेदना की वैविध्यता का उदाहरण इनकी कहानियों में साफ़-सुथरा एवं सुन्दर ढंग से प्रस्तुत हुआ है । सुदर्शन प्रियदर्शिनी की कहानी अखबारवाला’, सुषम बेदी की अवसानअथवा सुधा ओम ढींगरा की कमरा नं. 103’, तीनों ही कहानियों का संदर्भ अलग है पर विषय मृत्यु है। भारत के गाँव-घर में अचानक किसी के घर आटा-दाल माँगने के बहाने पहुँचना और घंटों बैठकर पड़ोसियों के साथ गलचऊर कर लेना अथवा जाड़े की रातों में आग के अलाव के सामने बैठकर बतिकही कर लेना एक सामान्य सी बात है, किंतु विदेश में फ़ोन किए बिना, वह भी उनकी प्राइवेसी को बिना नुकसान पहुँचाए, किसी के घर जाना संभव नहीं । भारत में अपने बेटे से मार खाकर पड़ोसी के घर में जाकर रो आना और सहानुभूति के तौर पर खाना भी खा लेना एक सामान्य सी बात है, परंतु कमरा नं. 103’ की मिसेज वर्मा परदेश में एकदम अकेली हो जाती हैं क्योंकि बेटा-बहु घर में लगे जाले की तरह उन्हें उतार फेंकते हैं, जिससे उनके जीवन का उद्देश्य समाप्त हो गया । भाषा की भीषण परेशानी तो बिना बात किए खत्म हो ही नहीं सकती और बिमारी की हालत में बार्नज अस्पताल में पहुँचा दी जाती हैं। उनकी जिन्दगी की सुरक्षा कोमा जैसी बिमारी करती है, अस्पताल में नर्सें ही उनकी अपनी हैं। बेटा-बहु तो कभी उनकी सलामती जानने भी नहीं आते। अवसानकहानी में मृतक के इच्छा का अवसान है तो अखबारवालाकी कहानी भारतीय संस्कारों से बिल्कुल ही भिन्न। भारत में त्योहार उत्सवों की भाँति मृत्यु संस्कार में पास-पड़ोस के लोग ही नहीं बल्कि गाँव-गड़ा सब एक साथ रोते-धोते हैं । यही नहीं तेरहवीं तक मृतक के परिवार वालों का खयाल पास-पड़ोस और रिश्तेदार रखा करते हैं । किन्तु अखबारवालाकहानी में मृतक का मरना भी पर्सनल प्रॉबलम है । ये कहानियाँ स्वतः ही अभिमन्यु अनत की कहानी मातम पुरसीतथा तेजेन्द्र शर्मा की कहानी पासपोर्ट के रंगऔर क़ब्र का मुनाफ़ाका स्मरण करा जाती हैं। 'मातम पुरसी' और 'क़ब्र का मुनाफ़ा' कहानियों में मृत्यु एक घटना है, मृत्यु में भी फायदा नुकसान देखा जा सकता है। 
इला प्रसाद की कहानी ई-मेलऔर एक अधूरी प्रेमकथाअपने आप में संचार और हॉस्टल की कहानी को समेटते हुए आधुनिक युग की क्षणिक अनुभूति की कहानी है । सुधा ओम ढींगरा की और बाड़ बन गईतथा कौन सी ज़मीन अपनीप्रवासी संवेदना को समेटती है तो वह कोई और थीमें पुरुष-विमर्श, ‘दृश्य भ्रममें अपराध बोध से भरे पुरुष की संवेदना को दर्शाती है। पूर्णिमा वर्मन की कहानी उड़ानउत्तर-आधुनिक परिवेश को दर्शाती है।
        किंतु यदि मात्र स्त्री-विमर्श को ध्यान में रखा जाए तो प्रवासी साहित्य में स्वानुभूति और सहानुभूतिपरक साहित्य समान रूप दृष्टिगत होता है । सहानुभूतिपरक साहित्य में तेजेन्द्र शर्मा की कहानी देह की कीमत’, गौतम सचदेव की आकाश की बेटी’, सुमन कुमार घई की सुबह साढ़े सात से पहलेआदि कहानी तथा स्वानुभूतिपरक साहित्य में सुषम वेदी का उपन्यास हवन’, ‘लौटना’, सुदर्शन प्रियदर्शिनीका उपन्यास न भेज्यो बिदेसआदि तथा कहानियों में ज़किया जुबैरी की कहानी सांकल’, ‘मेरे हिस्से की धूप’, सुधा ओम ढींगरा की कहानी आग में गर्मी कम क्यों है’?, ‘टारनेडो’, ‘क्षितिज से परे…’, ‘बेघर सच’, सुषम बेदी की काला लिबास’, ‘तीसरी दुनिया का मसीहा’, ‘सड़क की लय’, उषा वर्मा की सलमा’, अनिल प्रभा कुमारी की घर’, पुष्पा सक्सेना का विकल्प कोई नहीं’, सुदर्शन प्रियदर्शिनी की धूप’, अचला शर्मा की चौथी ऋतु’, नीरा त्यागी की माँ की यात्रा’, दिव्या माथुर की सफ़रनामाआदि प्रमुख हैं।
        इन कहानियों में स्त्री का यथार्थ प्रमुख रूप से तीन रूपों में सामने उभर कर आया है
        • भारतीय संस्कारों का आत्मसातीकरण
        • मानवीय संवेदना और मानवीय मूल्यों की खोज
        • अस्मिता के प्रति जागरूक

भारतीय संस्कारों का आत्मसातीकरण – 
        भारतीय परिप्रेक्ष्य में स्त्री-विमर्श धर्म, नैतिकता तथा दैहिकता के दायरे से बाहर निकलने के लिए फड़फड़ा रहा है क्योंकि भारतीय संस्कार स्त्री-जीवन में नीर-क्षीर की भाँति इस प्रकार रच-बस गया है। सिमोन द बोउवार का कथन स्त्री स्त्री पैदा नहीं होती, बनाई जाती है, भारत में विशेष रूप से चरितार्थ है। कदाचित् यही कारण है कि भारतीय महिलाएँ विदेश में अपने संस्कारों को भूल नहीं पातीं। न भेज्यो विदेसकी नायिका रत्ती और गुरमीत बिशन सिंह से प्रदत्त षड़यंत्रों से उत्पन्न समस्याओं से निरंतर जूझते हुए भी पति-परमेश्वर की अवधारणा से मुक्त नहीं हो पाती और मूक बनकर जीवन गुज़ारती है। रत्ती को जब अपने साथ हुए धोखे की बात समझ में आती है कि तब वह लड़ने झगड़ने के बजाय खामोशी के साथ अपने पति प्रीतम से विमुख होने लगती है, किंतु प्रीतम के प्रति अनन्य प्रेम उसे पुनः वापस लौटने हेतु विवश कर देता है। हवनउपन्यास की नायिका गुड्डो अमेरिका में रहने के पश्चात् भी दिग्भ्रमित नहीं होती। उसकी सारी शक्ति, संस्कार, नैतिकता और मूल्य मानो हवन से ही अर्जित होती है, जिससे परिवार-कल्याण की कामना पूर्ण हो जाती है। वकील साहब गुड्डो का सहारा लेकर अमेरिका में सपरिवार बसना चाहते हैं, इसीलिए वे गुड्डो की चापलूसी भी करने से नहीं थकते और अमेरिका पहुँचते ही उसे गले से लगाते हुए अपने प्रेम का इज़हार करते हैं। उस समय वह उन्हें झटकते हुए बोलती है, “आप क्या समझते हैं, यहाँ आकर मैं कुछ और हो गई हूँ। मेरी वैल्यूज़, मेरे संस्कार बदल गए हैं... आपकी वहाँ कभी ऐसी हिम्मत नहीं हुई थी और यहाँ मेरे घर में ही आप मेरे मेहमान बनकर लूट रहे हैं... मैं लिहाज और मुरव्वत बरतती रही पर आपने सच में समझा कि यहाँ के माहौल ने मुझे बदल दिया है। जिस आज़ादी की मैं बात कर रही थी...आपने उसे जिस्मानी आज़ादी भर ही समझ लिया। जितने हिन्दुस्तानी मर्द मिलते हैं, सोचते हैं चूँकि अमरीका में रह रही है इसलिए ज़रूर कुछ लूज़ या लिबरल हो गई होगी... उनका रवैया वही होता है जो इस वक्त आपका है
         - (कौर, गुरप्रीत. सुषम बेदी के कथा साहित्य में प्रवासी भारतीय समाज के विविध पक्ष. पृ. 111-112. (बेदी, सुषमः हवन, (1996) पृ. 141)
         ‘सांकलकी नायिका सीमा की आत्मा अपने पुत्र को पाश्चात्य रंग में ढलते देखकर आहत होती है। टारनेडोकी भारतीय संस्कारों से पूरित वंदना अपनी बेटी सोनल तथा उसकी सहेली क्रिस्टी जो जैनेफर की बेटी है, को भारतीय संस्कार प्रदान करती है तथा विदेश की चमक-दमक में पथभ्रष्ट होने से बचाने का प्रयास करती है । 
          इस प्रकार ये नायिकाएँ स्वच्छंद विदेशी परिवेश में भी संस्कारों से विमुख नहीं होती बल्कि विदेश में जाकर 'बिगड़ने' वाली अवधारणाओं को तोड़ती हैं ।
 
