सोमवार, 14 मई 2012

Pinjare Mein Fafadate Pratik : Stree-Kavya Ke Sandarbh Mein

डॉ. सुनील जाधव द्वारा संपादित पत्रिका 'शोध-ऋतु' ISSN: 2456-6283 के अंक-1, मई-जुलाई, 2015 में प्रकाशित...               


      पिंजरे में फड़फडाते प्रतीक: स्त्री-काव्य के संदर्भ में


मैं दुनियाँ देखना चाहती थी

उन्होंने मेरे ऊपर जाल बिछा दी

तथा आँखों पर आदर्श की पट्टी बाँध दी

और कहा-

देखो... देखो... देखो!!!

मैंने अपनी चोंच से जाल को

छलनी कर दिया

और पंजों से पट्टी फाड़ दी

मैंने समझा मैं ‘उन्मुक्त’ हो गई



मैं खुले गगन में उड़ना चाहती थी

उन्होंने मेरा पर क़तर दिया

और पिंजरे से बाहर निकालकर कहा-

उडो... उडो... उडो!!!

सदियों से पुरूषवर्चस्ववादी मानसिकता के पिंजरे में क़ैद स्त्री थेरी गाथा से लेकर मीरा, महादेवी, सुभद्राकुमारी चौहान, शकुन्त माथूर, मणिका मोहिनी, कीर्ति चौधरी, रमणिका गुप्ता, निर्मला गर्ग, सुनीता जैन, सविता सिंह, सुशीला टाकभौरे, अनामिका, कात्यायनी, निर्मला पुतुल आदि ने प्रतीकों का स्वछंद रूप से चयन किया है। जिस प्रकार थेरी गाथाओं में धान कूटते हुए, जाता पीसते हुए, रोपनी-सोहनी करते हुए तथा विभिन्न उत्सवों-पर्वों पर विरह-वेदना व्यक्त है। उसी प्रकार मीरा ने अपने काव्य में सूली, सेज, पिय, मूरली आदि का प्रयोग किया है तो महादेवी ने तम, यामिनी, पक्षी, सांध्यगगन, गोधूली, तरी, सागर, शलभ, चातक, दीपक और बदली आदि प्रतीकों का प्रयोग किया है।

प्रतीक किसी वस्तु, चित्र, लिखित शब्द, ध्वनि या विशिष्ट चिन्ह को कहते है जो संबंध, समानता या परंपरागत किसी अन्य वस्तु का प्रतिनिधित्व करता है। “प्रतीक शब्द अंग्रेजी भाषा में मध्यकालीन अंग्रेजी, पुरातन फ्रांसीसी, लैटिन तथा ग्रीक भाषा के शब्द (Symbolon) से आया है; ग्रीक भाषा का symbolon शब्द, मूल शब्द (syn-) अर्थात् ‘एक साथ’ और (bole) अर्थात् ‘फेंकना’ से आया है, जिसका अर्थ है- ‘एक साथ फेंकना’, शाब्दिक अर्थ है ‘संयोग’ और साथ ही इसका अर्थ ‘संकेत, टिकट या अनुबंध’ भी है, इस शब्द को सबसे पहले हर्मिज के लिए होमर के गीत (हाइम) में इस्तेमाल किया गया है जब कछुआ देखने पर हर्मिज ने उसे एक वीणा में बदलने से पहले कहा “सिम्बोलोन” (चिन्ह/संकेत/सगुन/मुठभेड मौका मिलाना?) ऑफ जॉय टू मी, अर्थात् मेरे लिए खुशी का प्रतीक है”।

डॉ चन्द्रकांता के अनुसार, “प्रतीक वस्तुत: अप्रस्तुत की समग्र आत्मा या धर्म या गुण का समुचित रूप लेकर आने वाले प्रस्तुत का नाम है”। (गुप्ता, डॉ सुधा. बीसवीं शताब्दी का उत्तरार्द्ध. पृ. 198)

हिन्दी साहित्य कोश के अनुसार, “प्रतीक शब्द का प्रयोग इस दृश्य (अथवा गोचर) वस्तु के लिए किया जाता है, जो किसी अदृश्य (अगोचर या अप्रस्तुत) विषय का प्रतिविधान उसके साथ अपने साहचर्य का कारण करती है अथवा कहा जा सकता है कि किसी अन्य स्तर की समानुरूप वस्तु द्वारा किसी अन्य स्तर के विषय का प्रतिनिधित्व करने वाली वस्तु प्रतीक है”। (वर्मा, डॉ धीरेन्द्र, संपा. हिन्दी साहित्यकोश, भाग 1; पारिभाषिक शब्दावली. पृ 398)

प्रतीक भाव-प्रसूत होते है, जो लेखक या कवि की भावनाओं को मूर्त-रूप प्रदान करते हैं। वे देश, काल तथा समयानुसार परिवर्तित होते रहते हैं। इसलिए हिन्दी काव्य की विभिन्न धाराओं में प्रतीकों का परिवर्तन देखा जा सकता है। अत: प्रतीक वे गोचर या अगोचर साधन हैं जिससे भाव मूर्तवत हो उठते हैं या प्रतीक के माध्यम से भावनाएँ जीवित हो उठती हैं। प्राय: प्रतीक लेखक या कवि की मानसिकता और जीवन-शैली पर आधारित होते हैं, इसलिए कवि और कवियित्रियों के प्रतीकों का अर्थ और भावार्थ अलग-अलग निकलते हैं।

प्रतीकों के संदर्भ में “पेगेट का मत है कि प्राय: सभी शारीरिक मुद्राओं के साथ-साथ स्वर-यंत्र में गति होती रहती है और इस सहचारी स्वर को अलग करके उसे उस मुद्राविशेष का प्रतीक बना लेना स्पष्ट ही अधिक सुविधाजनक और अल्पश्रमी उपाय था। मनुष्य ने रेखाएँ और चित्र खींचना भी शीघ्र सीख लिया था। उसकी ध्वन्यात्मक मुद्राओं के प्रतीकों से शब्द, शब्दों के योग से व्याकरण युक्त वाणी का और उसके चित्रलिपि से वर्णलिपि का विकास हुआ। इस प्रकार सभी शब्द प्रतीक हैं”। (वर्मा, डॉ धीरेन्द्र, संपा. हिन्दी साहित्यकोश, भाग 1; पारिभाषिक शब्दावली. पृ 399)

“सन् 1870 तथा 1886 ई. के मध्य फ्रांस में पारनेशनिज्म एवं यथार्थवाद (रियलिज्म) के विरोध में वेग्नर के संगीत से प्रभावित होकर नवीन कविताधारा का उद्भव हुआ, वह प्रतीकवाद के नाम से प्रसिद्ध हुई”। (वर्मा, डॉ धीरेन्द्र, संपा. हिन्दी साहित्यकोश, भाग 1; पारिभाषिक शब्दावली. पृ 400)

