बुधवार, 9 मई 2012

Chaukavan Rad (Kahaani)

 
चउकवँ राड़ 

       नहीं... मैं एक पाँच साल के बच्चे से बियाह नाहीं कर सकती

       काहे नाहीं कर सकती, ऊ तोर रखवाला रहेगा, घर में खाये-पीये के मिलेगा ही... पूरे धन-जायदाद की मलिकन रहोगी, जिनगी आसानी से कट जायेगी...

       पर ईया....

       कुछू नाहीं... डरने की का बात है. खावो-पीयो... ओहुके पालो-पोसो... थोर और समय गुजरेगा तब तक तो उ जवान होही जायेगा. सर पर सवांग क साया बहुत ही जरूरी ह, खासकर अपने मरद क... नाहीं त दुनिया औरतन के कच्चा काट खात ह. बच्चा... हमार ईज्ज़त अब तुहारे हाथ में है.

       ईज्ज़त...

       वैसे भी भगवान हम सबके मुँह पर कारिखा पोत दिए हैं, नाहीं त तू चउकवँ राड हो जाती

       राड़...

       सुनते ही नीलम का मुँह करिया झांवर हो गया... आँसू पलक तक आते-आते ठहर गया, बिन गवनहरू लड़की अपने परानी के खतीर रो भी नाहीं सकती.

       

       कितना बड़ा दुर्भाग्य है कि छोटका भाई के जनम के दस दिन बाद ही बाबू जी बलड कैंसर की बिमारी से तड़प-तड़प कर इसी ओसारे में चल बसे. हम दो बहने दो भाई बडका बाबूजी के सहारे पलने लगे. वे पालते क्या थे बेगारी भठते थे. मरे बैल की तरह बाबा-ईया और हम सबकी बैलगाड़ी खींचते थे. अम्मा खेत में काम करने निकल पड़ी, कटनी-सोहनी के साथ-साथ गाय भैंस पालने लगी. तब जाकर कइसो गुजारा होता था. इसी खींचा-तानी में हम भी छ: तक पढ़ लिए. लेकिन रोज-रोज बड़की माई क ताना करेजा छलनी कर देता था, कुछ जवाब दे देने पर बड़का बाबूजी अलगउजी पर उतर आते थे. बड़का बाबा भी हार मानकर अलगाने की बात करने लगे, लेकिन छोटका बाबा सबको एकवटने में लगे रहे. पर ईया अपनी सवारथ भरी आँखों से मुलूर-मुलूर देखती रही और कहती कि जो हमार सेवा-टहल बजायेगा, हम उसी में रहेंगे. उन्हें एक बार भी खयाल नहीं आया कि वैधव्य के दंश के साथ एक विधवा अकेले चार-चार बच्चों को कैसे पालेगी? आखिरकार बड़े बाबूजी के हिस्से में दादा जी और मझले बाबूजी  के हिस्से में ईया आयी. छोटका बाबा हम लोगों के साथ खड़े हो गयें; हमरे त परिवार नाहीं ह, पर इह लोग हमार परिवार हैं. जब तक जीयेंगे हम इनके साथ खड़ा रहेंगे. हमार राड़ पतोहि आखिर अपने चार-चार लइकन के साथ अकेलअ कैसे पालेगी.  जुग जमाना एतना खराब ह. भगवान न जाने कवने पाप क सज़ा दे रहे हैं.

छोटका बाबा के सहानुभूति का गाँव वालों ने अलग ही मतलब निकाला. सबने माई और बाबा के रिस्ते पर ऊँगली उठाई. पर दोनों बड़ी ही सच्चाई और ईमानदारी के साथ हमन के पाल-पोस के बड़ा किया. धीरे-धीरे गाँव वाले अपने-आप चुप हो गए.

       दस-बारह बरस के होते होते बाल फटने लगी, लोग हमरे बियाह के खातीर परेशान होने लगे. अम्मा तो अपनी धराऊ साड़ी के साथ-साथ थोड़ा-थोड़ा करके वियाह अउर गवने क सामान भी जूटाने लगी. खटिया-मचिया से लेकर मउनी-दऊरी, दही-तोपना, बटुली-बटूला और ओकर तोपना, मेजपोस, परदा, गेट सब सी-बीन कर रखने लगी, छठवीं कलास में ही बियाह हो गया. बियाह के बाद भला कैसी पढ़ाई. पढाई तो सिर्फ बियाह करने और पति को चिट्ठी-पतरी लिखने के लिए किया जाता है.

       मांग में सेनूर पड़ते ही हमने उनको अपना पति-परमेश्वर मान लिया, मन ही मन उनके ऊपर सबकुछ निछावर कर दिया. गवने की तइयारी हम भी करना शुरू कर दिए, काहे कि एकबारगी में ही सब कुछ होता नाहीं. चुप-चुप ही सखियों और भाभीयों से नीक-नीक ऊन मँगाकर उनके खातीर स्वेटर, कूलही और मोजा-दस्ताना सब बीन लिए. बियाह में घुँघट एतना था कि उनको देख ही नहीं पाये थे, लेकिन ऊज्जर-ऊज्जर गोड़ देखी थी. येसे अन्दाज त लग ही गया था कि गोरहर लोगों पर कैसा रंग खिलता है. सोचा था कि गवना जाड़ा में ही होता है.  गौना के पहली रात को जब अपने हाथ का सिला-बीना सामान दुँगी तो उ त हम पर मर मिटेंगे... जब-जब हमरे हाथ क बीना सुईटर पहनेंगे तब-तब हमरे प्यार क गर्मी उनकी संगी-साथी रहेगी.  

       बियाहे के तीसरे साल में ही गवने क दिन धरा गया. सब समान धराने-उसराने लगा. माई से बिछुड़ने क दु:ख और उनसे मिलने की खुशी एक साथ मेरे मन में हिलोरे लेने लगी. जैसे नदी पहाड़ की गोद से निकलकर सागर में समाने जा रही हो. अपने बाबूजी के मरने के बाद हम ही और छोटका बाबा माई क सहारा थे. बाबा कितनाहूँ तो का, मरद जाति. हर बात तो उनसे माई नाहीं कह सकती थी. येसे हमही माई के सबसे करीब रहें. माई एक महीने पहले से ही रो-रोकर घबराने लगी थी. उसको ये चिंता खाए जा रही थी कि गवने में कहीं कवनो सामान घट न जाये. औकात से जयादा तैयारी में जुट गयी थी. टेंटवाले, हलवाईवाले, कहार-कोहार सबको सट्टा दिया गया. कपड़ा खरीदकर बेलाऊज-साया सिलाने खातीर दर्जी को दिया गया. मन में खुशी क फूल खिलने लगा कि अचानक फूल क पराग गिरकर झहरा गया. गवने के सोलह दिन पहले खबर आयी कि उनका एक्सीडेंट हो गया. और फिर उसी एक्सीडेंट में...

       तब से लेकर हमरे जिनगी के साथ-साथ इ घर में भी सन्नाटा छाया है. न खाये क मन न पीये के, न घर में रहने का मन न ही कहीं जाने का, न कवनो खुशी न ही कवनो दु:ख. सब ने हमारी गरीबी देखकर हमसे नाता तोड़ लिया. माई क आपन घाव भरा ही न था कि उसपर हमारा बैधव्य.. मुँह के बल गिर पड़े हम लोग. माई रो-रोकर भगवान को कोसती रही कि हमके जो किये सो किये, हमरे बेटी के उह दुख काहें दिये. जीवन में हम ही अभागिन थे कि पति अउरी दामाद दूनो चल बसे. जेतना दु:ख मरदा के गईले नाहीं हुआ ओतना दमदा के गईले हो रहा है. कवन गलती हो गयी थी नाथ... अरे हमके उठा ले गये होते पर हमरे परान के राड़ काहे बनाये.

       माई के रोने से बन क पत्ता झहरा जाता था. पर माई से जियादा अभागिन मैं थी कि माई तो रोकर अपना मन हल्लुक कर लेती थी लेकिन हम त रो भी नहीं सकते थे. बियाहे के बाद और गवने से पहले की लड़की क पति न तो आपन होता है न ही पराया. पति नाम क मोहर तो लग जाती है पर उससे कोई सुख-सवारथ की इच्छा रखना पाप ही माना जाता है. अउर त अउर उस पति के अलावा किसी और के बारे में सोचना, बात करना अउरी बड़ा पाप माना जाता है. ऐसे में बिन गवनहरू लड़की अपने पति के खातीर रोये तो कइसे रोये. फफक-फफककर खूब रजाई में रोती रहती थी. ईया देखती तो कहती; जब गवना नाहीं हुआ तो ऊ तुहार मरद काहे का. उ दुसमन हो गया दुसमन. ऐसा सामाजिक चाल मकडी के जाल से कम नाहीं. जबतक ऊँ जिये तबतक हमार सब कुछ उह थे और मरने पर दुसमन हो गए, कइसे..?  जहिया से ये सासू चुटकी सेनूरवा, तहिया से स्वामी हमार गीत अब हमरे खातीर झूठ हो गया. सेनूरदान के समय से उनसे परेम क खुशबू हमरे तन मन में समा गया, लेकिन हम का करें यहां तो फूल सूखने के बाद खुशबू भी जिनगी से लोग मचोड़ देते हैं. करेजा काठ बन गया है.