मानवीय संवेदना एवं मानवीय मूल्यों की खोज-
          भारत में स्त्री विमर्श का संघर्ष चौखट से बाहर निकलने के लिए है किन्तु प्रवासी कहानियों में स्त्री-विमर्श चौखट से बाहर निकलने के पश्चात् वर्चस्ववादी मानसिकता तथा भारतीय एवं पाश्चात्य मूल्यों के टकराहट के कारण है। भारत में स्त्री-विमर्श प्रेम, परिवार और विवाह की ओर लौट रहा है, जिसके प्रमुख समर्थक अनामिका, कात्यायनी, सुशीला टाकभौरे आदि साहित्यकार हैं, लेकिन प्रवासी स्त्री-विमर्श परिवेशगत प्रभाव के कारण चारों दिशाओं में गोते लगा-लगाकर मानवीय मूल्यों की तलाश कर रहा है, हालाँकि यह भी अपने भारतीय संस्कारों से आगत है। इनके स्त्री-विमर्श की दिशाएँ अलग-अलग दृष्टिगत होती हैं। प्रेम, प्रजनन और परिवार की कामना करते हुए भी संस्कारों के विपरीत परिवेश और परिस्थिति के कारण मूल्यों की टकराहट से सारी परिस्थितियाँ गड्ड- मड्ड सी हो जाती हैं, परिणामस्वरूप निराशा, कुंठा, पीड़ा, संत्रास का जन्म होता है।
         ‘सांकलकी नायिका सीमा चाहकर भी अपने पाश्चात्य प्रभावित पुत्र समीर में अपने लिए बचपन वाला प्रेम नहीं ढूँढ़ पाती तथा अपनी ममता को नियंत्रित करने का प्रयास करती है। हवनउपन्यास में गुड्डो को डॉ. जुनेजा से प्रेम करने के पश्चात् पता चलता है कि वह भारतीय नारियों का प्रेम के नाम पर शोषण करता है, इसलिए वह पुनः अपने अकेलेपन की दुनियाँ में लौट आती है। अनुज का कई स्त्रियों के साथ संबंध होने से तनिमा व्यग्र हो जाती है और संबंध-विच्छेद का फैसला करती है। तीसरी दुनिया का मसीहाकी नायिका अपने पति से बेहतर ब्रूनो को संवेदनशील समझ कर उससे प्रेम करने लगती है और उसे ही अपना भगवान् मान बैठती है, लेकिन ब्रूनो का अंधविश्वास पुनः नायिका को यथार्थ के धरातल पर ला पटकता है। न भेज्यो बिदेसमें पैसे और शोहरत की लालच में बहके बिशन सिंह में संवेदना रत्ती की मृत्यु के पश्चात् जगता है। क्षितिज से परे...की नायिका सारंगी को अपने पति सुलभ का तथा धूपकी नायिका रेखा को अपने पति का यानी दोनों नायिकाओं को अमरीका में कदम रखते ही उनकी संवेदनहीनता का आभास हो जाता है। अंततः विवश होकर तलाक का फैसला करना पड़ता है। 
       कुछ कहानियों में संवेदनहीनता ही है जो विदेश की धरातल पर रिश्तों में खटास पैदा कर देती है, तो कुछ कहानियों में संवेदना को ढूँढ़ते हुए पड़ोसी मृतक अखबारवाले के शव तक पहुँचना और सभी में संवेदनहीनता देखकर आँखें नम किए वापस लौट जाना सुदर्शन प्रियदर्शिनीका संवेदना उड़ेलकर लिखने का परिचायक है।
       आश्चर्यजनक बात यह है कि किन्हीं कहानियों में विदेशी परिवेश में भी बच्चों का वहाँ के अनुसार समाजीकरण नहीं हो पाता और वे मानवीय मूल्यों की तलाश में पलायन कर जाते हैं। टारनेडोकी क्रिस्टी को अपनी माँ का बॉयफ्रेंड बदलते रहना पसंद नहीं आता तथा आख़िरी बॉयफ्रेंड केलब की कूदृष्टि माँ-बेटी दोनों पर होने से वह घर छोड़ने के लिए विवश हो जाती है। काला लिबासकी कैशोर्य मन अनन्या नस्लीय भेद तथा राष्ट्रीय भेद होते देखकर भारतीय मूल्यों के प्रति जिज्ञासु हो जाती है तथा किसी से सही उत्तर न मिल पाने के कारण विक्षिप्त-सी और उदण्ड होने लगती है, अंततः पलायन कर जाती है।
        लेकिन कुछ कहानियों में नए मूल्यों की तलाश में नायिकाएँ विकल्प भी ढूँढ़ती हैं । पुष्पा सक्सेना की कहानी विकल्प कोई नहींमें बेटे की मृत्योपरांत सास नहीं चाहती कि उसकी बहू आजीवन वैधव्य का श्राप झेलती रहे, बल्कि वह बहू का पुनर्विवाह भी करवाती है तथा अतीत में डूबी बहू को शिक्षा देती है कि दूसरा पति, पहले का विकल्प नहीं हो सकता  -(
www.pravasiduniya.com/nri-literature-and-woman-dr.anita-kapoor-america, 7 March, 2012. (प्रवासी कथा साहित्य और स्त्री - डॉ. अनीता कपूर (महिला दिवस पर विशेष)
         प्रैक्टिकल दुनियाँ के धागे में ऐसा भावनात्मक रिश्ता प्रवासी साहित्य ही पिरो सकता है। डॉ. प्रीत अरोड़ा अपने लेख प्रवासी साहित्य की कहानियों में यथार्थ और अलगाव के द्वन्द्वमें लिखती हैं – “आज भारत में लिखी जा रही अधिकांश हिन्दी कहानी स्त्री-विमर्श के नाम पर दैहिक विमर्श करती नज़र आती है । जबकि प्रवासी कहानियाँ मानवीय यथार्थ के भीतर मूल्यों की तलाश करती नज़र आती हैं। - (
himalin.com/himalininews/प्रवासी -साहित्य-की-कहानी.html?source=refresh, 12 jan, 2014, डॉ. प्रीत अरोड़ा प्रवासी साहित्य की कहानियों में यथार्थ और अलगाव के द्वन्द्व,)

अस्मिता के प्रति जागरूक -
        प्रवासी कथाओं में नारी के तीन रूप उभरकर सामने आए हैं । पहला, पाश्चात्य परिवेश में इस प्रकार ढल जाना कि नारी का विकृत रूप दर्शाता है अथवा पाश्चात्य परिवेश की विकृतता पाठकों के सामने आती है, जैसे टारनेडोकी जैनेफर या काला लिबासमें अनन्या की माँ, जो अपने मूल्यहीन स्वच्छंद जीवन को ही इतना मूल्यवान मानने लगती हैं कि अपने बच्चों तक का ध्यान नहीं रख पातीं, जिससे बच्चे पथभ्रष्ट हो जाते हैं।
         दूसरा, प्रवासी नारी भारतीय एवं पाश्चात्य परिवेश में सामंजस्य बनाकर आगे बढ़ने का प्रयास करती है। जैसे हवनकी गुड्डो, ‘सड़क की लयकी नेहा, ‘धूपकी रेखा, ‘टारनेडोकी वंदना, ‘आग में गर्मी कम क्यों हैकी साक्षी, ‘मेरे हिस्से की धूपकी शम्मो आदि।
         तीसरा, स्त्री या तो निराशाजन्य स्थिति में अवसादग्रस्त हो गई है अथवा विद्रोहिणी बन गई है । न भेज्यो विदेसकी गुरमीत और सांकलकी सीमा अवसादग्रस्त हो जाती हैं, तो काला लिबासकी अनन्या, ‘टारनेडोकी क्रिस्टी, ‘घरकी नादिरा, ‘क्षितिज से परे…’ की सारंगी, ‘हवनकी तनिमा आदि नायिकाएँ विद्रोही बन जाती हैं।
        सुदर्शन प्रियदर्शिनी तथा ज़किया ज़ुबैरी की नायिकाएँ कहानी के अंत तक परिस्थिति के साथ ताल-मेल बैठा लेती हैं। इला प्रसाद की नायिकाएँ अंत में रोज़मर्रा के जीवन में लिप्त हो जाती हैं।  सुषम बेदी की नायिकाएँ अलग-अलग स्वभाव की होती हैं, वे जुझारू भी हैं, भावुक भी, विद्रोही भी तथा सुधा ओम ढींगरा की नायिकाएँ कहानी के अंत तक आते-आते सशक्त रूप ले लेती हैं, वे परिस्थितियों से हार नहीं मानतीं बल्कि उनमें समस्याओं से लड़ने की क्षमता एवं जीजिविषा जाग उठती है । किंतु ये सभी नायिकाएँ अपनी अस्मिता के प्रति जागरूक हैं।
        इन सभी साहित्यकारों की रचनाओं में विषय बाहुल्य दिखाई देता है । भारत में जहाँ आधी आबादी का साहित्य अभी शनैः शनैः घर की चौखट लाँघकर समाज, देश और राजनीति की ओर कदम बढ़ा रहा है वहीं प्रवास की आधी आबादी का विषय किसी एक साँचे या किसी एक विमर्श में बाँधकर नहीं देखा जा सकता । इनके साहित्य में उत्तर-आधुनिक परिप्रेक्ष्य में वृद्धा विमर्श, पुरुष-विमर्श, स्त्री-विमर्श तथा मूल रूप से प्रवासी-विमर्श के रूप में हिन्दी साहित्य में अपना स्थान बना रहा है। ये कथाएँ भारतीय और पाश्चात्य समाज और संस्कृति, परिवेश, भाषा और परंपरा का, मनोविज्ञान और मानवीयता का, संवेदना और वेदना का, मानव जीवन के सहजता और असहज घात-प्रतिघातों को चित्रित कर रही हैं।

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रिसर्च / फेकल्टी असोसिएट
गौतम बुद्ध विश्वविद्यालय
यमुना एक्प्रेस-वे, नियर कासना,
गौतम बुद्ध नगर, ग्रेटर नोएडा (उ.प्र.) – 201312
ई-मेल – 
renuyadav0584@gmail.com



सोमवार, 22 सितंबर 2014

सुर्खी


    सुर्खी

हर पल सुर्खियों में
छायी रहती हूँ मैं
कभी लाल सूर्ख जोड़े में
तो कभी काले सफेद पर्दे में
कभी सीधे-सीधे
तो कभी तोड़ मरोड़ कर

गार्गी अपाला घोषा के मंत्रों
की भाँति
कहीं बेनाम अंकित
थेरियों की गाथा बन
कहीं गुमनाम
या सिंहासन पर बैठी
अनचिन्ही अदृष्य युवराज्ञियों
और महारानियों की भाँति
या इतिहास में गायब
उन लेखिकाओं की भाँति

सुबह सुबह कुछ पन्नों
में सिमटी
सबसे जरूरी सबसे खास
दोपहर में इस टेबल
से उस टेबल तक
जरूरी गैरजरूरी बन
शाम तक रद्दी की तरह
बिखर जाती हूँ
किसी रस्ते, किसी कोने
या किसी की तराजू में
तोल दी जाती हूँ
अयोग्यता के बटखरे में
हर जगह होते हुए हुए
भी हूँ गुमनाम
हाँ, मैं एक सूर्खी हूँ ।

मंगलवार, 15 जुलाई 2014

साठोत्तरी कविता के जलते चूल्हे पर स्त्री-भाषा

'युद्धरत् आम आदमी' पत्रिका के जून, 2014 अंक-9 में मेरा शोधपरक लेख 'साठोत्तरी कविता के जलते चूल्हे पर स्त्री-भाषा' प्रकाशित...