आचार्य रामचन्द्र शुक्ल ने प्रतीकवाद को चित्रभाषावाद की संज्ञा दी है। वादलेयर, वर्लेन, रिम्बों, वालेरी, रिल्के, यीट्स, ब्लोक, वाल्ट ह्विटमैन आदि ने प्रतीक को अपने काव्य में प्रश्रय दिया। भारत में प्रतीकवाद का ज्ञान भले ही बाद में हुआ हो किन्तु प्रतीकों का प्रयोग काव्यधारा में वैदिककाल से ही दिखाई देता है। जिसका चर्मोत्कर्ष भक्तिकाल और छायावाद में देख सकते हैं।

प्रतीक दो रूपों में प्रयोग होते हैं- 1. संदर्भित 2. संघनित. (वर्मा, डॉ धीरेन्द्र, संपा. हिन्दी साहित्यकोश, भाग 1; पारिभाषिक शब्दावली. पृ 399) संदर्भित प्रतीक भौतिक चीजों के लिए संदर्भ के अनुसार प्रयोग होता है और संघनित प्रतीक मन और भावनाओं से जूडी बातों के लिए। काव्य में दोनों ही प्रतीकों का प्रयोग होता है।

डॉ सुधा गुप्ता ने प्रतीकों को पाँच भागों में विभाजित किया है- प्राकृतिक प्रतीक, पौराणिक प्रतीक, तकनीकि प्रतीक, यौन प्रतीक, जीवनचर्या प्रतीक।

कवयित्रियों के काव्य में प्रयुक्त प्रतीकों को तीन भागों में विभाजित कर सकते हैं- 1. जातीय स्मृत्ति पर आधारित प्रतीक, 2. मिथकिय प्रतीक, 3. ऐतिहासिक प्रतीक

1. जातीय स्मृत्ति पर आधारित प्रतीक-

चूकि प्रतीक मानव-जीवन के भावनाओं की सूक्ष्म अभिव्यक्ति के साधन होते हैं, इसलिए कवियों द्वारा चयनीत प्रतीक जातीय स्मृत्ति पर आधारित हैं, जो इनके जीवनानुभव से जुडे हैं। जो कि कवियों द्वारा चयनित प्रतीकों से भिन्न अर्थ देते हैं। कवि और कवयित्रियाँ दोनों ने ही प्रतीकों को अपने-अपने संदर्भ के अनुसार एक ही प्रतीकों का चयन किया, संदर्भानुसार उनका अर्थ परिवर्तित हो गया है- जहाँ कवियों ने जूता, मोजा, जंगल, मकान, सफेद घोडा, घास, भेडिया, कुत्ता, सूअर, झींगूर, चूहा आदि प्रतीकों का चयन अधिक किया है, वहीं कवियित्रियों ने बेलन, चकली, चौका, कलछूल, बटुला, पोछा, दातून, बिस्तर, जूता, स्वेटर, सब्जी, बैसाखी, फूलदान, कूर्सी, खिड़कियाँ, मेंहदी, सुहाग, चूडी, कंगन आदि प्रतीकों को अपने काव्य का आधार बनाया है। उदाहरण के लिए रोटी प्रतीक को कवि लीलाधर मंडलोई, गज़लकार दुष्यंत और कवयित्री अनामिका जी की कविताओं को देख सकते हैं-

लीलाधर मंडलोई के अनुसार-

“उड़ती राख में शुमार कितनी ज़िन्दगियाँ

रोते हुए बच्चे हैं इस ख्वाब में मटियाले से

कशकोल थामे हुए रोटी को तरसते

घरों में क़ैद और इतने सहमे” -(मंडलोई, लीलाधर. काल का बाँका तिरछा. पृ. 61)

दुश्यंत के अनुसार-

“भूख है तो सब्र कर रोटी नहीं तो क्या हुआ ?

आजकल दिल्ली में है ज़ेरे बहस से मुद्दआ।”

-(गुप्ता, डॉ सुधा. बीसवीं शताब्दी का उत्तरार्द्ध. पृ. 177 (दुष्यंत कुमार: साये में धूप))

अनामिका जी के अनुसार-

“मैं कैसेरॉल की अंतिम रोटी हूँ !

कैसेरॉल में ही बंद रही हूँ अब तक !

पीती रही भाप कुछ दिन तक

ठीक से सिंकी रोटियों की

जो मेरे ऊपर थकियाई गई थी !

एक जमाना वो भी था जब मैं

लुगदी लुगदी हो गयी थी

भाप दूसरों की पीती-पीती !

अब, या ख़ुदा, उस उधार की

भाप भी बिलाने लगी है!” (अनामिका. दूब-धान. पृ-84)

यहाँ रोटी प्रतीक कवि और कवयित्री दोनों के कविताओं में अंतर इसलिए हो गया है क्योंकि पुरूष घर से दूर समाज और भूगोल को विस्तृत रूप से देखते रहे हैं तथा किंतु स्त्री-जीवन अभी भी रसोईघर और रोटी के इर्द-गिर्द ही घूम रहा है, वह अभी तक अपनी अस्मिता की तलाश में ही भटक रही है। अत: दोनों के कार्य-क्षेत्र में अंतर होने से प्रतीकों का अर्थ परिवर्तित हो गया है। अनामिका ने मन के लिए काग़ज, समाज के लिए टिड्डियाँ, ईज़्जत के लिए केश औरतें और नाखून, पुरूष के लिए फर्नीचर, जीवन की गाँठों के लिए घुंघराले बाल, अस्तित्व के लिए डाक टिकट, दुख-दर्द के लिए जूएँ और कूड़ा-करकट, भूमंडल के लिए रोटी आदि प्रतीकों का चयन किया है.

इसी प्रकार कुत्ता प्रतीक को अज्ञेय अपने काव्य में प्रयोग करते हैं-

“मैं ही हूँ वह पदाक्रांत रिरियाता कुत्ता-

मैं ही वह मीनार-शिखर का प्रार्थी मूल्ला

मैं ही वह छप्पर-तल अहंलीन शिशु भिक्षुक”

-(गुप्ता, डॉ सुधा. बीसवी शताब्दी का उत्तरार्ध.पृ- 46)

लेकिन यही प्रतीक दलित कवयित्री सुशीला टाकभौरे ने स्त्री-अस्मिता के लिए चुना है, जिससे संदर्भ ही बदल गया है-

“जब कुत्ता और कुतिया

एक दूसरे के पूरक हैं

तब कुत्ते को वफादार

कहने के साथ ही

चरित्र के नाम पर

‘कुतिया’ गाली क्यों दी जाती है” ?