       सच तो इ है कि दुनिया के नज़र से बचाने के खातीर छोटहने पर बियाह कर दिया जाता है और बियाह के बाद उस मरद के नज़र से भी बचाया जाता है कि कहीं लड़की बदचलनी न करने लगे. लेकिन दुनिया इ नाहीं समझती कि बियाह और गवने के बीच लड़कपन क सपना हम सबको कोढ़ी बना देता है. तिरसिया के मरद ने गवने से पहले ओके फोन कर दिया, ओकरे पास त फोन था नाहीं, त उसके मरद ने गाँव के लइका के फोने पर फोन किया. तिरसिया उस समय गोबर फेंकने गई थी त उसकी माई ने बतिया लिया. इ बात न जाने कइसे ओकरे बाबूजी को पता लग गई. फिर तो उ एइसन हड़कंप मचायें कि गाँव दंग रह गया. तिरसिया के माई को खूब लाठी-लाठी मारे और तिरसिया को खूब गारी देने लगे; जवानी मान में नाहीं आ रही ह का, कहलवा दें का कि गवना कराके उठा ले जा. तेही बोली होगी तब न उ फोन किया था, नाही त गाँव क लवण्डा क नम्बर ओके कइसे मिलता... तिरसिया लाजन धंसती जा रही थी, उ कहती रह गयी कि हमके कुछ नाहीं पता, लेकिन ओकर बात सुनता कवन. रो-रो कर ओकर आँख फूलके लाल गुब्बा हो गया.

       हमारा भी बहुत मन करता था उनसे बात करने का, लेकिन तिरसिया क हालत देखिके हम मन मार लिए थे कि हमरे बाबूजी नाहीं है तो लोग अउर उधुआ उठायेंगे. अउर पता नाहीं ऊ हमसे बात भी करेंगे कि नाहीं, पता नाहीं ऊ हमरे बारे का सोचेंगे. फिर हमहूँ मन मसोसकर रह गए. आज ऊ हमरे जिनगी से हमेसा-हमेसा के लिए चले गए फिर हम उनके भूल नहीं पा रहे हैं. अब पछताते हैं कि उ जवन भी सोचते कम से कम हम एक बात उनका बोली त सुन लेते, का पता कि उ हमसे कुछ अपने दिल क बात ही करते.

       गवने के खातीर जो साड़ी-वाड़ी सिलाया था उ सब फूँका गया. साथ ही हमार सपना भी राख हो गया. एइसा लगता है कि हम अपने पति से जयादा पति नामक मोहर से परेम कर बैठे थे, सिन्दूर की पहचान से परेम कर बैठे थे, तभी तो आज तक हम उस बिन देखे मनई को याद करके रो पड़ते हैं. बिना कोई रिस्ता बने ही हम उनकी ओर इतना झुक गए कि आज उनके बगैर अपने जिनगी के बारे में सोच भी नहीं पाते. कइसे काटूँगी अकेले एतना बड़ा जिनगी...

       

       ए मुँहझौसी... कवनो काम-धाम नाही ह का, जहाँ बैठती है दूब जाम जाता है....” (ईया गरियाते हुए चली गयी)

       का करें, कवनो काम-धाम में मन नाहीं लगता, अगर करती भी हूँ तो कुछ न कुछ गलती हो ही जाती है, तबो डाँट-फटकार सुनने को मिलती हैं. जियल हराम हो गया है. पहले डाँट पड़ती थी तब हम सोचते थे कि गवनव तक न डाँटेंगे, ओकरे बाद त हम अपने घर चले जायेंगे. लेकिन अब....

       माई क तबीयत दिन-ब-दिन बिगड़ रही है, घर में पइसा न कौड़ी, दवा कइसे कराऊँ. रोपनी-सोहनी से जो पइसा मिलता है उ दू जून की रोटी में ही खतम हो जाता है.



       सुन निलमी... काहे बियाह के खातीर तइयार नाहीं हो रही.. (कहते हुए माई घस्स से बैठ गयी)

        माई अब तुहऊँ... उनके गुजरे हुए साल भर भी नाहीं हुए औऊर हम कइसे किसी और की मेहरारू होने के बारे में सोचें..

       अरे तोके सोचे खातीर कवन कह रहा है, सोचे खातीर हम हैं न... ईया बाबा सब तइयार हैं. देख बेटी.. हमहूँ करेज्जा पर पाथर रखके कह रहे हैं... तू अबहिन छोटी हो, तुहके नाहीं पता कि मरने के बाद आपन परानी दुसमन बन जाला. इ कहो कि गवना नाही हुआ था, अगर गवना हो गया होता तो तुहार दूसर बियाह नाहीं हो पाता. कुवाँर-कचनार लड़की हो बियाह हो जायेगा त तुहार जिनगी सुधर जायेगी. तू नाहीं जानती एक राड़ की... ऊपर से जवान राड़ क जिनगी कइसन होती है, पूरा गाँव नोचने खाने को दउड़त है. कवनो खर्चा नाहीं देते लेकिन ईज्ज़त पर हाथ साफ करने खातीर और ईज्ज़त उछालने के खातीर सब तैयार रहते हैं. राड़ क जिनगी कवनो जिनगी नाहीं होती है. पहले पति के चिता पर मेहरारू सति हो जाती थीं, कम से कम मरके सरग तो मिलता था लेकिन अब हर दिन हर रात समाज चिता पर चढ़ाता है जिससे हम हर रोज मरकर भी नाहीं मरते और जीकर भी नाहीं जी पाते. बियाह के बाद कम से कम तुहार ईज्ज़त तो बची रहेगी.    

       बेटी... हम तुहार दुसमन नाहीं हैं. तू सोच तुहरे पीछे दो भाई और तुहार छोटकी बहिन हैं, उनका का होगा.

       तुहार सास-ननद गाँव के बहरा मिलने आई थीं. बड़ी भलमानस हैं ऊ लोग. तुहार सास रो-रो कर पपिहरा हो गई हैं, कह रहीं कि जवन गहना-कपड़ा हम दिए हैं वापस नाहीं लेंगे, एतना लगा-बझा के हम बियाह किए थे अपने बेटा का अऊर रऊरे भी की थी, सो सारा खर्चा भी बच जायेगा. बस दू जोड़ी कपड़े में बिदा कर देना.

        तुहार ननद त जइसे गऊँ हैं, उ तो कहने लगीं कि हमके रांड़ होने से कवनो परेसानी नाहीं है. हमरे भाई क एकलौती अऊरी आखिरी निसानी बची है. हमरे अँचरा में हमरे भऊजाई को हमरे पतोहि बनाकर डाल दो. रहल बात उनके छोटकी बहिन क त जवन हो सकी सब लगा-बझा के उनहू क बियाह हम करा देंगे.

       अब तू ही सोच कवन एतना सबके बारे में सोचता है. सोग पडी लड़की के केहू नाहीं अपनाता है. छूटकी क भी बियाह उ लोग करा देंगे. बेटी... हमहन में त एतना दम नाहीं है कि हम तूहार बियाह फिर कहीं अच्छे घर में करा पायें, जवन था सब वो बियाहे में लग गया. अब त दू जून की रोटी मिल जाए उह ढ़ेर है. अब जो कुछ सोचना है उ छोटकी के बारे में सोचना है कि उहो कइसो निबुक जाए, और दूनो लइके कइसो पढ़ लिख लें. जब भगवान हमहन के मुँह पर राड़ क करिखा पोत दिए हैं, तो कईसो जिनगी बिताना ही है. हम तो अपने बचवन क मुँह देखके कइसो बिता रहे हैं, पर तूहरे तो कवनो आधार नाहीं है.

       देख तुहरे ननद क एक ही बेटा है, बियाह के बाद दूनो जगहीं क धन-दऊलत तुहार अउरी तुहरे लइकन-फइकन क ही होगा. तू ठीक से सोच ले बेटी...

       इ सोचे चाहे न सोचे, हम बियाह कर देंगे. वइसे भी बियाहे में लइकनीन क मन कवन पूछता है (ईया बड़बड़ाते हुए चली गयी)



       अगर हमरे बियाहे से सबका भला होता है, त हम बियाह कर लेंगे. लेकिन का हमरे मरे हुए पति हमें इस बात के लिए हमें माफ कर देंगे, वे दूसरे के साथ हमके देख के भूत बनके नाहीं पकड़ेंगे? वइसहों बियाहे से पहले उनको सोखा-ओझा से बइठवाना पड़ेगा. पर हम त उनसे परेम करते हैं, फिर हम किसी और मरद से बियाह कइसे कर सकते हैं...