गुरुवार, 10 जुलाई 2014

क्योंकि औरतों की नाक नहीं होती… !!!

सुधा ओम ढ़ींगरा द्वारा संपादित 'हिन्दी-चेतना' (कैनेडा) के जुलाई-सितम्बर, 2014 अंक में स्त्री-विमर्शी स्तंभ 'ओरियानी के नीचे' में प्रकाशित -


क्योंकि औरतों की नाक नहीं होती !!!

      “अरे हमार रनियाँ... रनियाँ रे रनियाँ... हमार रनियाँ हमके कहाँ छोड़ भगलस रे रनियाँ... अरे हमार बछिया... लाली चुनरिया ओढ़वउले क सपना हम देखनी, सपना के माटी में मिलउलू रे बछिया... चुटकी सेनुरवा के कोइला में मिलउलू रे रनियाँ... सपना देखाइ कहाँ भगलू रे रनियाँ...
       चीखती रोआ-रोहट सुनकर गाँव वाले दौड़े-दौड़े आयें- दुआरे पर बउकी की लाश देखकर अवाक् ! अरे अभी तो कल ठीक थी और आज...! बेचारी का सोलह दिन बाद तो बियाह था, फिर अब ! ऐसा कैसे हो सकता है, अचानक मौत ! आह ! अरे इसके तो ओठ करिया गए हैं, लगता है वह ज़हर खाई है ! हाँ-हाँ ज़हर ही खाई है
       और फिर जल्दी जल्दी बाँस कटा, टिलठी तैयार हुई और बउकी की लाश बिलखते माई-दादा के सामने से उठा ले जाई गयी । नाते रिस्तेदारों को तो छोड़ो तिलौली जैसे छोटे से गाँव में पूरे लोगों को तो पता भी नहीं चला कि बउकी मर गई । बउकी तो बऊकड़ थी दुहाये से बियाह के डर से ज़हर-माहूर खाकर मर गई ! यह घटना सन् 2000 में घटी ।
       दो साल बाद उसी गाँव में चन्द्रसिलवा ने जहर खा लिया, सुना था कि वह गर्भवती थी । वह तो जहाँ बैठती थी सिल-पाथर हो जाती है । किसी ने कुछ कर दिया होगा ! अब इज्जत् की खातीर मर गई तो ठीक ही है ।
       उसके चार साल बाद सुरसतिया की लाश ऊँखियाड़ी में मिली, बेचारी घोहा में कपार रगड़ रगड़ कर मर गई । किसी औरत ने उसे खेत में जाने से पहले इनारे पर रखी बाल्टी से पानी निकाल कर पीते हुए देखा था और यह भी देखा था कि तब उसके नाक कान में सोने की खील और बाली थी पर मरने के बाद तो है ही नहीं ! का पता कि उसकी माई निकाल ली हो, और कुछ दिनों से उसके बहकने की ख़बर चल ही रही थी, पक्का इसके माई-दादा ने ज़हर दे दिया होगा ! भला ऐसी लड़की का जीना कलंक ही है ! अच्छा हुआ कि मर गई । बियाहे के बाद भी किसी और से परेम !
       पता नहीं कैसे पुलीस वाले को पता चल गया और आ टपके, पर हुआ गया कुछ नहीं । 12 हजार से 10 हजार रूपये, 10 से 8 हजार और 8 से 6 हजार रूपये में पुलीस पट गयी । मामला रफा दफा हो गया, जबकि उस दिन 15 अगस्त का दिन था ।
       मौत के बाद बऊकी चुडैल नहीं बन सकी क्योंकि सबको उसके बारे में पता नहीं था । लेकिन कट गई उखियाड़ी, सुरसतिया जाग गई, गाँव वालों को पकड़ने लगी । चन्द्रशीलवा दोहरा भूत बनी, वो तो जागी ही थी उसके अन्दर का अजन्मा बच्चा भी बदला लेने के लिए जाग गया ! फिर क्या था सोखा-ओझा से बइठवाया गया, पूजा पाठ करवाकर गाँव को शुद्ध किया गया ।
       यह काल्पनिक कहानी नहीं बल्कि गोरखपुर के एक छोटे से गाँव तिलौली की दास्तान है । जहाँ मनुष्यता से बड़ी वर्चस्ववादी सत्ता की नाक है । वहाँ औरतों की तो नाक ही नहीं होती, सिर्फ देह होती है और देह ही अदृश्य रूप से भाई-बाप, पति-पुत्र, परिवार और समाज की नाक से जुड़ी होती है तथा जिस सामान्य नाक से वे साँसें लेती हैं वे साँसें वर्चस्ववादी सत्ता की अमानत होती हैं, जो हर पल अपने पति, पिता और परिवार की नाक बचाने के लिए चलती या रूकती हैं । साँसों की गति भी परिवार के संस्कारों पर आधारित होती है, जैसी आज्ञा वैसी साँस । वह नाक ही है जो मिटकर पूरे समाज को पानी पानी होने से बचा लेता है, वह नाक ही है जो किसी जायज रिश्ते की मोहर के साथ गर्व के साथ खड़ा हो जाता है तथा वह नाक ही है जो निरन्तर मर-खपकर रह-सहकर स्वर्ग का दरवाजा खोल देता है । नाक बचाने की राजनीति स्त्री के संस्कारों में नीर-क्षीर की भाँति घोल दिया जाता है, मरे तो मरे पर नाक न कटने पाये !
       सिमोन द बोउवार का कथन स्त्री स्त्री पैदा नहीं होती, स्त्री बना दी जाती है और वहीं से शुरू होती है त्याग, ममता, करूणा, प्रेम और भय की कहानी । वर्चस्ववादी सत्ता के विश्वास पर यदि वह खरे उतरे तो ठीक, नहीं तो मिटा दो ! आसान बात तो यह है कि भाई-बाप की ईज़्जत के नाम पर स्त्रियाँ आसानी से मिटने को भी तैयार हो जाती हैं । वैसे भी वे हर रोज भाई-बाप के ईज्ज़त पर दाग लग जाने के ड़र से मरती ही रहती हैं, फिर क्या फर्क पड़ता है कि एक दिन उनकी चुप्पी को और चुप कर दिया जाए । ऐसी लड़कियों का एक ही राग-अलाप कि हम तो अपने माँ-बाप की खातीर ही जी रहे हैं वरना हमें और किसी से क्या लेना देना । माँ-बाप की ईज़्जत की खातीर ही बउकी तड़प-तड़प कर जान गवाँ दी और उसकी माँ उसके सिरहाने बैठी-बैठी साँसे खत्म होने की गिनती गीनती रही, और सुबह होने पर चिल्ला-चिल्ला कर ऐसे रोयी कि सुनने वालों का कलेजा फट गया ! वह नहीं कह सकी अपनी व्यथा, क्योंकि उसे पति या पुत्री में से किसी एक को चुनना था ! क्या करे- पति है तो सर्वस्व है बच्चे तो फिर जनम सकते हैं, पति की खातीर हजार बच्चे कुर्बान । कपार रगड़ रगड़ कर मरने वाली सुरसतिया के मरने के बाद भी उसकी माई की लालच अपरमपार रही, वह अपने बेटी के नाक कान की खील और बाली भी निकाल लाई फिर रोते-रोते दुबारा उसके लाश के पास पहुँची ! चन्द्रशीलवा के मरने के बाद फूले पेट को देखकर लोग समझ गये कि उसका पैर भारी था, इसलिए उसका काम तमाम करना सही ही था, लेकिन घर वालों के रोने से बन का पत्ता झहराने लगा !
       सबकी नज़र में एक ही बात थी कि लड़कियाँ बदचलन थीं, इसलिए इनका मरना ही ठीक था । जिस तरह एक गन्दी मछली पूरे तालाब को गन्दा कर देती है उसी तरह ये लड़कियाँ पूरे गाँव को कलंकित कर देंगी । किन्तु उन लड़कियों के लिए एक ही बात सत्य थी कि लागा चुनरी में दाग छुड़ाऊं कैसे ? सच तो यह है कि इनके लिए तो प्रेम से बड़ा सत्य और प्रेम से बड़ा झूठ इस दुनिया में कुछ भी नहीं था । इन लड़कियों ने जिस प्रेम को अपनी आत्मा का सबसे बड़ा सत्य समझा,  इनके प्रेमी उसी वर्चस्ववादी सत्ता के एक प्रतीक थे, जिन्होंने दैहिक सौन्दर्य के अलावा और कुछ जाना ही नहीं । मौत के पश्चात् भी वे अपनी नाक की खातीर न तो इन प्रेम-पूजारिनों को देखने आये और न ही कभी स्वीकार किया कि ये मेरी प्रेमिकायें थीं । नाक की खातीर ही उनका प्रेम झूठा हो गया । जिसने भी जाना यही समझा कि रोज टीक-फांनकर घास गढ़ने वाली लड़कियाँ टी.वी. देख-देखकर बिगड़ गयी थीं । हिरोइन बनने का सपना देखते-देखते बेचारे इन सीधे-सादे भोले- भाले लवंडों को फँसा ही डालीं । धर्म, नैतिकता, परंपराओं में मँजे, संस्कारों से संवरे इन लवंडों के मन में भला ऐसी बात भी कैसे आ जाय ! अगर आ भी गया तो लड़कपन है, लड़कियों को तो अपने भाई-बाप के नाक के बारे में सोचना चाहिए था !          
       क्या सोचें ये लड़कियाँ ! सोचा तो इन्होंने यह भी नहीं था कि प्रेम गली अति साँकरी, जिसमें प्रेमी की नाक और प्रेम दोनों एक साथ समा ही नहीं सकतें ! इन्होंने इतना ही जाना था कि दृग उरझत टूटत कुटुम्ब, पर ये नहीं जाना कि कुटुम्बी खुद टुटने से पहले इन्हें तोड़-तोड़ कर मिटा डालेंगे ! इनके सपनों के पंख न सिर्फ मरोड़े जायेंगे बल्कि जड़ से ही साफ कर दिये जायेंगे- न रहेगा बाँस और न बजेगी बाँसूरी !            
       मौत का तमाशा देखने वालों में से किसी ने ये सोचा ही नहीं होगा कि उन छटपटाती मरती लड़कियों से कैसे एक-एक साँसें कराह कर निकली होंगी ! वे अंतीम साँस में तड़पती हुई उस समय अपनी रक्षा के लिए किसे याद की होंगी ? उस समय क्या बचा पायी होंगी उन लवंडों की खोखली नाक ? क्या उस समय उनके लिए सबसे बड़ा सत्य रह पाया होगा प्रेम ? क्या उस समय उनकी नज़रों में बची रह गयी होगी भाई-बाप की प्रतिष्ठा ? क्या बच पायी होगी स्वर्ग-नरक की चाह ? क्या आखिरी साँसों में भी किसी और की नाक बचाने की सद्भावना बरकरार रख पायी होंगी ?
       परंतु आश्चर्यजनक बात यह है कि धर्म, नैतिकता, परंपरा और प्रतिष्ठा के अनुयायियों का काठ-कोरो दिल यह सब करने बाद भी अपनी नाक पर मक्खी तक नहीं बैठने देतें । समाज में सदैव उनकी नाक ऊँची ही रहती है और यदि किसी को इनके गुनाहों के विषय में पता भी होता है तो सत्ता की ओरियानी के नीचे मुँह में बातें भुनभुनाकर अपनी बातें भुनाने में लग जाते हैं, जहाँ सिर्फ स्वार्थ प्रबल होता है न कि परार्थ ।
       ऐसे महान अनुयायियों से प्रश्न है कि क्या वर्चस्ववादी सत्ता की नाक इतनी सफेद है कि जो प्रेम के दाग से दाग लग जाने का भय निरंतर सताता रहता है ? या इनकी नाक इतनी कमज़ोर है कि बेटियों के हिल जाने से हिल जाती है ? क्या इनकी नाक रूढ़ परंपराओं से इतनी भयभीत है कि उस पर प्रेम का बल पड़ते ही उसे कट जाने का भय सताता है ? या इतनी ज़रज़र कि बेटियों की जान लिये बिना बच ही नहीं सकती ?