-(टाकभौरे, सुशीला. यह तुम भी जानो. पृ. 21)

अत: कुत्ता पुल्लिंग होने के कारण वफादार, शौर्य का प्रतीक है किन्तु कुतिया स्त्रीलिंग होने से गाली मानी जाती है। क्योंकि औरत के लिए औरतपन शब्द ही एक गाली के रूप में प्रयोग किया जाता है। प्राय: देखा जाता है कि यदि एक पुरूष दूसरे पुरूष को गाली देता है तो वह उस पुरूष को नहीं बल्कि उसकी माँ-बहन को संबोधित करते हुए गाली देता है। इसके दो कारण हो सकते हैं एक तो स्त्री का दैहिक मूल्यांकन और दूसरा औरत का पुरूष के ऊपर आश्रीत होना, जो सम्पत्ति है और ईज्जत का प्रतीक भी। इसलिए तो कहा जाता है-

“अपनी जगह से गिरकर

कहीं के नहीं रहते

केश, औरतें और नाखून”। -(अनामिका. खुरदुरी हथेलियाँ. पृ.15)

जातीय स्मृत्ति पर आधारित प्रतीकों के चयन में भिन्नता का प्रमुख कारण है स्त्रियों की मनोसामाजिक संरचना। वे घर की चहारदीवारी में क़ैद रहीं, उनका क्षेत्र घर की चहारदीवारी से लेकर घर की चौखट तक ही रहा। वे अपने बडे बुजूर्गों के सम्मुख खुलकर बात नहीं कर सकतीं, वे परिवार में आदेश नहीं दे सकती, प्रेम निवेदन नहीं कर सकतीं। ऊँची आवाज में बात नहीं कर सकतीं। अत: कविता ही उनके लिए एकमात्र साधन है जिसमें उनकी टूटन-घूटन व्यक्त हो सकती है। इसीलिए स्वेटर बुनते हुए, एक-दूसरे के सर में जूँ हेरते हुए, जाता पीसते हुए, बर्तन धोते हुए, खाना पकाते हुए, झाडू-पोछा करते हुए, बच्चे को दूध पिलाते हुए उनकी कविता या गीत स्वत: स्फुटित हो उठती है। या फिर त्योहारों-उत्सवों पर गाये जाने वाले गीतों में उनकी व्यथा-कथा प्रकट हो जाती है। अथवा जो बातें वे दिन भर घूँघट में दबाये रखती हैं और रात के समय खेत की ओर निकलते समय अपनी सखी-सहेलियों से नहीं कह पातीं, वे बातें आधी रात पति और परिवार से छुपकर अपनी लेखनी से कोरे कागज़ पर उड़ेल देती हैं। क्योंकि कविता लिखना और पढ़ना दोनों ही औरतों के लिए वर्जित था, इसलिए वह तकिए के नीचे काव्य संग्रहों को छूपाकर रखती थीं। लेकिन आज स्थिति बदल गई है, आज वह खुलकर अपनी अभिव्यक्ति तो कर सकती है पर सदियों से बनी-बनाई मानसिकता से वह अचानक निकल नहीं पा रही। आज स्त्री-विमर्श के वर्चस्व के कारण प्रयास करती भी है तो उसे अनेक आलोचनाओं का शिकार होना पड़ता है। सन् 1968 में रैडिकल फेमिनिज़्म नें पितृसत्ता के विरूद्ध जंग छेडी थी, तो सुलामिथ फायरस्टोन ने गर्भ से मुक्ति की बात की।

किन्तु उत्तर नारीवाद की कवयित्रियाँ पुन: घर की ओर उन्मुख हुईं, उन्होंने घरेलू शब्दों को अपनी कमज़ोरी नहीं बल्कि ताकत माना है। साथ ही मानवीय मूल्यों पर बल दिया है। अत: यहीं से चयनित होते हैं इनके प्रतीक और यहीं से जूडती हैं इनकी संवेदनाएँ।

सुशीला टाकभौरे ने संसार, मनुष्यता, हृदय, विस्तार के लिए सागर, घर के लिए कूप, विस्तार, स्वतंत्रता, मन के लिए आकाश, प्रकाश और ज्ञान के लिए सूरज, अस्तित्व एवं धैर्य के लिए धरती, नारी के लिए हीरा और चंदन वन की शाख, कूरीतियों के लिए मटियारा चूल्हा आदि प्रतीकों का प्रयोग किया है। रमणिका गुप्ता ने ज्ञान के लिए सूरज, अज्ञान के लिए अंधेरा, स्त्री की बौद्धिक पहुँच के लिए चादर, बंधन के लिए खूंटा, सहारा के लिए बैसाखी, रूढ़ियों, परंपरा के लिए पौधे, उत्तरआधुनिक फैशनपरस्ती के लिए फूलदान, घर के लिए बंदीगृह, मन के लिए खिड़कियाँ आदि प्रतीकों का प्रयोग का किया है। सुनीता जैन ने सुहाग के लिए मेंहदी, मन के लिए सरसों का खेत और सीप, संकीर्ण विचारों के लिए राख, हौसलों के लिए पंख, आलिंगन के लताएँ आदि प्रतीकों का प्रयोग किया है।

कवयित्रियों के काव्य में पितृसत्ता, प्रजनन, अर्थ की समस्याओं के साथ-साथ दैहिक समस्या प्रमुख रूप से केन्द्र में रहा है. जहाँ उन्होंने प्रेम में उठे कसक और दर्द की खुलकर अभिव्यक्ति की है, वहीं दैहिक मूल्यांकन से व्यथित व्यथा का सजीव चित्रण भी किया है। उदाहरण के लिए बलात्कार जैसे मानसिक और शारीरिक यंत्रणा को देख सकते हैं, बलात्कार अभिशाप बनकर स्त्री -जीवन को टांड़े की तरह खा जाता है, जो अकथनीय है, फिर भी इसे कवियित्रियों ने अपनी कविता में पिरोया है, निर्मला पुतुल के शब्दों में-

“क्या पाँव में चुभे

कांटों की तरह

कूरेद निकाल फेंकोगे-

आत्मा में फंसी हुई पिन

गर्भ में गडी हुई जहर की बुझी तीर

अन्दर ही अन्दर

नासूर बन टीसते टीस को

मिटा पाओगे किसी जन्म में”?

