बुधवार, 28 मई 2014

उत्तर-आधुनिक नारीवाद

सुधा ओम ढ़ींगरा द्वारा संपादित 'हिन्दी-चेतना' (कैनेडा) के जनवरी - मार्च, 2014 अंक में स्त्री-विमर्शी स्तंभ 'ओरियानी के नीचे' में प्रकाशित -

उत्तर-आधुनिक नारीवाद

सास का गट्ठर गट्ठर है, ननद का झब्बा झूलता है ।
जब गगन में दीयना बरता है, तब अँगन में मीरगा चरता है ।।
       यह कहावत गरीबी के संदर्भ में है, किन्तु पाश्चात्य के अनुकरण के संदर्भ में देखा जाए तो भारतीयों पर सटिक बैठता है । पाश्चात्य में जैसे ही नई विचारों का सुनगुन होता है, वैसे ही हम भारतीय सोचने लगते हैं कि हमारे वहाँ भी वैसा ही होना चाहिए और बाद में हम कहने लग जाते हैं कि यह अवधारणा पाश्चात्य से आई है । इससे कहीं न कहीं चिराग तले अंधेरा चरितार्थ होती है । सत्य तो यह है कि हम अपने इतिहास को बार-बार खंगाल तो रहे हैं, पर उसे मानना नहीं चाहते । सत्ता के चौखट के अंदर वैदिककाल से लेकर अब तक स्त्रियों ने न जाने कितने विरोध और विद्रोह किए, पर उसे हम स्त्री-मुक्ति आंदोलन में सम्मिलित नहीं कर सकते । क्योंकि उस समय किसी ने स्त्री-मुक्ति आंदोलन, नारीवाद अथवा स्त्री-विमर्श का नाम नहीं दिया था और न ही स्त्री-मुक्ति आंदोलन के लिए संघर्ष होता था, वह संघर्ष तो समस्याओं या लगातार हो रहे शोषण से मुक्ति के लिए था । फिर प्रश्न उठता है कि स्त्री-विमर्श है क्या ?
      स्त्री के विषय में उसके सुख-सुविधाओं से लेकर प्रत्येक समस्याओं के परिप्रेक्ष्य में ऐतिहासिक, सामाजिक, धार्मिक, सांस्कृतिक, आर्थिक और मनोवैज्ञानिक दृष्टि से सूक्ष्म से सूक्ष्मतम् चिंतन-मनन कर अस्वस्थ दृष्टिकोणों को स्वस्थता प्रदान करना क्या स्त्री-विमर्श नहीं ? भले ही गार्गी, रोमषा आदि वैदिक नारियों ने मुक्ति के नाम पर न संघर्ष किया हो, पर सर का धड़ से अलग होने की धमकी मन को आंदोलित करता ही है । भले ही सीता ने रो-धोकर त्याज्य जीवन जीया हो पर भगवान कहे जाने वाले जिस राम ने उनका इतना अपमान किया ऐसे पति के पास वापस जाने की अपेक्षा मृत्यु को गले लगाना क्या विरोध नहीं ? जबकि देखा जाय तो सुपर्णखा हिम्मती थी, प्रेम निवेदन का उत्तर नाक कटवाना तो नहीं हो सकता ! परिणामतः युद्ध । महाभारत में द्रोपदी के अपमान का बदला सर्वविदित ही है । थेरियों गाथाओं का दर्द कहें या भक्ति काल में नारियों का ईश्वर में अद्भुत समर्पण, मूक स्त्री-त्रासदी की गाथा ही तो है । प्रसिद्ध महिला साहित्यकारों में भक्तिकाल की मीरा और छायावादी महादेवी वर्मा आजीवन विद्रोहिणी रहीं । उनके समय में स्त्री-मुक्ति आंदोलन जैसा कोई नाम नहीं था, अन्यथा वे दोनों अपने निजी जीवन में लिए गए फैसलों के कारण उग्र अथवा कट्टरपंथी नारीवाद की प्रमुख नायिकाएँ होतीं ।
       नारीवाद उदारवादी, उग्र अथवा कट्टरपंथी, मनोविश्लेषणवादी, मार्क्सवादी तथा समाजवादी से होते हुए उत्तर-आधुनिक नारीवाद तक अनेक उतार-चढ़ावों के साथ सफर तय किया । सभी धाराओं की अपनी-अपनी विशेषता रही, किन्तु सभी धाराओं का समन्वय उत्तर-आधुनिक नारीवाद में ही दृष्टिगत होता है । आज उत्तर-आधुनिक नारीवाद सत्ता की ओरियानी के नीचे आ चुका है, ऐसी स्थिति में स्त्री पुरी तरह से न तो घर के अंदर है न बाहर, न मुक्त है और न ही पराधीन । यह कौन सा