      नाहीं...हमके सिर्फ अपने बियाह के बारे में सोचना चाहिए...



       माई... हम बियाह कर लेंगे. उसके बाद त आप लोग खुश रह पाओगे न, का सचमुच उ लोग छूटकी क बियाह कर देंगे.

       हँ..हँ.. उ लोग कहे हैं तो करेंगे ही.

       अगर नहीं करें तो...

       कइसन बात करती हो, सुभ-सुभ बोलो. हमके पूरा भरोसा है.



       हम बियाह कर लेंगे.. नीलम कई दिनों तक सोचती रही. उधर बियाह की तैयारी होने लगी. नीलम ने खाना-पीना छोड दिया. चेहरा उतर आया. ईया कहने लगी लगन लग गई है, बडा सुभ बियाह है हमरे बहिनी क.

       नीलम दुविधा में जीने लगी. बियाह होगा तो परिवार क भला होगा, हमरो जिनकी जइसे-तइसे कट जायेगी. लेकिन कइसे...? उ तो पाँच साल का लइका है, एतना छोट त हमार छोटका भैयवा है. हम उसे पालेंगे, तब उ बड़ा होगा. कम से कम हम उससे पंद्रह-सोलह साल के बड़े होंगे. जब इ जवान होगा, तबतक हमार आधी उमर बीत चुकी होगी. फिर उ बच्चा हमरे बारे में न जाने का-का सोचेगा. हम सबकुछ जानते हुए कइसे उस बच्चे की जिनगी बरबाद कर दें...

       वह बड़हन होगा तब का हमरे रिस्ते को अपना लेगा, का जवान होने के बाद उ हमसे प्यार करेगा,  वह मुझे अपनी पत्नी का दर्जा देगा या महतारी का ? का उ हमसे नफरत नाहीं करेगा, का उ हमरे परिवार अऊर अपने माई-बाप को माफ कर पायेगा ?  अगर रिस्ता भी हमसे बना ले तबो उ मन से हमें नाहीं अपनायेगा... उ हमरे साथ कहीं जाने में भी लजायेगा काहें कि हम उनके आगे बुढ़ हो चुके होंगे. वह  अपनी जमीन जायदाद सब तो दे देगा लेकिन पत्नी का दर्जा...??? आखिर उनका भी तो मन होगा अपनी उमर की मेहरारू लाने का, फिर उ हमरे साथ काहे जिनगी गुजारेगा...

       आज हम जान रहे हैं कि अपने सवारथ के खातीर पूरा परिवार एकवट के हमारा बियाह कराना चाहता है, लेकिन उ बच्चा त इहो नाहीं जानता कि बियाह क मतलब का है. हमार जिनगी त मेहनत मजूरी चाहे यहाँ चाहे वहाँ करके गुजर जायेगा लेकिन उ बच्चा के बारे में केहू नाहीं सोच रहा. हम उनको पाल-पोस के उनके संरक्षक बन जायेंगे लेकिन पत्नी कभी नाहीं बन पायेंगे. हम औरतन के गाय समझके कवनो भी खूंटे में बाँध दिया जाता है, लेकिन उ तो मानूस है. वह हमरे साथ काहे बंधना चाहेगा. आखिर धन-दौलत ही तो सब-कुछ नाहीं होता, मनुस्यता भी तो कवनो चीज है. हम का करें, कुछू समझ में नाहीं आ रहा. एक ओर हमारा परिवार, बहन की जिनगी अऊरी दुसरे ओर उ बच्चा क जिनगी..



       दू अछर पढ़ का लिहनन, अपने आपके पंड़ित समझने लगनन. सहर से आया है.. इह सीख के आया है.. लतखउका... ईया गरियाते हुए कपारे पर खाची रखे चली आ रही है.

       का ह ईया”?  नीलम ने कांपती आवाज में पूछा.

        अरे हऊ रामरतना क सपूत सहरिया गया है, अधिकाराम... तुहरे बियाह के बारे में सुनते ही भड़क गया और कहने लगा कि काहे ओकर जिनगी बरबाद कर रहे तुहन लोगन. बिधवा ह त का हुआ कहीं न कहीं बियाह हो जाई. कह रहा था पाँच साल के लइका से बियाह कराओगे तो जेल में ढुकवा देंगे. लतमरूआ..          भला बता... कवन समझदार लइका राड़ी का हाथ थाम्ही.  जेल में ढुकवायेगा... इह दिन देखना रह गया था. हमन के दिन-रात क कवनो हैं नाहीं, कइसो तुहार बियाह हो जाता तो छोटकियो क पार-घाट लग जाता. बियाह करके हमनो तर जाते. रहल दूनों लइकन क बात त उ त लवण्डा जाति हैं, अपना कमायेंगे खायेंगे...

       बस ईया बस... उ लईका हैं तो कमा-खा सकते हैं अउर हम लइकी हैं त काहें नाहीं. अरे मेहनत मजूरी ही करनी है तो जइसे वहाँ करेंगे वइसहीं यहाँ भी कर लेंगे. अपने सवारथ के खातीर एक बच्चा क जिनगी बरबाद कर देना कहाँ क समझदारी है. का पता कि हमरे बियाह के बाद छोटकी क बियाह उ लोग करें ही न, छोटकन के पढावे खातीर पईसा ही न दे, फिर तब तुम लोग हमें कवने करे ढ़केलोगे...

       चुप रह.. बहुत बोलने लगी है, हमके पूरा विसवास ह कि उ लोग आपन वचन पुरावेंगे. और उ बच्चा कईसन, अब उ तोर भतार ह भतार... होखे वाला मरद है, अब उह तुहार सब-कुछ ह.

        नाहीं है हमार मरद... (तमतमा उठी नीलम) मेरा मरद अब ये दुनिया में कवनो नाहीं है, अऊर उ पाँच साल क लईका हमार मरद कब्बो ना बन पायेगा. उ बड़हन होके हरदम हम सबको कोसेगा. मति मारी गई है तुम लोगन की. सच त इ है कि अपने सवारथ के खातीर तू लोग हमार सौदा कर रहे हो, उहो उसके साथ जिसे बियाह क मतलब भी नाहीं पता है...

       अरे सोगियानउनी... मुँह क करिखा छूट जायेगा, अकेल वेवस महतारी राड़ बेटी लेके कवने-कवने घाट क पानी पियेगी, समझती काहे नाही. कवनो सौदा नाहीं हो रहा तुहार...”

       हो रहा है हमार सौदा... तुम लोग लालच में आन्हर हो गए हो, उ बच्चा से बियाह करके हम खुद अपनिय आँख से गिर जायेंगे. अब हम तुहन के सामने एकदम नाहीं झुकेंगे... छूटकी क बियाह ही करना है न... त हम करेंगे अउर अपने बलबूते पर... भगवान ने सुहागिन की किस्मत नाहीं दी त का हुआ, गुन-ढ़ंग और जांगर तो दिया है. रोपनी-सोहनी, कटिया-दवरी के साथ-साथ कढ़ाई-सिलाई सब करेंगे. एक-एक रूपिया जुटाकर दूनों भैयवन के पढ़ायेंगे अऊर छोटकी क बियाह भी करेंगे. इ राह जरूर कठिन है लेकिन एतना भी कठिन नाहीं कि हम कर न सकें. इ सब करके कम से कम हम अपने जिनगी भर उ बच्चा क जिनगी बरबाद करने के अपराधबोध से तो बच जायेंगे. तुहन लोगन कुछू कर लो लेकिन हम बियाह नाहीं करेंगे.

       ....................................

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       बिहानअ जाकर उनके घर से जो कुछ मिला था, रूपया- पैसा, कपड़ा-लत्ता और जेवर सब लउटा देना अउर कह देना हमने बियाह करने से मना कर दिया है.





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Rishton Ka Ganit

        रिश्तों का गणित 

रिश्तों का गणित 'प' से शुरू होता है 
पिता, पति, पुत्र, परमेश्वर,
परमात्मा और पहरेदार 

इनके गणित का फल बड़ा ही
विचित्र होता है
प-प (पिता-पति) = प (पति)
प+प (पति+पत्नी) = प (पुत्र)
पxप (पतिxपुत्र) प (पहरेदार)
प%प (पति%पुत्र) प (परमेश्वर-परमात्मा)
प से शुरू और प पर ख़तम
इन्हीं रिश्तों की सीपी में बंद 
हो जाता है देह विदेह 
जीवन इन्हीं रिश्तों के इर्द-गिर्द घुमता हुआ 
ढूंढ़ता  है अपनी पसंद, परम-आत्मा और प्रेम 
निहारता है जीवन की कलई में 
रिश्तों के प्रलेख 
और चाहता है प्रकाश 
क्या इनसे भिन्न भी होता है कोई प्रलाप 
जिस पर चलकर मिले प्रगति 
और मन हो जाये प्रसन्न
इन सबसे वंचित होकर अथवा पाकर 
मिले  परम-आनंद  

शुक्रवार, 3 फ़रवरी 2012

वक्त की आँधियों में पाया है आपको
दिल से परे होकर चाहा है आपको,
चाहते हैं आपको आँखों में बसाना
पर आँखों से जुदा नहीं जाना है आपको।

गुरुवार, 2 फ़रवरी 2012

वक्त की आँधियों में पाया है आपको
दिल से परे होकर चाहो आपको,
चाहते हैं आपको आँखों में बसाना
पर आँसुओं से अलग नहीं जाना है आपको।

रविवार, 15 जनवरी 2012

Kahaan ho tum?