-(पुतुल, निर्मला. अगर तुम मेरी जगह होते.(पाण्डुलिपि))

यहाँ कांटे, पिन, ज़हर की बुझी तीर आदि प्रतीक बलात्कार के पश्चात् स्त्री के मन की अथाह पीड़ा को व्यक्त करने में सहायक हैं जिसे वह हर दिन लगातार तिल-तिल कर जीती है. ऐसे दैहिक पिंजर को पुरूष कभी भी महसूस नहीं कर सकता. इसी प्रकार नेहा शरद ने देह के साथ-साथ पितृसत्तात्मक पिंजरे को परम्परागत मानते हुए लिखती हैं-

“मैं एक मशीन हूँ

सिर से पाँव तक ढ़की

मैं एक लाश हूँ

और दूँगी और लाशों को जन्म” -(शरद, नेहा. ख़ुदा से ख़ुद तक. पृ.- 22)

नेहा शरद ने मशीन, सात ताले, खूँटे, आईना, काजल की कोठरी आदि प्रतीकों का प्रयोग किया है। कविता वाचक्नवी खारे जल को आँसू का प्रतीक मानती हैं। निर्मला पुतुल ने अपने काव्य में अस्तित्व और तुफान के लिए जमीन, क्रांति से महाक्रांति के लिए बवंडर, क्रांति के लिए चिन्गारी प्रतीक का प्रयोग किया है।

2. मिथकिय प्रतीक-

कवयित्रियों ने अपनी बातें स्पष्ट करने के लिए पौराणिक, रामायण और महाभारत के उन श्रद्धालू पात्रों का चयन किया है जिनके प्रति समाज अविश्वास तो क्या नकारात्मक सोच भी नहीं रख पाता। राम, शंकर, ब्रहमा, भीष्म, इन्द्र, सीता, द्रोपदी, गंगा, अहल्या आदि इनके प्रतीक हैं। मिथकिय पुरूष पात्र पुरूषवर्चस्ववादी सत्ता के प्रतीक होते थे और स्त्रियाँ किसी न किसी रूप से उनसे प्रताडित होती थी, किंतु बनी बनायी आदर्श और पतिव्रता की अवधारणा ने इन्हें देवी बना दिया था। इन सभी पात्रों को कवियित्रियों ने कटघरे में खड़ा कर दिया है।

सुनीता जैन ने ‘चौखट पर व उठो माधवी’ नामक काव्य-संग्रह में महाभारत से गालव और माधवी प्रकरी का मिथक चुना है, जिसमें राजा ययाति ने गालव को श्यामकर्ण वाले 800 घोड़ों के स्थान पर अपनी पुत्री माधवी को भिक्षा में दे दिया। तत्पश्चात् क्रमश: पक्षीराज गरूड़ गालव का राजा हर्यश्व, राजा दिवोदास, राजा उशीनर तथा महर्षि विश्वामित्र को श्यामकर्ण वाले घोड़ों के न होने पर तथा उनका मूल्य चुकाने हेतु माधवी को सौंपना तथा उनसे क्रमश: वसुमना, प्रतर्दन, शिबि तथा अष्टक नामक यशस्वी पुत्रोत्पति होना एक मर्मान्तक मिथक है। उन्होंने माधवी को एक मिथकिय नारी से सामान्य नारी के रूप में चित्रित किया है, जिसमें एक कन्या को स्वयं उसके पिता किसी व्यक्ति को दान कर देता है और घोड़ों के मूल्य के बदले एक-एक पुरूष के पास जाकर मूल्य चुकाती है और पुत्रोत्पत्ति करती है, किंतु शर्त यह है कि माधवी स्वयं अपनी इच्छा से किसी भी पुरूष की इच्छा नहीं कर सकती तथा न ही कामोत्तेजित हो सकती है। ऐसी स्त्री की टूटन-घुटन अत्यंत संवेदनशील ढ़ंग से प्रस्तुत किया गया है, जो महाभारतकाल में नारी की पूजनीयता और मान-सम्मान पर प्रश्न चिन्ह लगाता है-

“लज्जा मर जाती है जब

पिता, द्विज और

भरतारों की

नुचता ही है मांस मलिन तब

माँ, बेटी या पत्नी का

मैं थी एक दृष्टांत माधवी,/

तुच्छ मानव जीवन की”

-(जैन, सुनीता. चौखट पर व उठो माधवी. पृ. 68)

कवयित्री रजनी रंजना ने प्रतीक्षा पंथिनी में भारतीय वाड्मय का चिरपरिचित पौराणिक पात्र शबरी को चुना है। कात्यायनी की नारी अपनी अस्मिता स्थापित करने हेतु अपने पंखों को फड़फड़ाती हैं। उनकी जिजीविषा के साथ न तो इन्द्र छल कर सकते हैं और न ही वृहस्पति नष्ट कर सकते हैं-

“ख़ुद ही मैं ढूँढ रही हूँ/ अपनी अभिव्यक्ति/ अनन्त रहस्यों भरे अपने हृदय को/ छिपाये हुए/ स्वर्ग के तलघर में/ नरक की छत पर/ कटे पंख फदफदाते हुए/ फुदकते हुए/ नए पंखों के उगने की प्रतीक्षा में/ हासिल करके फिर से अपनी आँखें/ अपनी अस्मिता तक/ उड़कर पहुँच जाने के लिए/ हाहाकर करते इस हृदय में/ क्या चुरा सकता है उसे इन्द्र/ या नष्ट कर सकता है वृहस्पति”?

-(कात्यायनी. जादू नहीं कविता. पृ.88)

इन प्रतीकों के माध्यम से यह ज्ञात होता है कि ईश्वर भी यौवन-लोलुपता से अछूता नहीं है, सुखसागर में नवम् स्कंद के चौदहवें अध्याय के अनुसार वृहस्पति देव देवताओं के गुरू थे. उनकी पत्नी तारा को चन्द्रमा घमंड में आकर उनसे छीन ले गए. वृहस्पति के माँगने पर भी उन्होंने तारा को नहीं लौटाया. अत: ब्रह्मदेव की आज्ञा से उन्होंने उन्हें लौटा दिया किन्तु तब तक तारा गर्भवती हो चुकी थीं. इसलिए वृहस्पतिदेव ने उनके गर्भ को नष्ट करने की धमकी दी और कहा कि अगर तुम पतिव्रता पत्नी हो तो यह गर्भ गिरा दो. रोती-बिलखती तारा गर्भ तो गिराई किन्तु वह सुन्दर बालक बुद्ध के रूप में प्रकट हो गया, जिसे चन्द्रमा ने अपना लिया. उसी बुद्ध की पुत्री इला के पुत्र पुरूरवा की सुन्दरता का बखान सुनकर स्वर्ग की अप्सरा उर्वशी सम्मोहित होकर पुरूरवा के पास आ गई तथा अपने साथ दो मेंढ़क लायी. साथ ही यह शर्त रखी कि जब तक उनके मेंढ़क की रक्षा होती रहेगी तथा राजा को नंगा नहीं देखूँगी तब तक वे पृथ्वी पर निवास करेंगी. पुरूरवा ने सहमति जताई. किन्तु इन्द्रदेव उन्हें अपने सभा में न पाकर दो गन्धर्वों को ढूँढने के लिए भेजा. गन्धर्वों ने मेंढकों को ढूँढ लिया और अपने साथ ले जाने लगे, जिसका पता उर्वशी को चल गया. तब वे मेंढकों की रक्षा न होनें और इन्द्र की आज्ञा से विवश होकर पुन: स्वर्ग लौट गई. इस प्रकार स्वर्ग की देवी तारा, अप्सरा उर्वशी और धरती की ऋषिपत्नी अहिल्या तीनों की अस्मिता खो गई.