       कदाचित् इन्हीं सब बातों को ध्यान में रखते हुए गगन गिल बेटियों को झर जाने की सलाह देती हैं । क्योंकि सबकी नाक बचाने वाली औरतों की तो नाक ही नहीं होती...!!!

गठरी में संसार

रामेश्वर कम्बोज द्वारा संपादित 'लघुकथा.कॉम' के जुलाई अंक में 'मेरी पसंद' स्तंभ में मेरा समीक्षात्मक लेख 'गठरी में संसार' प्रकाशित -
लिंक - http://www.laghukatha.com/pasand-73.html



गठरी में संसार - रेनू यादव
हिन्दी साहित्य के विस्तृत आँचल पर महाकाव्य, खण्डकाव्य, मुक्तक काव्य, उपन्यास, कहानियाँ, नाटक तथा निबंधों आदि ने अपना वर्चस्व बनाए रखा, किन्तु  समय की माँग के अनुसार उसी आँचल से बने छोटे-छोटे गट्ठर के रूप में हाइकु, ताँका, हाइबन, लघुकथाओं आदि ने अपना अस्तित्व धारण कर लिया ; जिसने उत्तर-आधुनिकता के समयाभाव में समय और सीमा दोनों को ही अपना संगी बना लिया । बोझ कम किन्तु  विचारात्मक । इनमें बँधे हैं साहित्यिक संसार और सांसारिक बुनावट के अनेक रंग ।

इन सभी गठरियों में से सरल, सहज तथा सुबोध गाँठ में बँधी गठरी है लघुकथा । जीवन के किसी एक अंग या दृश्य की द्रष्टा और सम्पूर्ण जीवन की सहचरी । एक ही दृश्य में खोलती है समस्त परिवेश की गाँठें और गठियाई परिवेश से लुंज-पुंज हुए संस्कारों, परम्पराओं, रूढ़ियों, धर्मों, मान्यताओं को अलग अलग कर उँगलियों पर गिना देने की खासियत । इसकी खास विशेषता है कि यह स्वयं नहीं कहतीं कि मैंने संसार को गठिया रखा है, बल्कि गठरी से समस्त विकल्प मुँह उठा-उठाकर झाँकने लगते हैं, जो कि कथा की बुनावट में खामोशी से बँधे होते हैं किन्तु  पठन के साथ ही पाठक के मानसपटल पर चहलकदमी करने लगते हैं । गठरी जितनी मजबूत और कसकर बँधी होती है उसके खुलते ही उसमें से उतने ही वैकल्पिक रंग भरक कर बाहर आ जाते हैं और देर तक अपनी कसावट से पाठक को कसे रखते हैं । गठरी में बँधे शब्दों के पास कोई विकल्प नहीं होता कि वे कहानी और उपन्यास की भाँति तनिक इधर उधर भटक लें, बल्कि सारगर्भित शब्दों में बंधा होना और अर्थ एवं भावों का वायु की भाँति स्वछंद विचरण करना इसकी अनिवार्यता है और इसकी पहचान व्यंग्यात्मक, सामाजिक, मनोवैज्ञानिक, ऐतिहासिक, धार्मिक आदि किसी भी दृष्टि से हो सकती है ।

लघुकथा लेखन की सबसे महत्वपूर्ण विशेषता यह है कि इसमें महिला-पुरुष के लेखन और शैली में अंतर समझना तिल-तंडुल की भाँति है, अर्थात् लघुकथा के धरातल पर लेखक सिर्फ लेखक है, न कि वह महिला अथवा पुरुष । लघुकथा लिखने वाली महिला कथाकारों में सुधा अरोड़ा, चित्रा मुद्गल, उर्मि कृष्ण, मीरा चन्द्रा, नासिरा शर्मा, नीलिमा टिक्कू, अंजना अनिल , नीता सिंह, डॉ. तारा निगम, नीलम कुलश्रेष्ठ, रश्मि वार्ष्णेय, सुस्मिता पाठक, पवित्रा अग्रवाल, आरती झा, शैल वर्मा, पवित्रा अग्रवाल, इंदु गुप्ता, ज्योति जैन, निर्मला सिंह, नीलम, प्रतिमा श्रीवास्तव, प्रभा पाण्डेय, माया कनोई, , सुमति देशपाण्डे, जयश्री राय, सीमा स्मृति, रचना श्रीवास्तव, डॉ. मुक्ता, विभा रानी, शैल वर्मा, सुधा भार्गव सुधा ओम ढींगरा, शोभा रस्तोगी, भावना सक्सेना, निरूपमा कपूर, डॉ. अनिता कपूर, रीता कश्यप, इला प्रसाद, भावना वर्मा, सुचिता वर्मा आदि नई पुरानी रचनाकारों को पढ़ा ।

जिस प्रकार उपन्यास, कहानी तथा कविताओं में महिलाओं को विमर्श के खाँचे में ही देखा जा रहा है, उस प्रकार के अपवादों से महिला लघुकथाकार मुक्त हैं । इन्होंने विमर्श से अधिक मानवीय संवेदना को महत्त्व दिया है । साहित्यिक आंचल में दैनिक दिनचर्या के माध्यम से ही विषय वैविध्य के छोटे-छोटे फूल अत्यंत सहजता एवं सूक्ष्मता से उकेरे हैं, जो दूर तक अपनी खुशबू भी फैलाते है तथा चमकते भी हैं । बहुत –सी लघुकथाओं ने मुझे प्रभावित किया। कुछ लघुकथाएं ऐसी होती हैं जो स्मृति-पटल पर अंकित हो जाती हैं। उन्हीं में दो लघुकथाएँ प्रमुख हैं- नीलिमा टिक्कू की  ‘नासमझ’ और मीरा चन्द्रा की ‘बच्चा’नीलिमा टिक्कू की ‘नासमझ’ और मीरा चन्द्रा की ‘बच्चा’ ने भी दलित विमर्श का मुद्दा उठाया है । जय प्रकाश मानस ‘लघुकथा का निबंध’ में लिखते हैं - “सच्ची लघुकथा यथार्थ की ईमानदार पड़ोसन है” । इसी यथार्थ के धरातल पर दोनों लघुकथाएँ  ये साबित करती हैं कि जातिवाद एक सांस्कारिक विष है, जिसे अमृत के नाम पर परोसा जाता है । धीरे-धीरे वह विष बालक के मनोसामाजिक संरचना के साथ उसकी नस-नस में फैल जाता है, जिसे बिलगाना असंभव हो जाता है अथवा बालक को युवावस्था के पश्चात् जातिवाद एक सामान्य व्यवहार लगने लगता है ।

‘नासमझ’ लघुकथा धर्म और संस्कार तथा ‘बच्चा’ नैतिक शिक्षा तथा संस्कारों पर गहरी चोट करता हैं । बच्चे की मनःस्थिति परिवार, समाज और परिवेश का अनूठा संगम है । किन्तु  यह अनूठापन संस्कारों के दोहरे मापदंड़ों के कारण कुंठित और कुत्सित भी हो सकता है । ‘नासमझ’ की  नन्हीं पिंकी जिसे गन्दी गरीब बस्ती की लड़कियों के साथ खेलने की मनाही होती है, इसलिए खुश है कि उन्हीं लड़कियों को दुर्गाष्टमी की पूजा के लिए बंगले में बुलाया गया । दादी जिन्हें उन गरीब लड़कियों से आपत्ति थी वे ही रोली टीका लगा उनका पूजन कर उन्हें भोजन परोसती हैं तथा उनके जूठे भोजन रूपी प्रसाद समस्त दुखों की निवृत्ति हेतु जमादारिन को देने के लिए प्लास्टिक की थैलियों में भरकर रखवा देती हैं । यह शिक्षा अबोध पिंकी अपने दिलों दिमाग में बैठा लेती है कि इससे सारे दुख दूर हो जाते हैं; इसलिए वह टांसिल के दर्द मुक्ति के लिए वही प्रसाद जब वह खाने के लिए अपनी थाली में परोसने लगती है । जिसपर दादी की नज़र पड़ते ही वे प्रसाद को जहर कहते हुए उसे  डाँटने लगती हैं । “नन्हीं पिंकी सहमकर चुप हो गई लेकिन अब भी उसकी समझ में ये नहीं आ रहा था कि जूठा खाना जमादारिन के लिए देवी का प्रसाद है वो उसके लिए जहर कैसे हो सकता है ?”