अंतर्द्वन्द है कि गाँवों में स्थिति जस की तस है और शहरीकरण को लेकर हम उछल-कूद करते रहते हैं !! लेकिन इतना अवश्य कहा जा सकता है कि यह नारीवाद अपने पूर्ववत् सास रूपी नारीवादी विचारधाराओं की संकुचित गाँठ को फेंककर बचे हुए अच्छे कपड़ों से ननद के झब्बे पर पैबंद लगाने में माहिर है । आज ये गगन में दीयना बरने का इंतज़ार नहीं कर रहा, बल्कि वे स्वयं ज्योति जलाना जानता है, और यही नहीं यह सिर्फ घर में खाना परोसकर मीरगों का पेट नहीं पाल रहा बल्कि घर के बाहर भी अनेक मीरगों के जीने की उम्मीद है ।     
       आज उत्तर-आधुनिक नारीवाद के व्यापक पटल पर स्त्री-विमर्श और पुरूष-विमर्श का अनोखा क्षितिज दिखाई देने लगा है । क्या यह मात्र समता, समानता और सद्भावना जैसे प्रजातांत्रिक मूल्यों का ध्रुवीकरण है या फिर व्यक्ति-सत्य के साथ समष्टि-सत्य का समागम । एक ओर जहाँ अत्याचारों, व्याभिचारों का स्त्रियाँ पुरज़ोर विरोध कर रही हैं वहीं दूसरी ओर उत्तरआधुनिक नारीवाद उग्र नारीवादी विचाराधारा के विपरीत परिवार, प्रजनन और प्रेम की ओर लौट आया है । उग्र या कट्टरपंथी नारीवाद के इमेजेज ऑफ विमेन का सिद्धांत विवाह और मातृत्व से मुक्ति से उत्तर-आधुनिक नारीवाद सहमत नहीं है । शुलमिथ फायरस्टोन के गर्भ जैसे फिजूल अंग को काटकर फेंकने जैसे विचारों का यह घोर विरोधी है । उत्तरआधुनिक महिला साहित्यकारों का मानना है कि स्त्री-पुरूष एक दूसरे के पूरक हैं इसलिए विवाह, मातृत्व और परिवार सृष्टि के विकास में सहायक है न कि बाधक । कृष्णा सोबती, रमणिका गुप्ता, मैत्रेयी पुष्पा, अनामिका, कात्यायनी, सुशीला टाकभौरे आदि महिला साहित्यकारों के साहित्य में प्रेम, परिवार और प्रजनन का महत्वपूर्ण स्थान है और वे एक ऐसे सूरज को जन्म देना चाहती हैं कि जो पूरे विश्व को प्रकाशित कर सके ।
       जहाँ एक ओर विरोध है वहीं दूसरी ओर अपने पूर्ववत् नारीवाद के कुछ विचारधारा से सहमत भी है । सिमोन द बोउवार के अनुसार स्त्री स्त्री पैदा नहीं होती, स्त्री बना दी जाती है को उत्तर-आधुनिक नारीवाद ने समझा तथा उदारवादी नारीवाद के जीवशास्त्रीय समानताओं एवं विषमताओं को समझते हुए अपना कदम आगे बढ़ाया । मनोविश्लेषणवादी नारीवाद के अंतर्गत यह नारीवाद लिंग की अवधारणाओं को तोड़ता है तथा स्त्री की निष्क्रियता को खारिज करता है तथा इरिगेरे के सेक्स संबंधी सिद्धांतों से सहमती रखता है , मार्क्सवादी और समाजवादी नारीवाद के श्रम तथा अर्थ के सिद्धांतों का यह हृदय से स्वागत करता है और अपने अनुभूतियों को ठोस तथा स्थिर रूप प्रदान करता है । यह अपने सिद्धांतों को मूल्यों से जोड़कर स्त्रीवाद को एक नया आयाम प्रदान करता है । ये मूल्य कहीं अलग से नहीं आये हैं बल्कि जो मूल्य समता रूपी दर्पण में धुँधला हो गया था, उसे ही झाड़-पोछकर साफ किया तथा अब तक चले आ रहे सत्ताधारियों द्वारा निर्धारित जीवन-मूल्यों पर नई दृष्टि से चिंतन-मनन किया ।
        कदाचित् यही कारण है कि उत्तर-आधुनिक नारीवाद पितृसत्ता का स्थानांन्तरण मातृसत्ता में नहीं करना चाहता बल्कि समानता में करना चाहता है । यह नारीवाद समता, समानता और सद्भावना आदि प्रजातांत्रिक मूल्यों के लिए संघर्षरत् तो है ही, लेकिन इसका प्रमुख लक्ष्य मानवीय मूल्य है ।