इन्द्र स्वर्ग पर अधिपत्य स्थापित करने के पश्चात भी धरती पर बसे मानवों के साथ छल करते रहें। इसका सशक्त उदाहरण है गौतम ऋषि की पत्नी अहिल्या के साथ वेश बदलकर छल करना, जो गौतम ऋषि के श्राप के कारण पत्थर बन गई. अंतत: क्षमा माँगने पर वर्षों बाद श्री राम अपने चरणों से छूकर उनका उद्धार करते हैं. इसी प्रकार रमणिका गुप्ता भी पुरूषवर्चस्ववादीसत्ता पर करारा चोट करती हैं-

“अहल्या को भी/ इन्द्र से प्यार के कारण/ ‘पत्थर’ बनने का श्राप झेलना पड़ा।/

और उस श्राप से मुक्ति दिलाने वाला/ एक पत्नीव्रतधारी/ धोबी के कहने पर/ सीता को घर से निकालने वाला/ सीता का पति/ एक पुरूष-राम ही था।/ पर-पुरूष के छूने से ही/ वह नारी बनी- पत्थर से/ जो पर-परस के कारण पत्थर बनी थी- नारी से”।

-(गुप्ता, रमणिका. खूँटे. पृ.16-17)

अनामिका मिथकीय श्रद्धालू पात्रों के चयन में स्त्री-पुरूष पात्रों के कर्तव्य-क्षेत्र में भी अन्तर मानती हैं, उनका कहना है कि-

“ईसा मसीह/ औरत नहीं थे/ वरना मासिक धर्म/ ग्यारह बरस की उमर से/ उनको ठिठकाए ही रखता/ देवालय के बाहर!

बेथलेहम और यरूशलम के बीच/ कठिन सफर में उनके/ हो जाते कई तो बलात्कार/ और उनके दुधमुँहे बच्चे/ चालीस दिन और चालीस रातें/ जब काटते सड़क पर/ भूख बिलबिलाकर मरते/ एक-एक कर/ ईसा को फुर्सत नहीं मिलती/ सूली पर चढ़ जाने को भी!” -(अनामिका. कवि ने कहा: अनामिका. पृ.77)

इन सबसे अलग सुशीला टाकभौरे एक युग चेतना को जन्म देना चाहती हूँ-

“वंश और समाज की अमरता/ अक्षुण्ण धारा में नहीं/ किसी एक बिन्दू/ एक नाम में ही होती है/ क्रौंची ने नाम दिया/ वाल्मीकि को/ और एकलव्य को द्रोणाचार्य ने/ विषमता और स्वार्थ की कोख से

मैं अति को/ विषमता को तोड़ कर/ सहृदयता जगाना चाहती हूँ/ क्रौंचि की तरह मैं/ जन्म देना चाहती हूँ/ चुग चेतना को”।

-(टाकभौरे, सुशीला. तुमने उसे कब पहचाना. पृ.-16)

अत: स्पष्ट है कि स्त्री अभी भी अस्मिता की तलाश में अहिंसा का हथियार उठाए लड़ रही है तो पुरूष इन सबके विपरीत राजनीति तक अपना पैर पसारे राम-युग को ढूंढ रहा है, कुँवर नारायण के शब्दों में-

“हे राम, कहाँ यह समय

कहाँ तुम्हारा त्रेता युग

कहाँ तुम मर्यादा पुरूषोत्तम

और कहाँ यह नेता युग!

सविनय निवेदन है प्रभु कि लौट आया

किसी पुराण- किसी धर्मग्रन्थ में

सकुशल सपत्नीक...

अबके जंगल वो जंगल नहीं

जिनमें घूमा करते थे वाल्मीक!”

-(नारायण, कुँवर. पचास कविताएँ- नयी सदी के लिए चयन. पृ. 47)

3. ऐतिहासिक प्रतीक-

कवयित्रियों ने मिथकिय प्रतीकों की भाँति ही ऐतिहासिक प्रतीकों का भी चयन किया है। रमणिका गुप्ता ने हरक्यूलस, रीछ, राबिनहुड, ट्राय की हेलन, क्लियोपेट्रा, अनारकली आदि ऐतिहासिक प्रतीकों को चुना है तो अनामिका जूलीयस सीजर, शेक्सपीयर जैसे महान कवियों की छवि के साथ-साथ चन्द्रगुप्त, विक्रमादित्य, हर्षवद्धन, अशोक, अकबर, चाणक्य, बीरबल, दलाईलामा, गौतम बुद्ध तथा आम्रपाली आदि ऐतिहासिक प्रतीकों का सहारा लिया है। किन्तु दोनों ही कवयित्रियों की कविताओं का भाव अलग-अलग है। रमणिका गुप्ता के काव्य में पुरूष-स्त्री में ऐतिहासिक तथा मिथकिय पात्रों की भाँति कोमलता, कमनीयता तथा सुदृढता ढ़ूढता है-

“मुझ में खोजा-/ ट्राय की हेलन का सौंदर्य-बोध/ क्लियोपेट्रा का रूप/ और रति की नफासत/ अनारकली का कौमार्य/ अहल्या का धैर्य/ जिनके रूप से ही तराजू के पलडे झुक जाएं/ इतना झुक जाएं/ कि उन्हें उठाने के लिए/ फिर किसी पुरूष का ही सहारा लेना पड़े”। -(गुप्ता, रमणिका. खूँटे.पृ.-44)

जबकि अनामिका की कविता में स्त्री ऐतिहासिक पात्रों में अपनी ज़मीन तलाशती है।

“कुछ देर हमने सोचा-/ अपने समय से निकलकर,/ देश-काल- सबसे छिटककर/ जाएँ तो जाएँ कहाँ!/ कुछ देर सोचने के बाद तय किया-/ नहीं, किसी स्वर्ण-युग में तो नहीं जाएँगे-/ क्या करेंगे- चन्द्रगुप्त मौर्य या विक्रमादित्य,/ हर्षवद्धन, अशोक, अकबर के युग तक जाकर?/ गए अगर- बस अड्डा छू लौट आएँगे./ छू लौट आएँगे/ चाणक्य की चुटिया, वैताल की लुटिया,/ दानयज्ञ के बाद बची हुई हर्षवर्धन की खाली टोकरी/ या अशोक की उठकर गिरी हुई तलवार/ या बीरबल की खिचडी-विचडी!/ जाना ही होगा तो जाएँगे मोहनजोदाडो-/ मिट्टी की पहली गाडी का पहिया बनने!” -(अनामिका. कवि ने कहा: अनामिका, पृ.- पृ.- 37-38)