    कहाँ हो तुम ?

कहाँ हो तुम?

जड़ में या चेतन में
पतझड़ या विरानों में 
जल में या हवाओं में
घर में या राहों में
शून्य में या साँसों में

नवजात शिशु की मुस्कानों में
गूंगे की भावनाओं में
बहरे की आंकन में
सबल की प्रगति में
या निर्बल के विश्वासों में

महसूस किया हर ओर
नज़र आते हो चारों ओर
मगर मृगमरीचिका बन
बहलाते हो या
बसते हो मेरी आहों में

कहाँ हो तुम ?

शुक्रवार, 25 नवंबर 2011

Vikshipt

             विक्षिप्त 

लाल रंग
प्यार का प्रतीक माना जाता है।
मैं भी दीवानी थी
   लाल रंग की
      बचपन से ही
बढ़ती उम्र के साथ-साथ
लाल रंग में होती गई लाल
पर..
लोगों के डर से कभी
   अपना न पाई
      रंग लाल
क्योंकि लोग कहेंगे
लड़की बिगड़ गई है।

फिर तुम...
मेरे जीवन में आए
मेरी मांग में सजाए
सुनहरा लाल
सजा दिया मेरा तन मन
समय हो गया नारंगी लाल
लजा गई मैं होकर
शूर्ख लाल

जब तुमने मुझे प्यार के
लाल रंग में रंग दिया था
तब जीवन में दिखने लगा था
हर रंग सूवर्ण लाल
तब सफेद रंग शांत
   होते हुए भी
      लगता था कड़वा
क्योंकि मैं थी टहाटह लाल

लेकिन...
आज सफेद रंग में भी अशांत हूँ
मन ढूँढ़ता है तुम्हारी ही लालिमा
यत्र-तत्र-अन्यत्र, और फिर....
निराश हो लौट आता है अपने
बेरंग घोसले में

याद है.. जब तुमने मेरी गोदी में
डाला था हमारा लाल
तब हमारा जीवन हो गया था
खुशनुमा लाल
उसकी हँसी किलकारी से हुआ था
आंगन प्यारा लाल
और तुम...

और तुम...
उस लाल आंगन, लाल जीवन
और हमें तथा हमारे प्यारे लाल को
न जाने किसके सहारे छोड़ गए
कभी न वापस आने के लिए

तू ही बता... कि तेरी याद में मैं
कैसे भरूँ रंग लाल
जीवन का सूनापन मिटता ही नहीं
मिट जाती है दुनियाँ

एक रात...
दुनियाँ से छिपकर
तुम्हारी याद में मैंने कभी
पहन ली थी लाल साड़ी,
लाल चूड़ी और लाल बिन्दी के
साथ-साथ लाल सिन्दूर भी
मैं पूरी तरह से तुम्हारी लालिमा में
खो गई थी उस रात
तुम्हारा प्यार, दुलार, स्पर्श और नोंक-झोंक
के लाल साये में लिपट गई थी उस रात
किंतु...
साथ ही याद आया तुम्हारे जाने के बाद
मेरी लाल भावनाओं की चूड़ियों का
बेरहमी से तोड़ दिया जाना
मेरे सुनहरे लाल सिन्दूर का
मेरी मांग के साथ-साथ
मेरे जीवन से भी धो डालना
मुझे मेरे लाल जोड़े से
अनावृत कर देना
..............
..............
मैं तार-तार होती गई
घाट पर नहाते हुए उन दस दिनों में
जब मेरे लाल जोड़े के साथ-साथ
मेरे बदन से हर तार उतारकर
नहलाया था गाँव की औरतों ने
न लाज, न हया, न ही ईज़्जत बची
................
................

क्या तुम्हारे जाने के साथ ही मेरी
ईज़्जत भी चली गई ?
क्या तुम्हारे जाने के साथ-साथ
मेरा जीवन भी ख़त्म हो गया ?
बोलो न...

यही सोच रोती-तड़पती रही
रात भर
उमड़ती- घुमड़ती रही और
ढूँढ़ती रही ओर-छोर ज़िन्दगी की
और...
न जाने कब..
सूरज सिर चढ़ आया
और मैं...
क्रूर समाज के हवाले कर दी गई
लोगों ने मुझे कुलटा, कूलच्छिनी, बदचलन
और न जाने क्या-क्या कहा
फिर मुझे सभ्य समाज ने
बहिष्कृत कर देना चाहा

अब तुम्हीं बताओ...
क्या तुम्हारे जाने से
इच्छाएँ भी मर जाती हैं
या मर जाता है मान-सम्मान
या मनुष्य की प्राकृतिक चेतनाएँ ?

तुम्हारा स्पर्श नहीं रहा, पर
सिंहरन अभी भी सिंहरती हैं
तुम्हारा संसर्ग नहीं रहा, पर
स्पन्दन अभी भी जीवित हैं
तुम्हारा साथ छूट गया, पर
मन के व्याकुल सागर में
लहरें अभी भी मचलती हैं

अब तुम्हीं बताओ... कैसे रोकूँ
इन स्पन्दनों, सिंहरनों और
आलोड़ित मचलनों को ?
बोलो न..
अगर मैं छोड़ गई होती तुम्हें, तो
क्या तुम अपने मन पर अंकुश
लगा पाते ?
या फिर मेरे रीते आहट का
जीवन भर इंतज़ार करते ?
बोलो न...
पत्नी के मरने से पति की इच्छा, आकांक्षा
जीजिविषा सब जीवित रहती है
फिर पति के गुजरने से पत्नी
जीते-जी क्यों मर जाती है ?

क्यों नहीं उबर पाती मैं
तुम्हारी वेदना से, या फिर
क्यों नहीं चाहता समाज
कि मैं
तुम्हारा ग़म भूलूँ ?
क्यों नहीं चाहती दुनियाँ
कि मैं इस ग़मगीन रंग से बाहर निकलूँ ?

मैं भी औरों की तरह जीना चाहती हूँ
खुश रहना चाहती हूँ, एक अच्छी
जिम्मेदार पत्नी की तरह
घर सम्भालना चाहती हूँ
फिर क्यों होती है हरदम रोकटोक
क्यों डालते हैं लोग मुझपर कूदृष्टि
क्यों है जीवन में घनघोर वृष्टि
क्यों देखते हैं लोग बगूले की नज़र से
क्यों पास आते हैं लोग  भूखे भेड़िये से
हमारे बेरंग जीवन में पुन:
लाल रंग भरने के बहाने
क्यों छीन लेना चाहते हैं हमारी
जीजिविषा हमारे जीवन से ?

अब तुम्ही बताओ...
कैसे जीऊँ मैं
क्या सति-प्रथा समाप्त होने के बाद भी
सति करने की प्रथा इस रूप में जीवित नहीं
क्या चिता पर जलाने के बजाय
रोज तिल-तिल कर जलाने की प्रथा
अब भी प्रचलित नहीं ?
कैसे बताऊँ तुझे... मैं हर रोज जलकर
हो गई हूँ काली लाल
दुखियारी लाल

दुनियाँ... अब मुझे पागल कहती है
पर मुझे पता है,
मैं पागल नहीं....
      'विक्षिप्त' हूँ
अब सभी रंग गड्डमड्ड हो चूके हैं
नहीं बचा है जीवन में कोई
रंग लाल।

सोमवार, 10 अक्टूबर 2011

Reteeli aankhen...