डॉ. रेनू यादव
रिसर्च / फेकल्टी असोसिएट
गौतम बुद्ध विश्वविद्यालय
यमुना एक्प्रेस-वे, नियर कासना,
गौतम बुद्ध नगर, ग्रेटर नोएडा (उ.प्र.) – 201312

ई-मेल – renuyadav0584@gmail.com

गुरुवार, 3 अप्रैल 2014

‘आग में गर्मी कम क्यों है ?’ – सुधा ओम ढ़ींगरा


आग में गर्मी कम क्यों है ?’ – सुधा ओम ढ़ींगरा

      प्रवासी साहित्यकारों में चर्चित साहित्यकार सुधा ओम ढ़ीगरा ने साहित्य को एक नया आयाम प्रदान किया है । इन्होंने अपने साहित्य में भारतीय एवं पाश्चात्य संस्कृति, परिवेश, भाषा और परंपरा का, शरीरविज्ञान, मनोविज्ञान और मानवीयता का, संवेदना और वेदना का, मानव जीवन के सहजता और असहजता का एक ऐसा शनैः शनैः प्रवाहित होने वाला कॉकटेल प्रस्तुत किया है, जो पाठक के मानस पटल पर दूरगामी प्रभाव अंकित करता है । इनकी  कथाओं में अमेरिका का हर परिदृश्य प्रवासियों के साथ भारतीयता की साँसें लेता है । इनकी सबसे बड़ी विशेषता है कि ये कहानियों में संघर्षों के आलोड़न से उत्पन्न संवेदना को सहज और वैज्ञानिक रूप देती हैं, इन्होंने कभी भी किसी भी परिस्थिति में किसी भी पात्र पर दोषारोपण नहीं किया, बल्कि उन्हें कहानी की सहज धारा में स्वतः ही प्रवाहित होने देती हैं ।
     इनकी जल्द ही प्रकाशित कहानी-संग्रह कमरा नं. 103 में संग्रहित सभी कहानियाँ अपने आप में विशिष्ट हैं, लेकिन उनमें से आग में गर्मी कम क्यों है ?’ कहानी अपनी संवेदना एवं मनोवैज्ञानिक कारणों से मुझे सबसे अधिक प्रिय लगी । यह कहानी समलैंगिकता के भँवर में फँसी एक स्त्री के दर्द की कहानी है । लेखिका ने जितना सहज रूप से गे होने का वर्णन किया है, उतना ही मार्मिक ढ़ंग से गे की पत्नी होने की पीड़ा से पीड़ित संवेदना को दर्शाया है । राजकमल चौधरी ने अपने उपन्यास मछली मरी हुई में जिस बेबाक तरिके से लेस्बियननिज़्म का वर्णन किया है, सुधा जी ने उस बेबाकीपन को तो नहीं अपनाया पर एक मर्यादा के साथ समलैंगिकता का एक परिदृश्य अवश्य प्रस्तुत किया है । समलिंग या विपरीत लिंग के प्रति आकर्षण शरीर में उत्पन्न कैमिकल्स कारण है जिसे वैज्ञानिक नायिका साक्षी बखुबी समझती है, उसे जितना अधिक दुख उसके पति शेखर के समलिंगी होने से नहीं है उससे कहीं अधिक दुख शेखर के झूठ से है कि उसने इतने दिनों तक साक्षी को धोखे में रखा और प्यार का ढ़ोंग रचता रहा । इस कहानी की खास बात है कि यहाँ कोई भी पात्र एक-दूसरे को दोषी नहीं ठहराते बल्कि शरीर विज्ञान को समझते हुए सहज रूप से गतिशील