निर्मला पुतुल ने आदिवासी ऐतिहासिक प्रतीकों जैसे बाहामुनी, चुड़का सोरेन, सजोनी किस्कू, पकलू मराण्डी आदि को चुना है, जिसमें आदिवासियों की दुर्दशा तथा व्यथा का दयनीय और स्पष्ट चित्रण है-

“बस! बस!! रहने दो!/ कुछ मत कहो सजोनी किस्कू!/ मैं जानती हूँ सब/ जानती हूँ कि अपने गाँव बागजोरी की धरती पर/ जब तुमने चलाया था हल/ तब डोल उठा था/ बस्ती के माँझी-थान में बैठे देवता का सिंहासन/ गिर गयी थी पुश्तैनी प्रधानी कुर्सी पर बैठे/ मगजहीन ‘माँझी हाड़ाम’ की पगड़ी/ पता है बस्ती की नाक बचाने खातीर/ तब बैल बनाकर हल में जोता था/ जालीमों ने तुम्हें/ खूँटे में बाँधकर खिलाया था भूसा”। -(पुतुल, निर्मला. नगाड़े की तरह बजते शब्द. अनु.अशोक सिंह, पृ.23)

निष्कर्षत: कह सकते हैं कि प्रतीक भावों का आईना है, वह कवि के परिवेश, परिस्थिति और मनोसामाजिक संरचना से अवगत कराने का सशक्त माध्यम है. इससे काव्यार्थों में विविधता पैदा होती है तथा पाठक का दृष्टिकोण प्रभावित होता है. सन् 1980 के बाद की कविताएँ पढ़ने से स्पष्ट होता है कि बदलते परिवेश के साथ अब कवियित्रियाँ चौखट से बाहर निकलकर खुले गगन में अपना पंख फैला रही हैं. फिर भी घर इनकी जमीनी सच्चाई है, जिसे ये अपनी शक्ति भी मानती हैं. घरेलू प्रतीक इनके लिए वो नुकीले और धारदार औज़ार हैं जो इनकी प्रत्येक टूटन-घुटन, व्यथा-कथा तथा मन के सूक्ष्म भावों की अभिव्यक्त करते हैं, साथ ही पितृसत्ता पर करारा चोट भी करते हैं. जैसे नेहा शरद की कविता की एक लाइन “बेमन खूंटे से बंधी ब्याहता जो हूँ” में ब्याह के साथ खूंटा प्रतीक स्त्री-जीवन की सम्पूर्ण सुख-दुख और खटास को एक साथ प्रदर्शित करता हैं.

ये प्रतीक घर की चहारदीवारी के साथ-साथ भूमंडल के कैनवस पर आधी-आबादी के सम्पूर्ण चित्र के रूप में उभरते हैं. लेकिन ध्यातव्य है कि जितना पुरूष विश्व के प्रत्येक क्षेत्र में अपना वर्चस्व स्थापित कर चुका है, उतना स्त्री अभी भी नहीं कर पायी है. वह अभी भी किसी न किसी रूप में पुरूषवर्चस्ववादी सत्ता के पिंजरे में क़ैद है और मुक्ति के लिए छटपटा रही हैं. लेकिन वह हार मानने के लिए तैयार नहीं बल्कि समता, स्वतंत्रता और सद्भावना के धरातल मुक्ति के निरंतर प्रयासरत है.

सुनीता जैन के शब्दों में कहें तो-

“हो जाने दो मुक्त

आज अपनी ही राख से

उड़ूँ झाड़कर पंख

चीर आकाश”

-(जैन, सुनीता. सुनीता जैन: अब तक 3, कविता 1, पृ. 25,(हो जाने दो मुक्त)





        - डॉ. रेनू यादव

शनिवार, 12 मई 2012

Sathottari Kavita Ke Jalte Chulhe Par Stree-Bhasha

                                  साठोत्तरी कविता के जलते चूल्हे पर स्त्री-भाषा



“यह कविता नहीं

मेरे एकान्त का प्रवेश द्वार है

यहीं आकर सुस्ताती हूँ मैं

टिकाती हूँ यहीं अपना सिर

जिन्दगी की भाग दौड़ से थक-हारकर

जब भी लौटती हूँ यहाँ

आहिस्ता से खुलता है

इसके भीतर एक द्वार

जिसमें धीरे से प्रवेश करती मैं

तलाशती हूँ अपना निजी एकान्त

यहीं मैं वह होती हूँ

जिसे होने के लिए मुझे

कोई प्रयास नहीं करना पड़ता

पूरी दुनिया से छिटककर

अपनी नाभि जुड़ती हूँ यहीं”

-(पुतुल, निर्मला. नगाड़े की तरह बजते शब्द. अनु, अशोक सिंह. पृ.88.)

निर्मला पुतुल का यह वाक्य अक्षरश: सत्य है। स्त्री घर की चहारदीवारी के बीच दिन-रात यांत्रिक गति से चलती-फिरती थकी-हारी कभी सोच भी नहीं सकती कि उसे अपने पति, बच्चों के अतिरिक्त और क्या चाहिए? प्रेम की चाह भी उसकी मानसिकता की कढ़ाई में लगी हल्दी की भाँति होती है, जो घिस-घिसकर साफ करने से भी नहीं छुटती। रात को रसोईघर साफ करने के साथ-साथ बिस्तर पर नोच-खरोच के अलावा भी मन को शुकून देने की एक व्याकुलता बनी रहती है और वह पति-बच्चों को सुलाने के पश्चात् आधी रात उठकर पति और बच्चों के शक से दूर अपने जीवन-डायरी के गोंजे हुए पन्नों पर अपनी व्यथा लिख-लिखकर मन को विश्राम देती है । वहीं से उभरती है स्त्री की वास्तविक मनोदशा, जो पति, प्रेमी, पुत्र और परिवार अथवा किसी अंतरंग सहेली की समझ से परे है।

वैदिक ऋचाएँ, थेरीगाथाएँ, मीरा की भक्ति, महादेवी का प्रणय,सुभद्रा कुमारी चौहान की राष्ट्रभक्ति, कीर्ति चौधरी और शकुन्त माथुर का सप्ततार से होते हुए काव्य की अविच्छिन धारा प्रवाहित होते हुए भी साहित्येतिहास में गहरी चुप्पी छायी रही।