‘बच्चा’ लघुकथा में अमेरिका से भारत लौटे हुए नन्हें गर्व को ननिहाल जाने का अवसर मिलता है, उसे बड़ों का पैर छूकर आशीर्वाद लेने की नैतिक शिक्षा भी मिल जाती है । वह ऐसा ही करता है, किन्तु  जैसे ही वह जमादार के पैर छूता है तब उसे गंगाजल से नहला कर शुद्धि की जाती है साथ ही थप्पड़ भी खाने पड़ते है । अबोध बालक को यह नहीं समझ में आता कि उसने पैर ही तो छुए थे , फिर क्यों थप्पड़ खाना पड़ा । इसलिए वह सिसकियाँ भरते हुए कहता है “अब मैं कभी किसी का पैर नहीं छुऊँगा” ।

दोनों ही लघुकथाएँ एक ही संदेश देती है, किन्तु  दोनों ही लघुकथा में छिपा है धर्म, नैतिक शिक्षा, समाज, संस्कृति तथा संस्कारों का एक अनंत परिचय । गन्दी गरीब लड़कियाँ और जमादार या जमादारिन उस अश्पृश्य, दमित तथा अभावात्मक आजीविका के बोधक है, जिनकी पहचान शायद ही अछूत शब्द के अलावा और कुछ हो ! जमादारिन को प्रसाद के नाम पर जूठे भोजन देना या फिर जमादार का पैर छू लेने पर बच्चे का थप्पड़ खाना उनके प्रति असम्मान को दर्शाता है तथा यह भी स्पष्ट होता है कि आर्थिक विपन्नता के कारण जूठे भोजन माँगकर ले जाने के लिए वे विवश है । जूठे भोजन जमादारिन के लिए प्रसाद और पिंकी के लिए जहर तथा सबका पैर छूकर आशीर्वाद लेना तथा जमादार के  पैर छूने पर गर्व को थप्पड़ पड़ना हमारे संस्कारों के दोहरे मानदंडों तथा जमादार या जमादारिन के लिए दोयम दर्जे का व्यवहार शूद्रों के प्रति हो रहे दुर्व्यवहार की परंपरा और लम्बे इतिहास को दर्शाता है । डॉ. चमनलाल दलित साहित्य के संदर्भ में कहते हैं - “दलित साहित्य जातिभेद के खिलाफ साहित्यिक उत्पीड़न, मानवता की सशक्त आवाज बनकर उभरा है । दलित साहित्य हमारे समाज का दर्पण है ;जो हमने देखा है, अनुभव किया, भोगा, जाना उसका अंकन उत्कृष्टतापूर्वक हुआ है” ।

इन दोनों ही लघुकथाओं की खास विशेषता यह है कि ये विद्रोह की आवाज बुलंद किये बिना अत्यंत शांति के साथ दलित साहित्य का संदेश देते हुए बालमन के मनोसामाजिक संरचना पर अपना लक्ष्य केन्द्रित करती हैं, जिससे पाठक अपने संस्कारों, परंपराओं, धर्म, नैतिकता तथा इतिहास का पुनर्मूल्यांकन एवं परिमार्जन के लिए विवश भी हो जाता है ।                                                                   -0-

1-नीलिमा टिक्कू – ‘नासमझ’
नन्हीं पिंकी आज बहुत खुश थी । जिन गन्दी गरीब लड़कियों के साथ उसे खेलने की इजाजत नहीं थी, आज उन्हें ही बंगले में बुलाया गया था । वो भी दादी माँ के आदेश पर । आज दुर्गाष्टमी जो थी । दादी माँ ने अपने हाथों में उन सभी के ललाट पर रोली का टीका लगाया । उनके हाथों में मौली का धागा बाँधकर उनका पूजन किया फिर उन सभी के आगे बड़े-बड़े थाल भरकर खीर-पूड़ी, हलवा व चने का शाक परोसा;
इस पर माँ ने हल्का-सा विरोध किया था, “माँ जी इतनी छोटी बच्चियाँ इतना ज्यादा खाना नहीं खा पाएँगी” ।
दादी भड़क उठी थीं, “ये कैसी ओछी बात कर दी बहू तुमने । देवी के शाप से डरो । ये कन्याएँ देवी का ही रूप हैं” ।
माँ ने फौरन चुप्पी साध ली थी ।   
शरमाती-सकुचाती, सहमी हुई बच्चियों ने आधे से ज्यादा खाना जूठा छोड़ दिया था । दानी ने उन गरीब बच्चियों के हाथ में दस-दस रूपए के करारे नोट पकड़ाए ।
उनके जाने के बाद दादी के कहने पर नौकर रामू ने उनकी थालियों की जूठन चार प्लास्टिक की थैलियों में भरकर दरवाजे पर रख दी । ये सब देख पिंकी पूछ बैठी ।
“दादी जूठे खाने को रामू ने थैलियों में डालकर क्यों रखा है ?”
दादी ने समझाया, “आज दुर्गाष्टमी है ना । जमादारिन खाना माँगने आती ही होगी उसे देने के लिए ही रखा है” ।
पिंकी किंचित हैरानी से बोली, “दादी ये तो जूठा खाना है । आप ते कहती हो कि किसी दूसरे का जूठा खाना नहीं खाना चाहिए । बहुत सी बीमारियाँ लग जाती हैं और पाप भी लगता है ?”
दादी मुस्कराई, “अरे बिट्टो आज के दिन कन्याओं का ये जूठन, देवी का प्रसाद होता है, इसे खाकर तो जमादारिन की सभी बीमारियाँ ठीक हो जाएगी साथ ही उसके कई जन्मों के पाप भी धुल जाएंगे” ।
दोपहर को जमादारिन की रोटी माँगने की आवाज सुनकर रामू खाने की थैलियाँ लेने अन्दर आया किन्तु कमरे का दृश्य देखकर स्तब्ध रह गया । पिंकी थैलियों में रखी जूठन निकालकर अपनी खाने की थाली में डाल रही थी । तभी दादी माँ भी जमादारिन को पैसे देने उधर आ पहुँची ।
“पिंकी ये क्या गजब कर रही है ?”
दादी माँ की दहाड़ सुनकर सहमी पिंकी धीरे से बोली, “दादी थोड़ा सा देवी का प्रसाद ले रही थी । इसके खाने से मेरे टांसिल भी हमेशा-हमेशा के लिए ठीक हो जाएंगे” ।
दादी भड़क उठी, “बेवकूफ लड़की ये खाना तेरे लिए जहर है । ना जाने कितनी बीमारियाँ समेटे गन्दे, गरीब व छोटी जात की लड़कियों की जूठन है ये । मूर्खा दुनिया भर के पाप अपने सिर पर लगाना चाहती है ?”
पिंकी हैरान थी, “पर दादी आपने ही तो कहा था कि ये देवी माँ का प्रसाद है । इसके खाने से जमादारिन की सभी बीमारियाँ ठीक हो जाएगी तो फिर मेरे टांसिल... दादी आग बबूला हो उसी बात को काटती हुई चिल्लाई, “चुप कर, बित्ते भर की छोकरी होकर मुझसे बहस करती है । आज तक तेरी माँ की हिम्मत नहीं हुई, मुझसे इस तरह के सवाल-जवाब करने की” ।
नन्हीं पिंकी सहमकर चुप हो गई लेकिन अब भी उसकी समझ में ये नहीं आ रहा था कि जूठा खाना जमादारिन के लिए देवी का प्रसाद है वो उसके लिए जहर कैसे हो सकता है ?
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2- मीरा चन्द्रा – बच्चा
लंबे अंतराल के बाद ननिहाल जाने का सौभाग्य हुआ । अम्मा के साथ मन में ढेरों उमंग लिए पुरानी सहेलियों से मिलने की खुशी समेटे मैं अपने पाँच साल के बेटे के साथ ननिहाल पहुँच गई । गर्व के लिए भारत में बीता हर क्षण वैसे ही कौतुक भरा होता है पर गाँव तो उसके लिए किसी जादुई नगरी से कम नहीं था । कहीं-कहीं अधपके गेहूँ के खेत में अठखेलियाँ करती बालियाँ, आम के पेड़ों पर लटकते हवा से डोलते नन्हें टिकोरे उसे गुदगुदा जाते । पगडंडियों पर चलना तो दो दिन में ही उसका जुनून बन चुका था ।
जन्म से ही अमेरिका में रहने वाला गर्व किसी नए आगंतुक को परंपरावादी पहनावे में देखकर सिमट जाता था । बहुत कहने पर ही वह आगंतुक का पैर छूता । इसके लिए अक्सर उसे डाँट भी खानी पड़ती, “गर्व ! तुम्हें कितनी बार समझाऊँ कि बड़े लोगों का पैर छूकर उन्हें प्रणाम करते हैं । यहाँ हेलो हाय नहीं बोला जाता बेटा । तुम सुनते क्यों नहीं... अबसे तुम घर में आने वालों का पैर छूकर प्रणाम करोगे, समझे” , मैंने उसे प्यार से समझाने की कोशिश की ।
गर्व ने भी एक अच्छे बच्चे की तरह ‘हाँ’ में सिर हिला दिया ।
गाँव की अपनी परंपरा होती है । बहू-बेटियों के आने पर जाति और वर्ग को दरकिनार कर सभी लोग उससे मिलने आए । उन्हें भी मिलने वालों का ताँता लगा था । एक दिन बुजुर्ग जमादार चच्चा मुझसे मिलने आए । उन्हें मैंने हाथ जोड़े । गर्व भी वहीं खड़ा था । वह भी पट से झुका और उनके पाँव छू लिये।  “अरे-अरे भैया नाहीं” कहते जमादार चच्चा भी हड़बड़ा गए और अवाक रह गए जब सँभले तो गर्व को आशीष से नहला दिया । पर गर्व को ऐसा करते देख दूर खड़ी बड़की नानी चीख पड़ी, “अरे का बचुवा... हाँ-हाँ दिपिया ला रे वहके गुसलखाना में... लई जाइके नहलावा । एक दम्मै बैरहा बाटै... अरे राम जमादार का छूइ दिहल, रगड़ के नहवाय द हम गंगाजल मझलको से भेज हुई” । बड़की नानी बड़बड़ाती जा रही थी... ये आजकल के लरिका लोग... जौन करें सब थोर ह...”
गर्व सहमा सा मेरे पास खड़ा रहा मैं भी सकपका गई । मैं गर्व को पकड़कर गुसलखाने में पहुँची तब तक झपटती हुई बड़की नानी के गर्व की सिसकियों की उपेक्षा करते हुए उसके गाल पर चट से एक चांटा जड़ दिया, “भकुआ कहीं के तोहके समझ में नाहीं आवेला केकर पैर छुअल जाला केकर नाहीं । कहीं जमादार के छुअल जाला । उत अछूत हउवै उनसे बचके रहल जाला । दिपिया ले गंगाजल से नहलाय दे सुद्ध कर एहका । बड़की नानी गर्व को धमकाते हुए बोली, “खबरदार अब तो जमादार के छुहला” ।
सहमें गर्व को मैंने बड़ी नानी के जाते ही सीने से लगा लिया । उनके इस व्यवहार से मैं भी कसमसा कर रह गई । नन्हें मन की व्यथा और मैं कैसे बाँटती ।
“मम्मा उन्होंने मुझे क्यों मारा ? मैंने तो उनक पैर ही छुए थे ? मैं यहाँ” वह लगातार रोए जा रहा था । यह सवाल उस अबोध मन में कील की धँस गया । सिसकी लेता गर्व बोलता जा रहा था, “अब मैं कभी किसी का पैर नहीं छुऊँगा” ।                                                                    -0-
 

बुधवार, 28 मई 2014

आ बैल, मुझे मार...