होते हैं । शेखर साक्षी से अपने अंदर हुए बदलाव को चिकित्सकीय ढ़ंग में प्रस्तुत करता है – अभी नए शोधों से पता चला है कि पुरूषों में मेनोपाज होता है, जिसे एनड्रोपाज कहते हैं और उनमें धीरे-धीरे शारीरिक परिवर्तन होते हैं, महिलाओं की तरह एकदम नहीं । बाई सेक्सूअल इंसान उम्र के किसी भी हिस्से में, स्त्री-पुरूष, दोनों की तरफ़ आकर्षित हो सकता है और मेरी बदक़िस्मती है कि मैं बाई सेक्सूअल हूँ(ढींगरा, सुधा ओम. कमरा नं 103. पृ.19.)
                 साक्षी एक सुलझी हुई स्त्री है वह जेम्ज के साथ शेखर के रिश्ते को बच्चों की खातीर स्वीकार कर लेती है। यह सुधा की एक नयी स्त्री है - वह संवेदनशील है, अपने पति से अत्यधिक प्रेम करती है और अपने साथ हुए धोखे से वह परेशान भी है, फिर भी सच्चाई स्वीकार करती है, परिवार तोडने के बजाय उसे जोडे रखने में ही समझदारी समझती है । भले उसके अंदर से प्यार की गर्मी कम पड़ने लगे, पर वह साथ नहीं छोड़ती । यह सुधा की स्त्री का मजबूत पक्ष है पर पुरूष शेखर का कमज़ोर पक्ष है कि वह जेम्ज से मिले धोखे को सह नहीं कर पाता बल्कि आत्महत्या कर लेता है – जेम्ज उसे किसी और के लिए छोड़ गया, वह उसका अलगाव सह नहीं सका । वह जेम्ज को बहुत प्यार करता था, उसके जीवन का कोई अर्थ व औचित्य नहीं रहा । ऐसे जीवन को समाप्त करना उसने बेहतर समझा(ढींगरा, सुधा ओम. कमरा नं 103. पृ. 22.)
                 यह काम साक्षी भी कर सकती थी पर उसने ऐसा नहीं किया, और न ही पति से अपना अधिकार माँगा । यह एक उत्तरआधुनिक नारीवाद का प्रतीक है । वह परिस्थितियों से भागती नहीं, बल्कि रोष का घुंट पीकर भी समझदारी से सच्चाई स्वीकार करती है और उसका सामना भी करती है, क्योंकि उसके ऊपर परिवार की जिम्मेदारी है और आगे उसे बहुत कुछ करना है।
                 यह कहानी समलैंगिक-विमर्श के माध्यम से नैतिकता की दुनियाँ को चुनौती देती है तथा समलैंगिकता से प्रभावित परिवार की कहानी है जिसके कारण पति-प्रेम में संवेदना कम पड़ जाती है और उसके मृत्योपरांत भी नायिका की संवेदना जड़वत ही रहती है । वह न तो पति के खोने के पश्चात् पूरी तरह से टूटती है और न ही धोखेबाज पति से छुटकारा मिलने पर खुश होती है । ऐसी अनोखी संवेदना की जटिलता को प्रस्तुत करती है – आग गर्मी कम क्यों है ?’

 - डॉ. रेनू याद



सोमवार, 10 मार्च 2014


खिड़कियाँ खोल दी है
फगुनाहट के लिए
सिंहर रहीं हैं हवायें
बारीश की बूँदों के साथ
पर रंगत...
बिला है कहीं !