सन् 1960 तक आते-आते महिलाओं कि चुप्पी टूटी और अनेक कवयित्रियों ने अपनी समस्याओं पर खुलकर अभिव्यक्ति दी। साठोत्तरी कवयित्रियों में प्रमुख कवयित्रियाँ एवं उनके काव्यों के नाम इस प्रकार हैं-

अनामिका –(बीजाक्षर, अनुष्टुप, खुरदुरी हथेलियाँ), अनीता वर्मा – (एक जन्म में सब), अमिता शर्मा –(हमारे झूठ भी हमारे नहीं), आशारानी व्होरा – (लहर-लहर गिनते हुए), इन्दु वशिष्ठ – (धूप के रंग, टुकड़े-टुकड़े जिन्दगी), उषाराजे सक्सेना – (इन्द्रधनुष की तलाश में), कमल कुमार – (गवाह), कविता वाचक्नवी – (मैं चल तो दूँ), कात्यायनी – (सात भाईयों के बीच चम्पा, इस पौरुषपूर्ण समय में, जादू नहीं कविता), कान्ता नलिनी – (जकड़े रिश्ते उखड़े पाँव), गगन गिल – (एक दिन लौटेगी लड़की, थपक थपक दिल थपक थपक), निर्मला गर्ग – (कबाड़ी का तराजू), निर्मला पुतुल – (अपने घर की तलाश में, नगाड़े की तरह बजते शब्द),

नीलेश रघुवंशी – (घर निकासी, पानी का स्वाद), नेहा शरद – (ख़ुदा से ख़ुदा तक), प्रभा खेतान – (अपरिचित उजाले, सीढ़ियाँ चढ़ती हुई मैं), ममता कालिया – (खाँटी घरेलू औरत), रंजना जायसवाल – (मछलियाँ देखती हैं सपने), रमणिका गुप्ता – (खूंटे, मैं आज़ाद हुई हूँ), रमा द्विवेदी – (दे दो आकाश), रेखा – (चिंदी-चिंदी सुख, अपने हिस्से का सूरज), वीणा घाणेकर – (पता है और नहीं भी), सविता सिंह – अपने जैसा जीवन, नींद थी और रात थी), संध्या गुप्ता – (बना लिया मैंने भी घोसला), सुनीता जैन – (हो जाने दो मुक्त, कौन सा आकाश),

सुनीता बुद्धिराजा – (अनुत्तर), सुमन राजे – (उगे हुए हाथों के जंगल, यात्रादंश), सुशीला टाकभौरे – (यह तुम भी जानो, तुमने उसे कब पहचाना), सुशीला मिश्रा – (मोती पलकों के)।

इनके लिए तकिए के नीचे रखकर काव्य पढ़ना भले ही पुराना हो पर काव्य-लेखन नया क्षेत्र रहा, फिर भी इन्होंने बड़े ही साहस के साथ अपने जीवन के अंतरंगता को बिना किसी लाग लपेट के सीधे सच्चे शब्दों में व्यक्त किया। इन कवियित्रियों के अभिव्यक्ति की भाषा-शैली भले ही अलग-अलग रही हो किन्तु भाव एक ही है। इनकी ऊबड़-खाबड़ जीवन की भाँति उनकी कविता की भाषा भी ऊबड़-खाबड़ किन्तु विचारात्मक रही। निर्मला पुतुल के अनुसार-

“बिना किसी लाग लपेट के

तुम्हें अच्छा लगे, ना लगे, तुम जानो

चिकनी-चुपड़ी भाषा की उम्मीद न करो मुझसे

जीवन के ऊबड़-खाबड़ रास्ते पर चलते

मेरी भाषा भी रुखड़ी हो गयी है

मैं नही जानती कविता की परिभाषा

छन्द, लय, तुक का कोई ज्ञान नहीं मुझे

और न ही शब्दों और भाषाओं में है मेरी पकड़”

-(पुतुल, निर्मला. नगाड़े की तरह बजते शब्द.अनु, अशोक सिंह. पृ. 94)

भाषा की परिभाषा भी महिलाओं ने पुरूष की परिभाषा से भिन्न अपने ही अंदाज में दिया है। स्त्री-विमर्शी कवियित्री अनामिका ने बड़े सरल शब्दों में कह दिया है- “भाषा का सार है संवाद, भाषण नहीं। दोनो होठों की अस्मिता बरकरार रखने का नाम है भाषा” । -(अनामिका. कविता में औरत. पृ.28)

जूलिया क्रिस्तेबा भाषा को परिभाषित करते हुए कहती हैं- “भाषा एक रलगल प्रक्रिया (जैनरेटव प्रॉसेस) है, अर्थविन्यास का अटल ढाँचा नहीं। मातृसत्तात्मक प्राक-एड़ीपसीय संवेदनाओं की (सिमिऑटिक) लय और पितृसत्तात्मक सामाजिक विनियमितताओं (सिंबॉलिक) के बीच का संवाद है भाषा”। -(अनामिका. कविता में औरत. पृ.44)

इरिगेरे ने यौन संवेदनाओं का सीधा संबंध भाषिक संवेदनाओं से माना है तो सिक्सू ने शब्दों की मितव्ययिताओं का संबंध ‘लिबिडनल इकोनॉमी’ से माना है कि पुरुष संग्रह प्रवृत्ति के कारण शब्दों का संग्रह करता है और स्त्री समेटती भी है, खर्च भी करती है और दान भी करती है। -(अनामिका. कविता में औरत. पृ.44)

काव्य का सामाजिक अध्ययन करने से स्पष्ट होता है कि काव्य-भाषा देश-काल और वातावरण से प्रभावित होता है। चूंकि कवयित्रियाँ स्वयं को कवि मानने से इंकार करती हैं तथा इनके लिए काव्य-क्षेत्र नया-नया है इसलिए ये अपने काव्य का मूल्यांकन सार्वभौमिक स्तर पर करने की माँग करती हैं। यदि इनके काव्य का सार्वभौमिक स्तर पर मूल्यांकन किया जाए तो इनकी भाषा का दो रूप सामने आता है-