      रेतीली आँखें...
आँखों के गुलाब ओस की नमी लिये
झांक रही हैं दूसरी रेतीली आँखों में
क्यों हो जाती हैं ये इतनी गरम
.......... टहाटह................. लाल
क्या कभी यहाँ बारिश नहीं हुई थी
या बारिश के बाद धूप उनमें ही समा गई
या फिर गुलाबी आँखों की नमी सूखकर
बन गई रेतीली ठर्रक लाल
रेतीली आँखों के बाल सीधे-सीधे दुनियाँ
में पसरकर झपट्टा दिया करते हैं, किंतु
गुलाबी आँखों की लटें हर फूलों और कांटों में
 उलझी ही रह जाती हैं
रेतीली आँखों के लिए प्रसिद्ध कथन है
"ये तो यूँ ही जली-भूनी रहती हैं
............हमेशा............. हरदम
एकतरफा आँखें हैं ये
व्यथा के साथ यथा कहाँ है???"
जबकि गुलाबी आँखों में हरपल
ओस की बूँदें छायी रहती हैं
ये कभी विरोध ही नहीं कर पातीं..
व्यथा भी खारे मोती सा लुढ़कता है औ'
ये हो जाती हैं 'बेचारी'...
और तब इन बेचारी आँखों की भी
व्यथा लेकर लड़ा करती हैं ये
'रेतीली आँखें'

मंगलवार, 13 सितंबर 2011

Vaqt

         वक़्त

वक़्त की आँखें
     कमज़ोर हो गई हैं,
जिसे हम
     दिखाई नहीं देते
अथवा हमारा
     दृष्टिकोण संकुचित
जिसे हम
     पहचान नहीं पाते।
क्यों न हम उसके
     चश्में को पोंछ दें
और अपने मन को
     गंगाजल से धो दें,
गंगाजल ?
      ..................
गंगा भी तो अब 
     मैली हो चुकी है
तथा अनैतिकता 
     सार्वजनिक केन्द्र।
तुलसीदास अब
     असीघाट पर
चन्दन घिसने से 
     घबरायेंगे
कि यहाँ राम तक 
     पहुँचेंगे भी या नहीं
पर रावण, पता नहीं
     कब धमक जाये,
सुना था हनुमान
     अमर हैं, 
पर हनुमान ! क्या
     बचाने आयेंगे शिवनगरी ?
बेचारी सति ! आज की
     सतियों के साथ
अपना दर्द भी 
     नहीं बाँट सकतीं,
उन्हें 'मॉडलिंग'
     जो नहीं आती!
सीता तो पहले ही 
     आत्महत्या कर चुकी हैं
अपने प्रिय पति 
     राम की कृपा से,
और राधा को 
     अपने मोहन के 
इंतज़ार के अलावा 
     कुछ सुझता ही नहीं
सभी अपने अपने प्रेम
     की दुहाई देंगे !!
प्रेम तो आज लोगों को 
     ख़ुद से भी नहीं रहा;
ख़ुद को खोकर लोग 
     सृजन, सृजनहार
और संहारक
     सब पा लेते हैं,
पर ख़ुद को पाकर 
     सुविधाओं से 
वंचित होना
     मंजूर नहीं।
वक़्त अपने धुधले 
     चश्में से 
हमें देख 
     परख सकता है,
पर हम 
     भविष्य के गर्भ में 
छुपे वक़्त को 
     पहचानना नहीं चाहतें।

रविवार, 7 अगस्त 2011

JEE KARATAA HAI...

                 जी करता है...
जी करता है..
बादल बन पर्वतों को आगोश में भर लूं
बाहों में भर लूं आज़ाद हवाओं को
चाँद को डोर से बाँध जमीं पर उतारूँ
बादलों के बिस्तर पर लेट जाऊं औ'
खेलूं अटखेलियाँ उसके रुई से फाहों पे
हरियाली ओढ़ सो जाऊं
क्षितिज को गले लगा मिलन का गीत गुनगुनाऊं
आकाश को मुट्ठी में बाँध...
                                   विराट शुन्य में उड़ जाऊं
और कहूं...
                मैं हूँ, मैं भी हूँ
                इसी दुनिया में...

शुक्रवार, 22 जुलाई 2011

JUTE

                     जूते
एक दिन कहा उन्होंने तमककर--
     "तुम मेरे पैरों की जूती बराबर भी नहीं हो.."

सहम गई लीला
सपटकर किसी कोने की सीलन भरी दीवार से
सोचती रही रात भर
  'क्या सचमुच मैं जुती बराबर भी नहीं हूँ?'
  पति-परमेश्वर मान  
जब भी
पोछती हूँ अपने आँचल से जूते
कभी नहीं ख़याल आया
कि मैं भी इन जूतों की तरह हूँ
या इनसे कुछ कम?

थके-मादें ऑफिस से जब आतें
जूते पहने ही सो जातें
नींद खुल जाने के डर से
हलके हाथों जूते निकालते समय
नहीं ख़याल आया कभी
'मैं अपना ही अस्तित्व निकाल रही हूँ?'

अगर तुम्हारे लिए ये सच है
तो यही सही-
पर सुनो न----
    क्या जूते पावों की शोभा नहीं होते?
    क्या जूतों से मनुष्य की औकात नहीं नापी जाती?
    क्या जूते मनुष्य की इज्जत का हिस्सा नहीं होते?
अगर नहीं--
तो कभी जाओ बिना जूता पहने
 या फटा जूता पहन कर
सड़क पर, ऑफिस में, बाज़ार,
रिश्तेदारों या मित्रों के घर,
या फिर कोई उत्सव-त्यौहार मनाने,
या अपनी बहन-बेटी का रिश्ता लेकर
या खुद की शादी में..
देखो क्या इज्जत रहती है तुम्हारी?
     हर कंकड़- पत्थर, कांटे-कीचड़,
     तपती धरती से बचाते हैं जूते
     खुद घिस जाते हैं पर तुम्हारे पावों
     पर आंच नहीं आने देतें..

       बस एक सवाल है मेरा--
जूते सिर्फ पैरो के लिए है
पर मैं तुम्हारे सर से लेकर
पाँव तक लिपटी कवच की तरह
दिन-रात तुम्हे सुरक्षित रखने की कोशिश
करती हूँ.
फिर भी मुझमें ऐसी क्या कमी है
कि मैं तुम्हारे जूतों के बराबर भी नहीं?????


 



मंगलवार, 14 जून 2011

Ak Safar Kavyitri Ramnika Gupta Ji Ke Saath...

                        एक सफ़र कवयित्री रमणिका गुप्ता जी के साथ...





अगर जिजीविषा हो.... तो इंसान हार नहीं सकता,  इसका सशक्त उदाहरण रमणिका गुप्ता जी हैं....

शुक्रवार, 22 अप्रैल 2011

Yaaden

                 यादें
पुराने फटे जर-जर कपड़ों की तरह 
     तुमने मुझे उतार फेंका 
फिर भी तुम्हारी
     गंध बची रह गई मुझमें,
लोगों ने दूर से ही
    महक दरकिनार कर लिया
मैं तड़पती रही
   अपनी खूबसूरत  नाकामी पर,
तुम्हें कभी मेरा रूप रंग बनावट
इतना पसंद था... कि
एकपल के लिए बिसराना
गवारा न था,  
आज तुम्हारे सामने पोछा बनकर
पोंछ रही हूँ...
    तुम्हारे पैरों के नीचे ज़मीन,
क्योंकि मैं तुम्हें बचाना चाहती हूँ  
धुल-धक्कड़ से.
पर...
तुम मुझे पोछे का कपड़ा समझकर
     लांघ जाते हो
ताकि तुम मुझमें सने
    गंदले पानी से बचे रह सको,
और...
मैं देखती रह जाती हूँ
जर जर रेशों के बीच से
तुम्हारे फटे हुए प्यार को
महकती हूँ तुम्हारे गंध को
जो पहले की तरह नहीं महकती 
और...
     वह सुखमय एहसास 
     तुम्हारी यादें, तुम्हारे वादें
     मुझे ख़ुशी देने के बजाय  
          कर जाते हैं
              और भी दु:खी.... 

बुधवार, 6 अप्रैल 2011

PYAAR

           प्यार
तुम मुझे...  बार- बार
गन्ने की तरह
चूसकर फेंक देते हो
फिर भी मुझमें
बचा रह जाता है
कुछ रस
मक्खियों और च्युटों के लिए.

मैं तुम्हारी यादों में
धीरे-धीरे सूखती हूँ
रसबिहीन  होकर
याद करती हूँ तुम्हारा
प्रथम स्पर्श, रसास्वादन से पहले की
तुम्हारी ललचाई आँखें
जिसे मैं प्यार समझ बैठी थी
तुम्हारा मुझे जड़ों से उखाड़ना औ'
शनै: शनै: सहलाना
मैं रोमांचित हो उठी थी
मेरा सर धड से अलग करना
जिसे मैं समर्पण कहती थी
और चूस जाना
जिसे मैं एकाकार कहने लगी.

परन्तु अब....
अब क्या कहूँ मैं
उन सारी सुखानुभूतियों को
अब तो मैं चूल्हे की लवना
बन चुकी हूँ.
क्या... इसे ही प्यार कहते हैं???