सुधा ओम ढ़ींगरा द्वारा संपादित 'हिन्दी-चेतना' (कैनेडा) के अप्रैल-जून, 2014 अंक में स्त्री-विमर्शी स्तंभ 'ओरियानी के नीचे' में प्रकाशित -

आ बैल, मुझे मार...

        जीवन कर लेता है श्रृंगार, सच है ना कुमकुम से, सईयाँ नैनों की भाषा समझे ना, जिन्दगी कुछ तो बता, आखिर तुझे... कोरा काग़ज रह गया, ये रिश्ता क्या कहलाता है आदि हिन्दी धारावाहिकों के मधुर गाने दर्शकों के ज़बान पर होते हैं । इसमें कोई संदेह नहीं कि ये गाने आज के फिल्मी गाने की तड़क-भड़क और कनफोडू म्यूजिक की अपेक्षा अधिक सूरिले और भावार्थक हैं । अनेक चैनलों पर दिखाये जा रहे नायिका प्रधान धारावाहिकों की पटकथा भिन्न- भिन्न सामाजिक-सांस्कृतिक मुद्दों पर आधारित होते हैं, जैसे बाल-विवाह, विधवा-विवाह, बेमेल-विवाह, पर्दा-प्रथा, निम्नवर्ग, मध्यमवर्ग, और उच्चवर्ग की समस्याएँ, मध्यमवर्ग और ग्लैमर की दुनिया का संयोग, भूत-पिचाश, धर्म, नैतिकता, थ्रीलर, क्राइम आदि । सबसे अधिक यदि कोई धारावाहिकों के प्रकार प्रसिद्ध हैं तो वे हैं सास, बहू, बेटी और उनका मायावी संसार । जो एक साधारण मध्यवर्गीय परिवार के नाम पर बड़े-बड़े महलों या हवेली में निवास करने वाली, हर रोज पार्टी में खुशियाँ मनाने वाली दुख की मारी महिलाओं की जीवनगाथा कितनी दयनीय होती है कि उच्चकोटि की किसी डिजाइनिंग साड़ी और आभूषण पहने रो-रोकर आँसूओं की नदियाँ बहा देती हैं । वे इतनी बेबस और लाचार होती है कि हॉस्पीटल में, किसी की मृत्यु में, किसी के खोने में, रोने में, जागने और सोने में एक ही तरह के वस्त्र अथवा विशिष्ट एवं कुछ कम विशिष्ट तरह की साड़ियाँ, आभूषण एवं मेकप में लदी फंदी रहती हैं, फिर भी उनके पास आर्थिक अभाव, मुँह पर सुनाई देने वाले ताने और चाहने वालों के षड़यंत्रों का ताता लगा रहता है । सबसे आश्चर्यजनक बात यह है कि एक अकेली नायिक पूरे जीवन, मात्र परिवार का ही नहीं बल्कि आस-पास के लोगों के  समस्याओं के निवारण का ठेका लिए बैठी रहती है तथा साथ ही एक खलनायिका विभिन्न तरिकों से षड़यंत्रों का जाल बुनती रहती है । नायिका बार-बार फंसने के बाद भी रो-धोकर परिवार के नाम पर विश्वास और स्नेह दिखाकर आ बैल, मुझे मार...सिद्धांत के तहत स्वयं ही ब्लैकमेल होती है, फिर बाद में रोना रोती है कि मेरे साथ इतना अत्याचार हुआ ।
        धारावाहिकों का आरंभ किसी महत्पूर्ण मुद्दे से होता है, लेकिन समस्त परिवेश के बजाय कहानी में एक नायिका होती है और दूसरी ओर एक खलनायिका । एक विलेन नायिका न भी हो तो घटनानुक्रम में एक के बाद एक खलनायक या खलनायिका और उससे उत्पन्न होने वाले समस्याओं को जबरदस्ती घूसेड़कर चमत्कार, जिज्ञासा उत्पन्न करने की कोशिश की जाती है । नायिका और खलनायिका को पहचानने का सबसे आसान तरिका है उनका परिधान । पारंपरिक भारतीय परिधान धारण करने वाली महिला नायिका होती है और पाश्चात्य परिधान धारण करने वाली महिला खलनायिका । यदि खलनायिका भारतीय परिधान धारण करती भी है तो उसका भयानक मेकप खलनायिका का आभास करवा ही देता है, यदि उससे भी बच जाय तो कभी न कभी रूढ़िवादी भारतीय महिला अथवा पाश्चात्य प्रभाव का विकृत्त रूप सामने लाकर उसका अंत किया जाता है । अर्थात् फैशन जगत् के अनुसार बाल कटवाना, मेकप करना, जींस अथवा मिनी स्कर्ट पहनने वाली तथा पूर्णतः आत्मनिर्भर महिलाएँ भारतीय समाज में खलनायिका होती हैं !!
       इन सभी का एक मात्र लक्ष्य विवाह दिखाई देता है । चूँकि विवाह जीवन की सबसे बड़ी सच्चाई है, लेकिन उसी के इर्द-गिर्द कहानी उलझ कर रह जाती है । धर्म, नैतिकता और संस्कारों का ठेका उस नायिका पर ही होता है, चाहे पति कितनाहूँ दूराचारी अनाचारी क्यों न हो (संदर्भ - डोली अरमानों की, बालिका वधू) । नायिका निरंतर दूराचार को सहते हुए पलकों में आँसू भरकर पूर्ण श्रद्धा के साथ तीज और करवा-चौथ का व्रत तोड़ती है, क्योंकि पतिव्रता नारी की सिद्धी मात्र व्रत रखने और उसे दुनियाँ के सामने दिखाने में है !(संदर्भ – ससुराल सिमर का, गुस्ताख दिल, इस प्यार को क्या नाम दूँ-2), पारिवारिक संस्कार के नाम पर पति का पैर धोकर चरणामृत्त पीने की प्रथा (संदर्भ – इस प्यार को क्या नाम दूँ – भाग 2), प्रेम और अतिशय द्वेष जैसे विरोधाभासी संवेदना (संदर्भ – जोधा अकबर, प्रतिज्ञा, बेइंम्तहाँ), पति के लिए व्रत और प्रेमी के लिए तड़प अथवा विवाह होते ही तत्काल प्रेम का स्थानांतरण (संदर्भ – कसौटी ज़िन्दगी की, पुनर्विवाह, बानी – इश्क दा कलमा), व्यवसायी अथवा हिरोइन (संदर्भ - मधुबाला), पतिव्रता पत्नी, एक संस्कारी बेटी और बहू, एक सुगृहणी (प्रायः सभी धारावाहिकों में) बनने का संघर्ष एक साथ चलता रहता है । जो एक सामान्य नारी नहीं बल्कि कोई रोबोट प्रतीत होती है,  जो कभी पति के लिए, कभी बच्चों के लिए, कभी सास के लिए, कभी परिवार के लिए, कभी सहेली के लिए, कभी नौकरी के लिए, कभी पार्टी में भागती नज़र आती है । वह अपना व्यक्तिगत जीवन दाव पर लगा सबको बचाती है और किसी छोटी मोटी गलती पर भी घर से धक्के मार कर निकाल दिये जाने के बाद भी अपने स्वाभिमान को ताक पर रखकर खुशी खुशी उसी घर में लौट आती है । नायिका चाहे कितनाहूँ शिक्षित हो, आत्मनिर्भर हो, लेकिन ससुराल में सम्माननीय स्थान प्राप्त करने के पश्चात भी ढ़ाक के तीन पात ही रहती है ।  आश्चर्यजनक बात तो यह है कि एक नायिका जिसने परिवार पर न जाने कितने उपकार किए होते हैं, उसपर भरी सभा में किचड़ उछाला जाता है, वह चीख चीख कर सहायता की भीख माँगती है, और उस समय परिवार ही नहीं बल्कि समाज भी चुप्पी साधे तमाशा देखता रहता है । खुशियाँ और दुख की चाभी या तो नायिका के पास होती है या खलनायक के पास । बाकी परिवार गूँगा, बहरा एवं निष्क्रिय होता है ।
        इन सभी धारावाहिकों को घर में बैठे बड़े, बूढ़े और बच्चे अपनी इच्छानुसार बड़े चाव से देखते हैं । एक सामान्य दर्शक को नहीं पता होता कि धारावाहिक की पटकथा क्या है, दृश्य का किस प्रकार दृश्यांतरण हुआ है ? यदि समझ में आ भी जाये तो भी अपनी रूचि से जूडे अंतःसूत्र ढ़ूँढ़ने का प्रयास करते हैं । एक ओर धारावाहिकों में प्रेम, रहस्य, हिंसा, शोषण, छल-कपट का मिश्रण तैयार कर परोसा जाना अगले अंक लिए दर्शक को लुभाता है तो दूसरी ओर स्त्रियों के लिए सबसे लुभावनकारी वस्तु नायिकाओं के कपड़े और गहने तथा यथार्थ से दूर प्रेम का आदर्शीकरण होता है, जो निज जीवन में एक सपना बनकर रह जाता है । कुछेक दृश्यों में प्यार का चर्मोत्कर्ष, विश्वास, जिम्मेदारियों की बड़ी बड़ी बातें होती हैं और फिर अचानक नायिका की किसी सामान्य सी गलती पर आदर्श के इमारत का ढ़ह जाना आदि अस्वाभाविक प्रतीत होता है, जिसके साथ-साथ दर्शक पर संबंधित मुद्दे का प्रभाव कम बल्कि चकाचौंध भरी नकल की लालसा शेष रह जाती है अथवा टाइम पास का एक साधन मात्र ।
        यह सत्य है कि दर्शक पर चलचित्र का तत्काल प्रभाव पड़ता है । किन्तु प्रायः इन धारावाहिकों में मुख्य मुद्दे बारम्बार विवाह, अनावश्यक पार्टियों और धार्मिक पूजा पाठ में दबकर अपना महत्व खो देते हैं । धर्म और नैतिकता के नाम पर नायिका का चरित्र उभरता नहीं बल्कि धर्म नैतिकता के जाल में फंसी तड़फड़ाती मछली की भांति दृष्टिगत होती है । प्रेम का अतिशयोक्तिकरण उसे अनर्गल षडयंत्रों में फंसाती है, उससे वह समझदार नहीं बल्कि बेवकूफ नज़र आती है, जिसे खलनायिका अपनी ऊँगली पर नचाती फिरती है और खलनायिका भी ऐसी कि किसी की हत्या करना उसके लिए साधारण सी बात होती है । ऐसे में विकृत्ति परिवार, विश्वासों की उड़ती धज्जियाँ, रिश्तों के साथ खिलवाड़ आदि से मन विद्रुपता से भर जाता है ।
        मध्वर्गीय उच्चशिक्षा प्राप्त परिवार की कथा हो अथवा निम्नवर्गीय परिवार की समस्या, सबकी समस्या का अंत किसी महलनुमा घर में ही होता है और वहीं से शुरू होते हैं अनेक षड़यंत्र । आदर्श भारतीय परिवार की स्थापना करने के चक्कर में सच से कोसों दूर भारतीय यथार्थ का ड्रामा जनता को आसानी से दिग्भ्रमित कर रहा है । नायिका प्रधान अथवा स्त्री-विमर्श के नाम पर स्त्रियों को सत्ता की ओरियानी के नीचे ही रखा जा रहा है, जिसे स्वतंत्रता, समानता और सद्भावना जैसे प्रजातांत्रिक मूल्यों का भ्रम हो गया है । उसे लगता है कि वह पुरूषवर्चस्ववादी सत्ता एवं मानसिकता से मुक्त हो गयी है, किंतु सत्य तो यह है कि फैशन जगत् की चकाचौंध और अनावश्यक पार्टी, शिक्षित महिलाओं का ताबडतोड़ फैसला लेना आदि निर्णय की स्वतंत्रता दिखाना एक ऐसा चक्रव्यूह है जिसमें अभिमण्यु की भाँति वह स्वयं भी छटपटा रही है तथा समाज की आधी आबादी को आसमान से गिरे और खजूर में लटके वाली स्थिति में फँसा रही है । जिन थोथे मूल्यों एवं मान्यताओं तथा आडम्बरों की चादर को उतार फेंकने में स्त्री-विमर्शियों ने कई सदियाँ गुजार दीं और आज खुलेआम निडरता के साथ खडी भी हो रही हैं, अब उसे ही चलचित्र के माध्यम से मुक्ति के नाम पर नए छद्म के साथ पुनः ओढ़ाया जा रहा है । ऐसी विकृत्त स्वतंत्रता के एक तरफ कूआँ है तो दूसरी तरफ खायी । ऐसी स्थिति में स्त्री-विमर्शी चलचित्र जगत् के समाज, संस्कृति, धर्म, नैतिकता, मनोरंजन, शिक्षा और यथार्थ की गाड़ी हाँकने वालों से यही प्रश्न शेष रह जाता है – कवने नगर लेके चला रे बटोहिया...” ???  