सोमवार, 25 नवंबर 2013

'कमरा नं 103' में प्यासी भारतीय संवेदनाएँ

'शोध दिशा', अंक 23 (जुलाई-सितम्बर 2013) में सुधा ओम ढ़ीगरा की कहानी-संग्रह 'कमरा नं. 103' पर लिखी पुस्तक समीक्षा 'कमरा नं 103 में प्यासी भारतीय संवेदनाएँ' प्रकाशित -





सोमवार, 22 जुलाई 2013

Rishte

रिश्ते - 1

रिश्ते समुद्र की तरह होना चाहिए
जिसमें समा जाए कोई भी नदी
रिश्ते नहीं होना चाहिए गड्ढ़े या तालब की तरह
जो बारिश के साथ भर जाए, अन्यथा सूख जाए

रिश्ते - 2

रिश्ते खुले आसमान की तरह होना चाहिए
जिसमें समा जाए पूरी पृथ्वी और बह्माण्ड भी
रिश्ते नहीं होने चाहिए तारों की तरह
जो किसी और की रोशनी से टिमटिमाए

रिश्ते - 3

रिश्ते बसन्त ऋतु की तरह होने चाहिए
जिसमें सूखे पत्ते भी खिले-खिले लगे
रिश्ते नहीं होने चाहिए पतझड़ की तरह
जिसमें खिले फूल भी मुरझाये लगे

मंगलवार, 30 अप्रैल 2013

Gulaab


गुलाब

गुलाब...
एक रोज दिए थे तुमने
इज़हार-ए-दोस्ती की खातीर
वो आज किसी फेकीं हुई
रद्दी की किताबों में मिली
जिसकी खुशबू आज भी बरकरार है
और तुम्हारा चेहरा धूँधला
हो चुका है...

सोमवार, 1 अप्रैल 2013

काव्य-संग्रह - मैं मुक्त हूँ

बुधवार, 23 जनवरी 2013

Shahid

       शहीद


संसार के हवन कुंड के सामने

जब बंधी थी हमारे रिस्तों

की गांठ

तब फेरे लिए थे हमने

रीति-रिवाजों के साथ

शहनाइयों के सुर में सुर मिलाकर

सुरीला लग रहा था हमारा जीवन


पर सुर को बेसुरा कर

चले गए तुम उसी रात

देश-सेवा हेतु


हेतु तो मेरे जीवन का

बस यही रह गया

तुम और तुम्हारा परिवार

तुम्हारे रिस्ते, तुम्हारी परंपराएँ...


तुम्हारे ड्यूटी में दुन्दुभी

बजती थी

और मेरा जीवन हर समय

था एक रणक्षेत्र

और मैं सुनती रहती थी

हर रोज एक नयी नई दुन्दुभी

की आवाज़


आवाज़... जो घर कर गई हैं

मेरे हृदय में

कि एक दिन तुम आओगे और

मुझे आवाज़ दोगे

पर...

ऐसा न हुआ


हुआ तो बस इतना कि

तुम आये

लौट आये बजती बिगुल के

साथ, तिरंगे के आवरण में

ताबूत को अपना कवच बना


कवच तो बना लिया था मैंने

भी तुम्हारे प्यार को

एहसास को, यादों को

तुम न होते हुए भी

होते थे हर पल मेरे साथ


साथ... जो होते हुए भी

कभी न था

सिंदुर बिन्दी और बिछुए

की सौगात के अलावा

जिससे मैं तुमसे जुडी थी

और तुम मुझसे


मुझसे तो बहुत कुछ

जुड़ गया था...

तुम्हारी प्रतीक्षा का दर्द

अपने होने न होने का एहसास

धनयुक्त निर्धन होने का आभास

परिवार के प्रति कर्तव्य का भास


कर्तव्य...

तुम बखूबी निभा रहे थे

देश के लिए

लेकिन क्या मेरे प्रति भी

तुम्हारा कोई कर्तव्य था

या अपने परिवार के प्रति

जिम्मेदारियों का एहसास

सिवाय साल में ढ़ाई महिने

की छुट्टी के अलावा ?