रविवार, 13 फ़रवरी 2011

svabhaav

         स्वभाव
मर्द झेलता है,
औरत सहती है.
     मर्द कहता है,
     औरत करती है.
मर्द कमाता है,
औरत सहेजती है.
     मर्द प्यार करता है,
     औरत श्रद्धा रखती है.
मर्द फैसला लेता है,
 औरत सोचती है.
     मर्द हंसता है,
     औरत हंसाती है.
मर्द रुलाता है,
औरत रोती है.
     मर्द वादा करता है,
     औरत निभाती है.
मर्द थोपता है,
औरत ढोती है.
     मर्द घुटता है,
    औरत विफरती है.
मर्द इंसानों में गिना जाता है,
औरत इंसान होती है.
     मर्द का अहम् झुकने नहीं देता,
     औरत बार-बार झुकती है.
मर्द विश्वास दिलाता है,
औरत विश्वास पर अड़ी रहती है.
     मर्द तन्हा होता है,
    औरत तन्हाई होती है.
मर्द जिन्दगी होता है,
औरत जीवन होती है.
     मर्द रूठने पर रूठ जाता है,
     औरत आख़िरी दम तक मनाती है.
मर्द लूटकर चला जाता है,
औरत लुट कर भी जीती है.
     मर्द बिछड़ कर जी लेता है,
     औरत कुहुकती है.
मर्द औरत बदल देता है,
औरत उम्मीद तक इंतज़ार करती है.
      मर्द समय होता है,
     औरत युग होती है.





सोमवार, 10 जनवरी 2011

Astitva

                   अस्तित्व
क्या तुम मुझे रोटी पर लगे पैथन समझते हो?
जब चाहा मेरे नाम की मुहर लगा
खुद अच्छे बन गए !
                    शायद, तुम्हें नहीं पता
                    जब लोई पैथन में लपेटकर
                                   बेली जाती है
                    तब सबसे अधिक दर्द
                                   पैथन को ही होती है
                   जो बेलन से गींज दी जाती है
                   फिर वह झड़कर 
                            चौकी के चारो ओर
                                   बिखर जाती है
                  और तुम्हें तुम्हारा अस्तित्व दे जाती है.
शायद, तुम्हें नहीं पता
जब पैथन झड़ने से बच जाती है
वह तवे पर रोटी से पहले
                    जलती है.
और तुम्हें जलाने से बचाती है.
                   शायद, तुम्हें नहीं पता 
                   रोटी से पेट भर जाता है
                   लेकिन पैथन 
                          बूहार कर फेंक दी जाती है.
सच सच बताना...
       क्या तुम  मुझे.... पैथन ही समझते हो?
             

शुक्रवार, 7 जनवरी 2011

Aashiyaana

            आशियाना
चलो एक आशियाना बनाया जाए 
और खुद को इंसान बनाया जाए, 
न फूलों से, न चाँद-तारों से 
इसे हर पल खुशियों से सजाया जाए.

मंगलवार, 7 दिसंबर 2010

Guru Vandanaa

                          गुरु-वन्दना
अंधेरों में रौशनी, चांदनी की शीतलता,
तूफानों में भी मन की शांति चाहते हैं.
बरसात होती रहे कृपा और ज्ञान की,
गुरु के चरणों में ऐसा ठौर चाहते हैं.
कंटकाकीर्ण राहों से कांटे आप खुद ना हटाएं,
कांटे हटाते हैं कैसे.. आप हमको सिखाएं,
हम ऐसा पथप्रदर्शक चाहते हैं.
आपकी चरण-रेनू सहृदय लेकर चलें हम,
सफलता का ऐसा पुनर्जनम चाहते हैं.

मंगलवार, 19 अक्टूबर 2010

Vyathaa

                       व्यथा
सखी,
     काश ! मैं व्यथा की कथा सुना पाती.
     स्वतन्त्र जगत की परतंत्र कहानी
     कुटुंब निति कह पाती,
     काश! मैं व्यथा की कथा सुना पाती.

चूड़ी कंगन पायल झूमके, बाँध गए इहलोक
सिंदूर बिंदी मंगलसूत्र, बन गए परलोक
सास श्वसुर ननद जिठानी
          बन गया दिनचर्या
पति विपत्ति बन बैठा
          जिस समय से परिणय हुआ.

     प्रहरी बन गए गृह निवासी
     अछूत हो गए जेष्ठ पुरुष जन
     देवर बालक बन गया भाभी का
     पति चला देश दुरन.

          चौकठ लाँघ सके ना घर की
          मुरझाई फूल बन उपवन की
          कठपुतली बन नाचे दुल्हन
          दुषः दिन हुए विरहिन की,

    परम्पराएं बन गईं रोगिणी
    उसूल हो गया जाली
    संवेदनाएं यांत्रिक हो गईं
    रस्में हो गईं दिवाली
    प्रेम दिखावा बन बैठा
    ह्रदय हो गया खाली,

जी ऐसा जल गया सखी अब
     घाव न भर पाए,
     मंगलसूत्र से अच्छा फंदा
     पर्दे से अच्छा कालकोठरी
     ब्याह से अच्छा आजीवन
           कारावास चुन लेती,
सखी,
     काश ! मैं व्यथा की कथा सुना पाती.