उत्तर-आधुनिक नारीवाद

सुधा ओम ढ़ींगरा द्वारा संपादित 'हिन्दी-चेतना' (कैनेडा) के जनवरी - मार्च, 2014 अंक में स्त्री-विमर्शी स्तंभ 'ओरियानी के नीचे' में प्रकाशित -

उत्तर-आधुनिक नारीवाद

सास का गट्ठर गट्ठर है, ननद का झब्बा झूलता है ।
जब गगन में दीयना बरता है, तब अँगन में मीरगा चरता है ।।
       यह कहावत गरीबी के संदर्भ में है, किन्तु पाश्चात्य के अनुकरण के संदर्भ में देखा जाए तो भारतीयों पर सटिक बैठता है । पाश्चात्य में जैसे ही नई विचारों का सुनगुन होता है, वैसे ही हम भारतीय सोचने लगते हैं कि हमारे वहाँ भी वैसा ही होना चाहिए और बाद में हम कहने लग जाते हैं कि यह अवधारणा पाश्चात्य से आई है । इससे कहीं न कहीं चिराग तले अंधेरा चरितार्थ होती है । सत्य तो यह है कि हम अपने इतिहास को बार-बार खंगाल तो रहे हैं, पर उसे मानना नहीं चाहते । सत्ता के चौखट के अंदर वैदिककाल से लेकर अब तक स्त्रियों ने न जाने कितने विरोध और विद्रोह किए, पर उसे हम स्त्री-मुक्ति आंदोलन में सम्मिलित नहीं कर सकते । क्योंकि उस समय किसी ने स्त्री-मुक्ति आंदोलन, नारीवाद अथवा स्त्री-विमर्श का नाम नहीं दिया था और न ही स्त्री-मुक्ति आंदोलन के लिए संघर्ष होता था, वह संघर्ष तो समस्याओं या लगातार हो रहे शोषण से मुक्ति के लिए था । फिर प्रश्न उठता है कि स्त्री-विमर्श है क्या ?
      स्त्री के विषय में उसके सुख-सुविधाओं से लेकर प्रत्येक समस्याओं के परिप्रेक्ष्य में ऐतिहासिक, सामाजिक, धार्मिक, सांस्कृतिक, आर्थिक और मनोवैज्ञानिक दृष्टि से सूक्ष्म से सूक्ष्मतम् चिंतन-मनन कर अस्वस्थ दृष्टिकोणों को स्वस्थता प्रदान करना क्या स्त्री-विमर्श नहीं ? भले ही गार्गी, रोमषा आदि वैदिक नारियों ने मुक्ति के नाम पर न संघर्ष किया हो, पर सर का धड़ से अलग होने की धमकी मन को आंदोलित करता ही है । भले ही सीता ने रो-धोकर त्याज्य जीवन जीया हो पर भगवान कहे जाने वाले जिस राम ने उनका इतना अपमान किया ऐसे पति के पास वापस जाने की अपेक्षा मृत्यु को गले लगाना क्या विरोध नहीं ? जबकि देखा जाय तो सुपर्णखा हिम्मती थी, प्रेम निवेदन का उत्तर नाक कटवाना तो नहीं हो सकता ! परिणामतः युद्ध । महाभारत में द्रोपदी के अपमान का बदला सर्वविदित ही है । थेरियों गाथाओं का दर्द कहें या भक्ति काल में नारियों का ईश्वर में अद्भुत समर्पण, मूक स्त्री-त्रासदी की गाथा ही तो है । प्रसिद्ध महिला साहित्यकारों में भक्तिकाल की मीरा और छायावादी महादेवी वर्मा आजीवन विद्रोहिणी रहीं । उनके समय में स्त्री-मुक्ति आंदोलन जैसा कोई नाम नहीं था, अन्यथा वे दोनों अपने निजी जीवन में लिए गए फैसलों के कारण उग्र अथवा कट्टरपंथी नारीवाद की प्रमुख नायिकाएँ होतीं ।
       नारीवाद उदारवादी, उग्र अथवा कट्टरपंथी, मनोविश्लेषणवादी, मार्क्सवादी तथा समाजवादी से होते हुए उत्तर-आधुनिक नारीवाद तक अनेक उतार-चढ़ावों के साथ सफर तय किया । सभी धाराओं की अपनी-अपनी विशेषता रही, किन्तु सभी धाराओं का समन्वय उत्तर-आधुनिक नारीवाद में ही दृष्टिगत होता है । आज उत्तर-आधुनिक नारीवाद सत्ता की ओरियानी के नीचे आ चुका है, ऐसी स्थिति में स्त्री पुरी तरह से न तो घर के अंदर है न बाहर, न मुक्त है और न ही पराधीन । यह कौन सा अंतर्द्वन्द है कि गाँवों में स्थिति जस की तस है और शहरीकरण को लेकर हम उछल-कूद करते रहते हैं !! लेकिन इतना अवश्य कहा जा सकता है कि यह नारीवाद अपने पूर्ववत् सास रूपी नारीवादी विचारधाराओं की संकुचित गाँठ को फेंककर बचे हुए अच्छे कपड़ों से ननद के झब्बे पर पैबंद लगाने में माहिर है । आज ये गगन में दीयना बरने का इंतज़ार नहीं कर रहा, बल्कि वे स्वयं ज्योति जलाना जानता है, और यही नहीं यह सिर्फ घर में खाना परोसकर मीरगों का पेट नहीं पाल रहा बल्कि घर के बाहर भी अनेक मीरगों के जीने की उम्मीद है ।     
       आज उत्तर-आधुनिक नारीवाद के व्यापक पटल पर स्त्री-विमर्श और पुरूष-विमर्श का अनोखा क्षितिज दिखाई देने लगा है । क्या यह मात्र समता, समानता और सद्भावना जैसे प्रजातांत्रिक मूल्यों का ध्रुवीकरण है या फिर व्यक्ति-सत्य के साथ समष्टि-सत्य का समागम । एक ओर जहाँ अत्याचारों, व्याभिचारों का स्त्रियाँ पुरज़ोर विरोध कर रही हैं वहीं दूसरी ओर उत्तरआधुनिक नारीवाद उग्र नारीवादी विचाराधारा के विपरीत परिवार, प्रजनन और प्रेम की ओर लौट आया है । उग्र या कट्टरपंथी नारीवाद के इमेजेज ऑफ विमेन का सिद्धांत विवाह और मातृत्व से मुक्ति से उत्तर-आधुनिक नारीवाद सहमत नहीं है । शुलमिथ फायरस्टोन के गर्भ जैसे फिजूल अंग को काटकर फेंकने जैसे विचारों का यह घोर विरोधी है । उत्तरआधुनिक महिला साहित्यकारों का मानना है कि स्त्री-पुरूष एक दूसरे के पूरक हैं इसलिए विवाह, मातृत्व और परिवार सृष्टि के विकास में सहायक है न कि बाधक । कृष्णा सोबती, रमणिका गुप्ता, मैत्रेयी पुष्पा, अनामिका, कात्यायनी, सुशीला टाकभौरे आदि महिला साहित्यकारों के साहित्य में प्रेम, परिवार और प्रजनन का महत्वपूर्ण स्थान है और वे एक ऐसे सूरज को जन्म देना चाहती हैं कि जो पूरे विश्व को प्रकाशित कर सके ।
       जहाँ एक ओर विरोध है वहीं दूसरी ओर अपने पूर्ववत् नारीवाद के कुछ विचारधारा से सहमत भी है । सिमोन द बोउवार के अनुसार स्त्री स्त्री पैदा नहीं होती, स्त्री बना दी जाती है को उत्तर-आधुनिक नारीवाद ने समझा तथा उदारवादी नारीवाद के जीवशास्त्रीय समानताओं एवं विषमताओं को समझते हुए अपना कदम आगे बढ़ाया । मनोविश्लेषणवादी नारीवाद के अंतर्गत यह नारीवाद लिंग की अवधारणाओं को तोड़ता है तथा स्त्री की निष्क्रियता को खारिज करता है तथा इरिगेरे के सेक्स संबंधी सिद्धांतों से सहमती रखता है , मार्क्सवादी और समाजवादी नारीवाद के श्रम तथा अर्थ के सिद्धांतों का यह हृदय से स्वागत करता है और अपने अनुभूतियों को ठोस तथा स्थिर रूप प्रदान करता है । यह अपने सिद्धांतों को मूल्यों से जोड़कर स्त्रीवाद को एक नया आयाम प्रदान करता है । ये मूल्य कहीं अलग से नहीं आये हैं बल्कि जो मूल्य समता रूपी दर्पण में धुँधला हो गया था, उसे ही झाड़-पोछकर साफ किया तथा अब तक चले आ रहे सत्ताधारियों द्वारा निर्धारित जीवन-मूल्यों पर नई दृष्टि से चिंतन-मनन किया ।
        कदाचित् यही कारण है कि उत्तर-आधुनिक नारीवाद पितृसत्ता का स्थानांन्तरण मातृसत्ता में नहीं करना चाहता बल्कि समानता में करना चाहता है । यह नारीवाद समता, समानता और सद्भावना आदि प्रजातांत्रिक मूल्यों के लिए संघर्षरत् तो है ही, लेकिन इसका प्रमुख लक्ष्य मानवीय मूल्य है ।