अलावे पर तो हर रोज

जल रही थी मैं

दिल में तुम्हारे प्यार की

ज्योति जलाए

कि कभी तुम भी रहोगे

हमारे साथ

चाहे बीस साल बाद ही सही

तुफानों को भी झेल गई

सुखमय जीवन की चाह में


सुखमय जीवन की चाह जब

पूरी होने को आई

तभी तुम छोड़ गए मेरा साथ

बीच भंवर में डूब गई नईया

देश का सफ़र तो निभा चूके

पर भूल गए कि तुम हो

मेरे भी हमसफ़र हो


हमसफ़र...

तुम तो शहीद कहलाओगे,

नवाजे जाओगे

वीरता के पुरस्कार से

पर मैं...

मैं क्या कहलाऊँगी

मेरा तो पूरा जीवन शहीद

हुआ है तुम पर

जीऊँगी मैं हर पर

तिल-तिलकर

सिर्फ मैं ही नहीं तुम्हारे

माता-पिता

और तुम्हारे परिवार के साथ-साथ

समस्त रिस्तेदार भी

शहीद हैं


हे शहीद ! बोलो...

इस शहीद पत्नी और परिवार को

कौन सा नाम दोगे

बोलो...

कौन से रत्न से हमें नवाजोगे

और कौन सा निभाओगे हमारे

लिए कर्तव्य


कर्तव्य निभाने की जिम्मेदारी

क्या सिर्फ मेरा है ?

नहीं…

मैं तो सीता भी नहीं बन सकी

कि तुम्हारे साथ जा सकूँ वन में

न ही हूँ कैकेयी या सत्यभामा

जो लड़ सकूँ तुम्हारे साथ युद्ध

नहीं है फूरसत मुझे

कि जौहर कर सकूँ

नहीं...

मैं नहीं हूँ इतनी महान

जो तुम्हारे जाने पर

न गिराऊँ एक बूँद भी आँसू

मुझे गर्व है तुम पर

पर मैं हूँ एक साधारण नारी

और मेरा जीवन भी

हुआ है शहीद...


हे शहीद...

बोलो...

अब कौन सा

वाद्ययंत्र मेरे शहीद

होने पर बजाओगे

और कौन से रत्न से

हमें नवाजोगे

या संसार के हवन-कुंड

में अब कौन सी

अग्नि जलाओगे...

बुधवार, 9 जनवरी 2013

BEMATLAB

          बेमतलब



बेमतलब लगती हैं इनकी हरपल पनीली स्वप्नीली आँखें

बेमतलब लगता है इनका हरपल बड़बड़बड़ाना

बेमतलब होता है इनका इस घर से उस घर तक झाँक आना

बेमतलब होता है कभी भी अपनों के नाम पर हाथ पसारना

पर, हर बेमतलब के पीछे

होता है कोई न कोई खास मतलब

मतलब पूरा करते करते ये स्वयं

प्रायः रह जाती हैं बेमतलब.

सोमवार, 7 जनवरी 2013

Parkiya

      परकीया




बड़े-बड़े डॉक्टरों ने

रोग बताया लाइलाज़

कुछ ने नखरा

कुछ ने बताया हिस्टीरिया

सारी बिमारियों के नाम के

बावजूद भी

नहीं पहचान पाया कोई वैद्य

नब्ज़


क्यों मुझे चाँद के पलकों

पर आँसू लटके दिखाई देते हैं

क्यों सूरज की तपन भी

सह जाती हूँ शून्य होकर

क्यों बारिश के बाणों से

आग लग जाती है बदन में

क्यों ठंड

ठंड नहीं जगा पाती

तन मन में

क्यों सिंहरन उठती है धूप में

क्यों छाता लेकर खोलना

भूल जाती हूँ खड़ी दोपहर में

क्यों हाथ में चश्मा लेकर

ढ़ूँढ आती हूँ पूरे घर में

क्यों आँसूओं में डूबते हुए

भी खाना ठूँसती हूँ मुँह में

क्यों हो जाती हूँ अकेली

भरी सभा में

क्यों डसती हैं यादें

तन्हाई में

क्यों नंगे पैरों घूम आती हूँ

शहर में

क्यों पैरों में चूभे काँटों के

दर्द लगते हैं कम

क्यों हँसी के पर्दे में

लिखती हूँ तड़पते गीत

क्यों रात भर जाग-जाग कर

रटती रहती हूँ मीत मीत


क्यों जान होकर भी

हो गई हूँ बेजान

क्यों हर वक़्त रहता है

लबों पे उनका ही नाम

क्यों हर साँस में आती जाती है

उनके ही यादों की साँस


साँसों का क्या ?