सोमवार, 30 अगस्त 2010

Stree-Vimarsh Aur Ramnika gupta ka bold lekhan

                                     स्त्री-विमर्श और रमणिका गुप्ता का बोल्ड-लेखन
     साहित्य-जगत में सदियों से स्त्रियों की दबी-दबी आवाज जब मुखर हुई, तो सर्वप्रथम अपनी व्यथा-कथा से भड़की. स्त्रियों ने स्त्रियों की स्थिति तथा स्त्री का स्त्रीकरण  कैसे हो गया, के विषय में सोचना शुरू किया तो विपक्ष में पुरुषवर्चस्ववादी सत्ता का नया रूप सामने आया. वह अपने शुभचिंतकों के हाथों ठगी गई थी, जो अब उसे स्वीकार्य नहीं था. इसलिए उसने पुरुषवर्चस्ववादी सत्ता का विरोध किया और स्त्री-विमर्श अर्थात नारीवादी आन्दोलन का सहारा लिया. 
     'स्त्री सम्बन्धी विषयों पर विचार करना' ही स्त्री-विमर्श है. स्त्री-विमर्श को परिभाषित करते हुए कहा जा सकता है स्त्री के विषय में उसके सुख-सुविधाओं से लेकर प्रत्येक समस्या के परिप्रेक्ष्य में ऐतिहासिक, सामाजिक,  धार्मिक, सांस्कृतिक, आर्थिक और मनोवैज्ञानिक दृष्टि से सूक्ष्म से सूक्ष्मतम चिंतन-मनन कर अस्वस्थ दृष्टिकोणों  को अस्वस्थता प्रदान करना ही स्त्री-विमर्श है.
     पुरुषवर्चस्ववादी साहित्य में स्त्री-विमर्शी लेखिकाएं और कवयित्रियों ने शुरू-शुरू में अपरिपक्वता के साथ डर-डर कर कदम रखा, किन्तु बाद में उनकी निर्भीकता ने समस्त साहित्यकारों और आलोचकों को आश्चर्यचकित कर दिया. वे मात्र अपनी व्यथा-कथा तक ही सीमित न रही बल्कि सामाजिक, राजनीतिक, सांस्कृतिक और साहित्यिक क्षेत्र में भी बोलना शुरू कर दीं. उनकी निर्भीकता और सीधे-सपाट बेधड़क बोलने और लिखने की शैली को बोल्ड-लेखन का नाम दे दिया गया. बोल्ड अर्थात निर्भीक अथवा साहसी.
     स्त्री-विमर्शी बोल्ड लेखिकाओं व कवयित्रियों जैसे कृष्णा सोबती, प्रभा खेतान, मैत्रेयी पुष्पा, मन्नू भंडारी, उषा प्रियंवदा, अमृता प्रीतम में से रमणिका गुप्ता का भी नाम प्रसिद्द है. कुछ समय से लेखिकाओं के आत्मकथाओं को ध्यान में रखते हुए बोल्ड-लेखन का अर्थ निर्भीकता के बजाय प्रेम-प्रसंगों से लिया जाने लगा है किन्तु प्रेम-प्रसंग हो या अपने अधिकारों की मांग, स्वभावतः बोल्ड-लेखन के लिए लेखकों को भी बोल्ड अर्थात धृष्ट, प्रगल्भ बनना ही पडेगा. शेर की मंद में डर-डरकर जीने वाली औरतों ने शेर के विरुद्ध आवाज उठाई, यह धृष्टता ही उनकी बोल्डनेस है.  
     साहित्य के रण-क्षेत्र में अन्य लेखिकाओं की भांति रमणिका गुप्ता भी अस्त्र-शस्त्रों के साथ कूदीं और अब तक आम आदमियों के लिए युद्धरत हैं. आदिवासी, दलित तथा स्त्री-विमर्श इनके लेखन का प्रमुख क्षेत्र है. अब तक इनकी गद्य और पद्य की ३२ पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी है तथा इन्होने २४ पुस्तकों का संपादन किया है, साथ ही वर्त्तमान में इनकी छः पुस्तकें प्रकाशनाधीन है. गद्य में 'सीता', 'मौसी' उपन्यास , 'बहुजुठाई' कहानी-संग्रह, 'निज घरे परदेसी' 'दलित सपनों का भारत और यथार्थ', 'स्त्री-विमर्श: कलम और कुदाल के बहाने' तथा 'लहरों की लय', निबंधात्मक, आलोचनात्मक और यात्रा-वृत्तांत तथा 'हादसे' आत्मकथात्मक पुस्तकें हैं. शीघ्र ही इनकी दूसरी आत्मकथा 'आपहुदरी'  प्रकाशित होने वाली है. 'सीता', 'मौसी' उपन्यास तथा 'बहुजुठाई' कहानी-संग्रह इनकी आँखों देखा हाल है, जिसमे इनकी नायिकाएं कोलियरी खदानों में अपने हक़ के लिए संघर्षरत हैं. गद्य-साहित्य में अपने बोल्डनेस के कारण इनकी सबसे अधिक चर्चित कृति आत्मकथा 'हादसे' और प्रकाशनाधीन 'आपहुदरी' है. 
     बचपन से ही लेखिका निर्भीक एवं साहसी रहीं. परिवार में सामंतवाद, नौकरशाही, जातिवाद तथा पर्दा-प्रथा का विरोध, छिप-छिपकर राजनीति में भाग लेना, जाति एवं परम्परा तोड़कर विवाह करना इनके साहस का परिचायक है. रमणिका जी के कथनानुसार भारत और चीन की लड़ाई में इनका गीत जन-जन के मुख पर था-
                           "रंग-बिरंगी तोड़ चूड़ियाँ,
                            हाथों में तलवार गहूंगी
                           मैं भी तुम्हारे संग चलूंगी
                           मैं भी तुम्हारे साथ चलूंगी."
     'हादसे' इनकी राजनैतिक-संघर्ष की दास्तान है तो 'आपहुदरी' प्रेम-प्रसंगों की. जहाँ समाज में अपमानित होने के भय से व्यक्तिगत-प्रेम के विषय में महिलाओं ने चुप्पी साधी थी, वही रमणिका जी किसी अपमान की चिंता किये बिना खुलकर अपने प्रेम प्रसंगों पर चर्चा करती हैं. जिसपर जारकर्म कहकर आलोचकों की मार भी पड़ी. किन्तु अपने लक्ष्य पर अडिग लेखिका व कवयित्री की एक ही पंक्ति सारे सवालों पर भारी पड़ती है-
                        "आज गंगा को अवतरित करने के लिए-
                        शंकर  की दरकार नहीं है.
                        गंगा खुद उतर आएगी धरती पर". 
     पद्य में 'गीत-अगीत',  'अब और तब', 'खूंटे', 'प्रकृति युद्धरत है', 'कैसे करोगे बंटवारा इतिहास का', 'पूर्वांचल एक कविता यात्रा', 'विज्ञापन बनाता कवि', आदिम से आदमी तक', भला मैं कैसे मरती', 'अब मुरख नहीं बनेंगे हम', 'मैं आज़ाद हुई हूँ', 'तिल-तिल नूतन', 'तुम कौन', 'भीड़ सतर में चलने लगी है' तथा 'पातियाँ प्रेम की' नामक काव्य-संग्रह प्रकाशित है. 
     स्त्री-विमर्श से सम्बंधित इनकी दो काव्य-संग्रह महत्वपूर्ण हैं- 'खूंटे' और 'मैं आज़ाद हुई हूँ'. इनका काव्य-संग्रह इनकी स्वछंद विचारधारा और प्रहारक भाषा-शैली के कारण प्रसिद्ध है. इनके स्त्री-विमर्श की खास विशेषता है की स्वयं के सन्दर्भ में इन्होने कभी भी पुरुष को अपने प्रेम और शोषण के लिए दोषी ठहराया. इन्हें न तो अपनी सफलता के लिए पुरुष रूपी वृक्ष पर लता बनकर चढ़ना पसंद था और न ही पुरुष के अस्तित्व को ख़ारिज किया, क्योंकि स्त्री-पुरुष संसार के सबसे बड़े सत्य हैं तथा दोनों के सह्योग से सृष्टि संचालित होगा. अतः इन्होने स्त्री-पुरुष के बीच प्रेम को स्वाभाविक माना. 'एनी मेरी लिंडवर्ग' के इन पंक्तियों - "मैं/ जिससे प्रेम करती हूँ/ मैं चाहती हूँ/ कि/ वह मुक्त रहे/ यहाँ तक कि/ मुझसे भी" को इन्होने अपने जीवन में उतारा तथा सीधे सरल शब्दों में कह देती है- 
                                 "मैं प्यार करने लगी हूँ तुमसे.
                                  इसलिए की 
                                 'तुम' - तुम हो.
                                 तुम्हारे विशेषणों की मुझे चिंता नहीं.
                                 मैं तुम्हारे 'तुम' से प्यार करती हूँ."
     ये स्वयं भी नहीं चाहती की कोई इन्हें इनकी मजबूरियों को या इनके रूप से प्यार करे, इसलिए  कहती हैं-
                               "तरस खाकर मेरी झोली में
                                प्यार की भीख मत डाल.
                                मेरे तन को नहीं,
                                मुझे प्यार कर 
                                नहीं तो मेरा मन 
                                गौड़ हो जाएगा." 
     ये प्रेम करने को  विद्रोह मानते हुए कहती है- "वर्चस्व सत्ता की प्रवृति है तो प्रेम विद्रोह व प्रतिरोध का पर्याय. केवल विद्रोही ही कर सकता है प्रेम. प्रेम परम्परा को तोड़ता है और कायम करता है अपनी नई राह- नई दिशा." क्योंकि भारत में प्रेम करने की मनाही रही. 'पातियाँ प्रेम की' नामक काव्य-संग्रह में ये लिखती हैं- "प्रेम ही बदल सकता है समाज. जो प्रेम करना नहीं जानता वह जीना भी नहीं जानता. हम जीने के लिए ही नहीं जीते बस. कोई न कोई  मकसद होता है जीने का- और वह मकसद है प्यार-जिंदगी से प्यार. प्रायः हर व्यक्ति करता है जिंदगी से प्यार! वह उसके लिए आख़िरी दम तक जद्दोजहद करता है ! मैंने जिंदगी को दम भर प्यार किया है, इसलिए मेरी कोशिश रही की जिंदगी कभी हारे नहीं- मैं भले हार जाऊं ! प्यार जीतता रहे ! प्यार बरकरार रहे !"
     प्रेम के साथ ये यौनेच्छा को नैसर्गिक मानती हैं. जो 'स्व' और 'पर' के बीच प्रेम को चरमोत्कर्ष पर पहुंचाता  है. ये कहती हैं- "'स्व' से समष्टि तक इस अबाध यात्रा में देह का महत्वपूर्ण योगदान होता है. 'स्व' और 'पर दो कायाओं का बोध कराते हैं. 'स्व' से 'परकाया' में प्रवेश इसी प्रेम के सहारे करता है. लेखक का कवि, चूँकि संवेदना और प्रेम का अन्योन्याश्रित रिश्ता है. संवेदना के सहारे दो प्रेमियों के बीच यह रिश्ता आकर्षण की आँखों में पनपता है. 'स्व' से 'समूह' तक की यात्रा संकल्प के दृढ कन्धों पर चढ़ कर तय करता है प्रेम ! लेकिन इसके विपरीत समूह का व्यक्ति-प्रेम विश्वास की बलिष्ठ बाहों से होता हुआ मुठ्ठियों में बंधकर हवा में हिलोरे लेने लगता है! "
     प्रेम को शक्ति मानते हुए दार्शनिक ओशो कहते है- "प्रेम शक्तियों का निकास बनता है. प्रेम बहाव है. क्रियेशन, सृजनात्मक है प्रेम, इसलिए वह बहता है और एक तृप्ति लाता है. वह तृप्ति सेक्स की तृप्ति से बहुत ज्यादा और गहरी है. जिसे वह तृप्ति मिल गई- वह कंकण पत्थर नहीं बीनता, जिसे हीरे-जवाहरात मिलने शुरू हो जाते है." कदाचित इनके उन्मुक्त प्रेम का ही फल है की इन्होने बड़े से बड़े समस्याओं का सामना आसानी से कर लिया.