डॉ. रेनू यादव
रिसर्च / फेकल्टी असोसिएट
गौतम बुद्ध विश्वविद्यालय
यमुना एक्प्रेस-वे, नियर कासना,
गौतम बुद्ध नगर, ग्रेटर नोएडा (उ.प्र.) – 201312

ई-मेल – renuyadav0584@gmail.com

गुरुवार, 3 अप्रैल 2014

‘आग में गर्मी कम क्यों है ?’ – सुधा ओम ढ़ींगरा


आग में गर्मी कम क्यों है ?’ – सुधा ओम ढ़ींगरा

      प्रवासी साहित्यकारों में चर्चित साहित्यकार सुधा ओम ढ़ीगरा ने साहित्य को एक नया आयाम प्रदान किया है । इन्होंने अपने साहित्य में भारतीय एवं पाश्चात्य संस्कृति, परिवेश, भाषा और परंपरा का, शरीरविज्ञान, मनोविज्ञान और मानवीयता का, संवेदना और वेदना का, मानव जीवन के सहजता और असहजता का एक ऐसा शनैः शनैः प्रवाहित होने वाला कॉकटेल प्रस्तुत किया है, जो पाठक के मानस पटल पर दूरगामी प्रभाव अंकित करता है । इनकी  कथाओं में अमेरिका का हर परिदृश्य प्रवासियों के साथ भारतीयता की साँसें लेता है । इनकी सबसे बड़ी विशेषता है कि ये कहानियों में संघर्षों के आलोड़न से उत्पन्न संवेदना को सहज और वैज्ञानिक रूप देती हैं, इन्होंने कभी भी किसी भी परिस्थिति में किसी भी पात्र पर दोषारोपण नहीं किया, बल्कि उन्हें कहानी की सहज धारा में स्वतः ही प्रवाहित होने देती हैं ।
     इनकी जल्द ही प्रकाशित कहानी-संग्रह कमरा नं. 103 में संग्रहित सभी कहानियाँ अपने आप में विशिष्ट हैं, लेकिन उनमें से आग में गर्मी कम क्यों है ?’ कहानी अपनी संवेदना एवं मनोवैज्ञानिक कारणों से मुझे सबसे अधिक प्रिय लगी । यह कहानी समलैंगिकता के भँवर में फँसी एक स्त्री के दर्द की कहानी है । लेखिका ने जितना सहज रूप से गे होने का वर्णन किया है, उतना ही मार्मिक ढ़ंग से गे की पत्नी होने की पीड़ा से पीड़ित संवेदना को दर्शाया है । राजकमल चौधरी ने अपने उपन्यास मछली मरी हुई में जिस बेबाक तरिके से लेस्बियननिज़्म का वर्णन किया है, सुधा जी ने उस बेबाकीपन को तो नहीं अपनाया पर एक मर्यादा के साथ समलैंगिकता का एक परिदृश्य अवश्य प्रस्तुत किया है । समलिंग या विपरीत लिंग के प्रति आकर्षण शरीर में उत्पन्न कैमिकल्स कारण है जिसे वैज्ञानिक नायिका साक्षी बखुबी समझती है, उसे जितना अधिक दुख उसके पति शेखर के समलिंगी होने से नहीं है उससे कहीं अधिक दुख शेखर के झूठ से है कि उसने इतने दिनों तक साक्षी को धोखे में रखा और प्यार का ढ़ोंग रचता रहा । इस कहानी की खास बात है कि यहाँ कोई भी पात्र एक-दूसरे को दोषी नहीं ठहराते बल्कि शरीर विज्ञान को समझते हुए सहज रूप से गतिशील होते हैं । शेखर साक्षी से अपने अंदर हुए बदलाव को चिकित्सकीय ढ़ंग में प्रस्तुत करता है – अभी नए शोधों से पता चला है कि पुरूषों में मेनोपाज होता है, जिसे एनड्रोपाज कहते हैं और उनमें धीरे-धीरे शारीरिक परिवर्तन होते हैं, महिलाओं की तरह एकदम नहीं । बाई सेक्सूअल इंसान उम्र के किसी भी हिस्से में, स्त्री-पुरूष, दोनों की तरफ़ आकर्षित हो सकता है और मेरी बदक़िस्मती है कि मैं बाई सेक्सूअल हूँ(ढींगरा, सुधा ओम. कमरा नं 103. पृ.19.)
                 साक्षी एक सुलझी हुई स्त्री है वह जेम्ज के साथ शेखर के रिश्ते को बच्चों की खातीर स्वीकार कर लेती है। यह सुधा की एक नयी स्त्री है - वह संवेदनशील है, अपने पति से अत्यधिक प्रेम करती है और अपने साथ हुए धोखे से वह परेशान भी है, फिर भी सच्चाई स्वीकार करती है, परिवार तोडने के बजाय उसे जोडे रखने में ही समझदारी समझती है । भले उसके अंदर से प्यार की गर्मी कम पड़ने लगे, पर वह साथ नहीं छोड़ती । यह सुधा की स्त्री का मजबूत पक्ष है पर पुरूष शेखर का कमज़ोर पक्ष है कि वह जेम्ज से मिले धोखे को सह नहीं कर पाता बल्कि आत्महत्या कर लेता है – जेम्ज उसे किसी और के लिए छोड़ गया, वह उसका अलगाव सह नहीं सका । वह जेम्ज को बहुत प्यार करता था, उसके जीवन का कोई अर्थ व औचित्य नहीं रहा । ऐसे जीवन को समाप्त करना उसने बेहतर समझा(ढींगरा, सुधा ओम. कमरा नं 103. पृ. 22.)
                 यह काम साक्षी भी कर सकती थी पर उसने ऐसा नहीं किया, और न ही पति से अपना अधिकार माँगा । यह एक उत्तरआधुनिक नारीवाद का प्रतीक है । वह परिस्थितियों से भागती नहीं, बल्कि रोष का घुंट पीकर भी समझदारी से सच्चाई स्वीकार करती है और उसका सामना भी करती है, क्योंकि उसके ऊपर परिवार की जिम्मेदारी है और आगे उसे बहुत कुछ करना है।
                 यह कहानी समलैंगिक-विमर्श के माध्यम से नैतिकता की दुनियाँ को चुनौती देती है तथा समलैंगिकता से प्रभावित परिवार की कहानी है जिसके कारण पति-प्रेम में संवेदना कम पड़ जाती है और उसके मृत्योपरांत भी नायिका की संवेदना जड़वत ही रहती है । वह न तो पति के खोने के पश्चात् पूरी तरह से टूटती है और न ही धोखेबाज पति से छुटकारा मिलने पर खुश होती है । ऐसी अनोखी संवेदना की जटिलता को प्रस्तुत करती है – आग गर्मी कम क्यों है ?’

 - डॉ. रेनू याद



सोमवार, 10 मार्च 2014


खिड़कियाँ खोल दी है
फगुनाहट के लिए
सिंहर रहीं हैं हवायें
बारीश की बूँदों के साथ
पर रंगत...
बिला है कहीं !

सोमवार, 25 नवंबर 2013

'कमरा नं 103' में प्यासी भारतीय संवेदनाएँ

'शोध दिशा', अंक 23 (जुलाई-सितम्बर 2013) में सुधा ओम ढ़ीगरा की कहानी-संग्रह 'कमरा नं. 103' पर लिखी पुस्तक समीक्षा 'कमरा नं 103 में प्यासी भारतीय संवेदनाएँ' प्रकाशित -





सोमवार, 22 जुलाई 2013

Rishte

रिश्ते - 1

रिश्ते समुद्र की तरह होना चाहिए
जिसमें समा जाए कोई भी नदी
रिश्ते नहीं होना चाहिए गड्ढ़े या तालब की तरह
जो बारिश के साथ भर जाए, अन्यथा सूख जाए

रिश्ते - 2

रिश्ते खुले आसमान की तरह होना चाहिए
जिसमें समा जाए पूरी पृथ्वी और बह्माण्ड भी
रिश्ते नहीं होने चाहिए तारों की तरह
जो किसी और की रोशनी से टिमटिमाए

रिश्ते - 3

रिश्ते बसन्त ऋतु की तरह होने चाहिए
जिसमें सूखे पत्ते भी खिले-खिले लगे
रिश्ते नहीं होने चाहिए पतझड़ की तरह
जिसमें खिले फूल भी मुरझाये लगे

मंगलवार, 30 अप्रैल 2013

Gulaab


गुलाब

गुलाब...
एक रोज दिए थे तुमने
इज़हार-ए-दोस्ती की खातीर
वो आज किसी फेकीं हुई
रद्दी की किताबों में मिली
जिसकी खुशबू आज भी बरकरार है
और तुम्हारा चेहरा धूँधला
हो चुका है...

सोमवार, 1 अप्रैल 2013

काव्य-संग्रह - मैं मुक्त हूँ