अंदर आती हैं

प्राणवायु बनकर

और जाते समय

बन जाती हैं

मृत्युवायु

और अब तो

नीम बनकर

पीने लगी हूँ जीते-जी

मृत्युवायु...


क्यों बार-बार सिंदूर

लगाकर पोछ देती हूँ

कि शायद

सिंदूर लगाने से

तुम फिर से मेरे हो जाओ

या फिर पोछ देने से

टूट जाए ये रिस्ता

ताकि मुक्त हो सकूँ

तुम्हारी यादों से

पर...

ऐसा कुछ भी नहीं होता

होता है तो बस यही

कि तुमसे

जितना अलग होना

चाहती हूँ

न जाने कैसे तुम

उतना ही मुझसे

जुड़ते चले जाते हो

और...

तुम जीवन से जाकर भी

हृदय से नहीं जा पाते हो


क्या तुम्हें भी कभी

आती होगी हमारी याद

क्या याद किया होगा कभी

जागकर रात रात

वो वक्त

जो अब जमकर

थक्के बन चूके हैं...

या हमारे याद करने से

क्या आती हैं कभी

तुम्हें भी हिचकियाँ


तुम्हें हिचकियाँ आये

न आये

पर मैं ही याद करती हूँ और

मेरी ही आती हैं हिचकियाँ

शायद किसी याद के भ्रम में


सारी बिमारियों के नाम

के बावजूद भी

नहीं पहचान पाया

कोई वैद्य नब्ज़

जिसकी रगों में बहता है

उनके प्यार का नब्ज़

जिन्होंने अपनी नब्ज़

सौंप दी किसी और की

नब्ज़ को


तुमने सिर्फ मुझसे ही

रिस्ता नहीं तोडा

बल्कि तोड़ा है हमसे जूडे

हर रिस्ते को

मेरे तन को मेरे मन को

और मेरी आत्मा को भी

उन सारे खूबसूरत एहसासों

को, जिन्हें हमने सजाया था

हमारे घर और बगियों में

और देखा था एक छोटा-सा

सपना

जिसमें समा जाती है पूरी

की पूरी पृथ्वी


और...

अब यह पृथ्वी

पृथ्वी न होकर

बन गई है

परकीया...

शनिवार, 17 नवंबर 2012

PREM-VIVAH

प्रेम-विवाह


मंगलम् भगवान विष्णु, मंगलम् गरूण ध्वज

मंगलम्............................................

जीवन मंगलमय लगे

कर लिया प्रेम-विवाह

हृदय पर पत्थर रख

कट लिया माँ बाप से

प्रेम से सराबोर जीवन

मधुरम मधुरम गति

पकड़ने लगी

पीपल के पेड़-सी

लाभदायी भी लगी

मन करे पूज लो

मन करे छँहा लो

मन करे भूतहा पेड़ बना दो

या मन करे तो

सोमावरी अमावस्या के दिन

घुमरी घुमरी सूत भी लपेट दो

कोई छीन न ले इस रिस्ते को...



तुलसी पत्ता है यह प्रेम

जिस खाने में ड़ालो

पवित्रता के साथ-साथ

बरक्कत भी आती है

खुशियाँ तो मानो

जीवन के अंग अंग में

भीन रहा है



लेकिन हृदय का पत्थर

कभी कभी दर्द से

दरकता भी है

ठोकर मारता है हृदय को

क्या प्रेम इतना सर्वोपरि है

कि माँ-बाप का हृदय

कुचलकर जिया जाये

कठुआ गई थी माँ

जिस दिन सुना था उसने

बिटिया ने दूसरे जाति

में कर लिया बियाह

दहाड़ रहे थे पिता

मर गई वो हमारे लिए

गरज रहा था भाई

नहीं कर सकती है बहना

ऐसा कुकर्म

लकवा मार गया

बहन को

अब मेरा क्या होगा...