     प्रेम में ये कोई भी कीमत चुकाने के लिए तैयार है किन्तु अपनी अस्मिता और स्वतंत्रता से कोई समझौता नहीं कर सकतीं. प्रेम में रोक-टोक, अधिकार ज़माना इन्हें बिल्कुल पसंद नहीं. विवेकहीन प्यार की कोई उम्र नहीं होती,  इसलिए प्यार है अथवा नहीं है तो उसे स्वीकार करने की क्षमता होनी चाहिए. स्त्री प्रेमवश पुरुष को अपने सारे अधिकार सौंप देती है, और अनजाने में पुरुष की गुलाम बन जाती है. इसलिए कवयित्री कहती हैं- 
                                                  "मैं ही उसे राजा बनाती हूँ
                                                   और बनती हूँ उसकी रानी
                                                   यहीं से शुरू होती है
                                                   मेरी  गुलामी की दास्तान  
                                                   और इकरार की कहानी." 
     स्त्री की जब आँखें खुली तब उसे समझ में आया-
                                                 "पर तुम तो पिंजरा बन गए
                                                  मेरे पंख और डैने बांध
                                                  सुनते मेरी गुटरगूं
                                                  मुझे रात-रात भर जगाते
                                                  सुनते
                                                  मेरी फड़फड़ाहट-छटपटाहट
                                                  चारा फेंक कर
                                                  जाल बिछा कर !"
                                                  ------------------
                                                  "तुम तो
                                                   खूंटा बन गए
                                                   जिसे देख रूह कांपती है मेरी
                                                   इसलिए
                                                   मैं रुकती नहीं कभी
                                                   कहीं भी !"
     सम्पति की अवधारणा के साथ ही स्त्री भी पुरुष की सम्पति बन गई. उसके सारे फैसले पुरुष लेने लगा. वह उसे सम्पति की भांति सजाने-सवाने और संभालने लगा. धीरे-धीरे वह उसी मानसिकता से ग्रसित होने लगी और पुरुषवर्चस्ववादीसत्ता की जकड़न में जकड गई. किन्तु जब उसे साजिश समझ में आई और वहां से निकलना चाहि तब तक रिश्तों की परिभाषा बदल चुकी थी. परिवार, परम्परा और संस्कृति की पाबंदियों से निकालना इतना आसान नहीं था. घर की चौखट लांघना और अचानक पुरुष के क्षेत्र में ही जाकर नौकरी करना उसके लिए मुश्किल ही नहीं मधुमक्खी के छत्ते में हाथ डालने जैसा था. तत्पश्चात वह आर्थिक रूप से निर्भर हुई, उसकी आर्थिक निर्भरता ने ही उसका आत्मविश्वास वापस लौटाया और उसने मात्र जमीन पर ही नहीं बल्कि अंतरिक्ष में भी विचरण करना शुरू कर दिया. वह किसी पुरुष पर अवलंबित होने के बजाय अपना जीवन-निर्वाह स्वयं करने लगी, किसी पुरुष का अत्याचार सहने के बजाय अत्याचार के खिलाफ आवाज उठाने लगी. वह अपने सारे फैसले स्वयं करने लगी. रमणिका गुप्ता इस बात की प्रत्यक्ष उदाहरण हैं. उन्हें पुरुष द्वारा मंदिर में स्थापित की गई देवी अथवा कुलटा  या माया,ठगिनी कहलाना पसंद नहीं . उनके अनुसार यदि औरत औरत होने की हीन ग्रंथि से मुक्त हो जाए  तो उसे कोई नीचा नहीं दिखा सकता. वह सर उठाकर जी सकती है. इस सिद्धांत को मानते हुए कवयित्री 'पंखों में होंगे निश्चय' नामक कविता में कहती हैं-
                                                      "मुक्त होने दो हमें
                                                       अपने आप से
                                                       मन की गाँठ
                                                       आँचल की आबरू
                                                       आँखों की लाज और
                                                       अपनी ही गिरफ्त से
                                               जुल्म अपने आप बंद हो जायेंगे"
     लेकिन स्त्री की आत्मनिर्भरता से उसका श्रम दोहरा हो गया. वह घर और ऑफिस दोनों संभालने लगी. भूमंडलीकरण  के दौर में अतिव्यस्तता के कारण वह परिवार में कुछ कम समय देने लगी. इसलिए उसके विषय में रूढ़ हो गया है की औरतों ने परिवार को नकारना शुरू कर दिया है, जिससे परिवार टूट रहा है- किन्तु रमणिका जी कहती हैं-
                                                         "मैंने कब तोड़े हैं रिश्ते ?
                                                          कब तोड़े हैं नेह के धागे ?
                                                          मैंने तो तोड़ी है सदियों से सीखी चुप्पी"
     यह सत्य है की स्त्री के विषय में उसके जन्म से लेकर मृत्यु तक, विवाह से लेकर प्रजनन तक के सारे फैसले पुरुष ही लेता था तथा हिंसा, उत्पीडन, बलात्कार जैसी समस्याएं आम बात हो गई थी इसलिए क्षुब्ध होकर स्त्री-विमर्शियों ने विवाह करने से इंकार कर दिया, और तो और सुलामिथ फायरस्टोन ने गर्भाशय को काटकर फेंकने की बात कर डाली. किन्तु स्त्री-विमर्श के तीसरे दौर ने मातृत्व को अपनी शक्ति माना. मातृशक्ति औरत की सबसे बड़ी शक्ति है. उन्होंने स्पष्ट किया है उन्हें मातृत्व से नहीं बल्कि स्त्री का स्त्रीकरण से इंकार है. अतः रमणिका एक       ऐसे सूरज को जन्म देना चाहती हैं, जो कभी अस्त न हो. 'मैं आजाद हुई हूँ' नामक काव्य संग्रह में वे कहती हैं-
                                                  "खिड़कियाँ खोल दी है
                                                   कि सूरज आ सके अन्दर
                                                   मेरी कोख से जन्म ले ले
                                                   एक नया दिन 
                                                   दिन-
                                                   जो सदियों से नहीं आया था
                                                   दिन-
                                                   जो कभी छिपेगा नहीं सांझ में सूरज के साथ
                                                   क्योंकि  सूरज को मैं अपनी कोख में
                                                   भर लिया हैं!"
     इसलिए रमणिका जी ने स्त्रियों के विषय में पुरुषों द्वारा बनाए गए नियमों के विपक्ष में 'न' कहने का संकल्प कर लिया हैं. यदि पुरुष वर्ग समाज में अपने शक्ति का झंडा लहरा सकता है तो स्त्री क्यों नहीं? स्त्री को पुरुष की नक़ल करके नहीं बल्कि स्त्री रहकर ही अपनी शक्ति का परिचय देना होगा. तभी सही अर्थों में औरत की सही अस्मिता स्थापित हो सकती है-
                                                  "मेरे होने के इजहार के लिए-
                                                   विकल्प
                                                   वजूद का मिटना ही है
                                                   तो मिटूँगी मैं
                                                   पर चाकुओं को हवा में तैरने से-
                                                   रोकूंगी मैं ! रोकूंगी मैं !! रोकूंगी मैं !!!"
      स्त्री विमर्शियों ने यह चुनौती पुरुष दिखाने के लिए नहीं बल्कि पुरुषवर्चस्ववादी सत्ता से मुक्ति पाने के लिए और स्वयं को इंसान की श्रेणी में गिने जाने लिए दी है. क्योंकि "संस्कृति से ऊपर है मनुष्यता, जो स्त्री को अब तक उप्लब्ध नहीं हो सकी है. यदि होती तो दुनियाँ में इतना आतंक नहीं फैलता. स्त्री तो मनुष्य बनने की प्रक्रिया में है, उस और अग्रसर है". इसलिए सदियों से निर्धारित मूल्यों में कवयित्रियों ने परिवर्तन कर मानव मात्र के हितोपयोगी मूल्यों को ही अपनाया. रमणिका गुप्ता के शब्दों में-
                                                 "आज मैं मूल्य बदल दिए हैं-- फिर से
                                                  भले दुनियाँ ने उन्हें नहीं माना.
                                                  मैंने  रिश्ते तोड़ दिए हैं
                                                  ताकि नारीपन की ग्रंथि से मुक्ति पा सकूँ.
                                                  इंसान बन सकूँ."
     निष्कर्षतः कहा जा सकता है कि स्त्री-विमर्श कवयित्रियों ने अपने निर्भीक लेखन और कविताओं में प्रजातांत्रिक मूल्यों समता, समानता और भाईचारा के माध्यम से मानव को मानव समझाने कि मांग की है. उनके सुख-दुःख की  अभिव्यक्ति मात्र उनकी नहीं बल्कि समस्त पीड़ित एवं शोषित वर्गों कि है तथा उनकी 'मैं' शैली विश्व कि समस्त स्त्रियों कि व्यथा को एकता के सूत्र बांधती है. उनकी आत्मनिर्भरता ही उनकी स्वतंत्रतता कि पहली सीधी है, जिसके माध्यम से वे किसी भी तूफ़ान का सामना कर सकती हैं. जिसका प्रत्यक्ष उदाहरण रमणिका गुप्ता हैं. स्वच्छंद विचारों वाली, यायावर , मजदूरों कि मसीहा, समाज-सेविका, स्त्री-विमर्शी कवयित्री, लेखिका, समीक्षक रमणिका गुप्ता समस्त नारी के लिए प्रेरणा स्रोत हैं.