इन सब के बावजूद

अंदर ही अंदर फूट रहे थे

कठोर पहाड़ों के बीच

झरने के कई सोते

हहरते हहरते

काश ! यह सब झूठ होता...



अपने हृदय पर रखे पत्थर

से मैंने एक टूकड़ा उठाया

और फोड़ दिया रिस्तों का सिर

ठठाकर हँस पड़ी मेरी जीत

पिता ने जब मुँह पर दरवाजा

बंद किया

आँखों में आँसू लिए हँसा विद्रोह

रूढ़िवादी मानसिकता के खिलाफ

आज नहीं तो कल अपनाना ही

है, आखिर इन्हीं की तो खून हूँ !!



खून...

खून से याद आया प्रीतम प्यारे का

आखिर वो भी तो किसी

का खून है

उनके भी माँ बाप ने

ऐसा ही किया होगा

दर्द बराबर है, पर

एक-दूजे को संभालते

संभालते

पीपर-पात कबका झहर

चुका है

सूखी हड्डियाँ दिख रहीं हैं

पेड़ पर

सूखी हड्डियों पर भला

बगूले कैसे वास करे

हृदय पर रखे पत्थर से

घुटने लगी हैं साँसें

रिस्तों में नहीं बची कोई

आस

पत्थर पहाड़ बन गया है

खुशियों के सोते बीच

दरारें भी पड़ती हैं

चार जीवन इधर तो

अट्ठारह जीवन उधर

अट्ठारह को कैसे भूल जाये

और कैसे भूलते होंगे

वे लोग

जिन्होंने जीना सीखा

हमें देखकर

मरना जाना

हमसे बिछड़कर



परंपराओं के गलियारे में

संवेदनाओं का आना जाना

गलत तो नहीं

संवेदना की बाहों में

नई रीत-प्रीत का फलना-फूलना

गलत तो नहीं

गलत तो रूढ़ियों का विकृत्त

रूप लेना है

लेकिन विकृत्तियों से भागना !!

उसे समझने के बजाय...

कायरता है



प्रेम विवाह तो हो गया

पर

प्रेम-जाल में फंसे तो वे

रिस्ते हैं

जिसे समाज ने अपनी

गोदी में पनाह दिया

लेकिन...

भूल जाते हैं लोग

समाज में जीवन पलता है

जरूर

लेकिन समाज हमसे ही बनता है

और बनाता है नये-पुराने रीत-प्रीत



किसी का हृदय बार-बार

पत्थरों से

तोड़ चकनाचूर कर

देने से जाति व्यवस्था

तोड़ी नहीं जा सकता

और न ही अंतर्जातीय विवाह

की स्थापना की जा सकती है



विजय पताका तो

तब फहरायेगा

जब हम तुलसी बनेगे

अपने बीज से उपजायेंगे

अनेक तुलसी के पौधे

जीते-जी पूजा की थाल में सजेंगे

या मरते मुख की शोभा

किसी चरणामृत से कम न हो

यह प्रेम जीवन

या आचमन भरे हाथ

सूखकर भी बनें अमृत

अमृत बहे हर जीवन में

रिस्तों में, रीतों में, गीतों में

क्योंकि

पूर्णता में ही खुशी

है, अधूरेपन में नहीं

प्रेम-विवाह का गीत

अधूरा है,

कुछ कर्तव्य अभी बाकी है

विजय तो तब होगी

जब किसी घुसपैठिये की

तरह नहीं

बल्कि तुलसी के पौधे की तरह

प्रेम से आँगन में लगाई जाऊँ

क्योंकि

तुलसी की पूर्णता गंगा से है.

सोमवार, 12 नवंबर 2012

PYAZ

             प्याज


प्याज और औरत का रिस्ता

लगभग एक जैसा होता है

तकलीफ में लगती है झरार

पर होती है दर्द की दवा भी

है हर रिस्तों की जान

आलू गोभी भूजिया

हो या फ्राइड राइस,

दाल तड़का

या फिर नूडल्स ही

कच्चा हो या पक्का

हर रिस्तों में ढ़लना जानती है

प्याज