1. स्वाभाविक भाषा

2. मनोसामाजिक संरचना पर आधारित भाषा

जिस भाषा को कवि या लेखक अपने परिवार, समाज, क्षेत्र तथा परिवेश से अनायास ही ग्रहण कर लेता है अथवा उसे ग्रहण करने में विशेष प्रयत्न नही करना पड़ता और वह भाषा शब्द –सम्पदा, मुहावरा, लोकोक्ति, लोकगीतों तथा मिथक आदि के रूप में स्वत: व्यवहृत होने लगती है, उसे स्वाभाविक भाषा कहते है। जैसे- बिस्तर की चादर मुचकना, कोख, खिचड़ी, सब्र, आबरू, आँचल, लाज, आज़ादी, करधनी, फूलदान, कचनार, बिरवा, लीपना, मेंहदी, कुहुकना, सिंगारदान, लालसाड़ी, घूँघट, कैसेरॉल, रोटी, चोटी, चटनी, टिकूली, अँगिया, नेलपॉलिश, चौकी, बेलन, सिंगारदान, मसखरा, सुहागसेज, जच्चाघर, भात, महुआ, गोबर आदि।

मनोसामाजिक संरचना पर आधारित भाषा के अंतरगत वे भाषाएँ आती हैं, जिसमें देश, काल, परिवेश तथा कवि की मानसिकता के अनुसार कुछ विशिष्ट शब्द-सम्पदा का चयन होता है, जिसे चाहकर भी कवि स्वयं से अलग नहीं कर पाता तथा भाषा उसकी शैली के साथ समन्वित हो कर विशिष्ट बन जाती है। इसका प्रत्यक्ष प्रमाण गगन गिल, रमणिका गुप्ता, अनामिका, निर्मला पुतुल, सुशीला टाकभौरे, नेहा शरद आदि कवयित्रियों के काव्य में देखा जा सकता है। इनकी भाषा जमीन से जुड़ने के कारण अत्यंत जीवंत होती हैं। जिसका प्रथम आधार समाज होता है, जहाँ स्त्री को दोयम दर्जे का समझा जाता है। समाजभाषावैज्ञानिकों ने स्त्री का वस्तूगत मूल्यांकन एवं दोयम दर्जे का समझा जाना ही उनकी एवं पुरूष की भाषा में भिन्नता का प्रमुख कारण माना है। डॉ ऋषभदेव शर्मा के अनुसार उनकी पारंपरिक भाषा विनम्रता पूर्वक थी, वे आलोचना नहीं कर सकती थीं, प्रश्न नहीं कर सकती थीं, आदेश नहीं दे सकती थीं, किन्तु अब वे इस कटघरे से बाहर निकल आई हैं।अब वे नि:संकोच अपना आक्रोश व्यक्त करती हैं, प्रश्न पूछती हैं, आदेश भी देती हैं। इनकी भाषा अधिकतर सांकेतिक होती हैं, जिसे देह की भाषा भी कहते हैं। इनका प्रयुक्ति क्षेत्र घरेलू है, इसलिए ये घरेलू शब्दावली जैसे चौका, बर्तन, रोटी, झाड़ू, बूहारू, कूर्सी, मेज, किचन, सुपेली आदि के साथ-साथ अपनी व्यक्तिगत अनुभूति जैसे मासिक-धर्म, प्रेम, पीड़ा, सहवास, बलत्कार, प्रसव, वैधव्य, सुहाग, मातृत्व आदि विषयों पर लिखना शुरू की हैं, जिससे पुरूष वर्ग सदैव बचना चाहता है। किंतु कवियित्रयों ने अपनी जीवनाभूति एवं घरेलू हथियार से पूरे साहित्य जगत् को चुनौती दी है तथा पांड़ित्य-प्रदर्शन को कटघरे खड़ा कर दिया है। उदाहरण के लिए कवियित्री अनामिका का ‘प्रथम स्राव’ नामक कविता देख सकते हैं, जिसमें प्रथम माहवारी के समय एक लड़की की मानसिक ऊहा-पोह के विषय में बड़ी ही सुन्दर अभिव्यक्ति है-

“उसकी सफेद फ्रॉक / और जाँघिए पर / किस परी माँ ने काढ़ दिए हैं / कत्थई गुलाब रात-भर में ? / और कहानी के वे सात बौने / क्यों गुत्थम-गुत्थी / मचा रहे हैं / उसके पेट में ?/ अनहद-सी बज रही है लड़की / काँपती हुई। / लगातार झंकृत हैं / उसकी जंघाओं में इकतारे।/ चक्रों सी नाच रही है वह / एक महीयसी मुद्रा में / गोद में छुपाए हुए / सृष्टि के प्रथम सूर्य सा, लाल-लाल तकिया”। (अनामिका. अनुष्टुप. पृ.28-29)

पेट में गुत्थम-गुत्थी मचाना, अनहद नाद सी बजना, जंघाओं के बीच झंकृत होना एक औरत ही समझ सकती है, क्योंकि यह मात्र औरत का क्षेत्र है। अनामिका की भाषा जलते चूल्हे पर सिंकती रोटी की सोंधी खुशबू की तरह उड़कर आसमान को भी पढ़ने हेतु ललचा देती है। इनकी कविता बोलचाल की भाषा का वह विलुप्त रूप प्रस्तुत करता है, जिसका लेखन में बहुत कम प्रयोग होता है। जैसे – पुकूर-पुकूर, थकियाई, पारना, कजरौटा, चुटूर-पुटूर, अकर-बकर, खुदूर-बुदूर, चुकूमुकू, बुक्का, पट्ट, छनकाह, कछमछ, गमागम, टुईयाँ, पतुरिया, चकत्ता, कठुआ, दिठौना, बोरसिया, सीवान, तोपन, दूधकट्टू आदि। इनकी कविता में एक लय और ताल प्रवाहित होता है, इसलिए इनकी भाषा को संगीतात्मक भाषा कह सकते हैं।

“कोई ऐसी बात जिससे बदल जाए

जीवन का नक्शा,

रेती पर झम-झम-झमक-झम कुछ बरसे...”

-(अनामिका. खुरदुरी हथेलियाँ. पृ. 29)



कवयित्रियों ने पुरूष-सत्ता की रूढ़ियों, नियम कानूनों, कूरीतियों के विरोध में निषेधात्मक भाषा का भी प्रयोग किया है। जैसे-“क्षमा नहीं मांगूंगी... झुकूंगी नहीं... मैं अब सीता नहीं बनूँगी... रूप नहीं वरूँगी”। -(गुप्ता, रमणिका. खूँटे. पृ.47)

रमणिका गुप्ता ने प्रेम और सेक्स की कविताओं को खूले मन से नि:संकोच लिखा है, प्रेम उनकी हिम्मत है तो सेक्स उनके प्रेम का चर्मोत्कर्ष। उन्होंने कभी भी पुरूषों के आगे सर नहीं झुकाया बल्कि उन्हें झुकने के लिए सदैव मजबूर किया है। उन्होंने पुरूषवर्चस्ववाद के विरूद्ध प्रहारक भाषा का प्रयोग किया है, नोच दूंगी, खरोच दूंगी, उधेड़ दूंगी, रगेद दूंगी आदि आक्रोशमयी शब्द यत्र-तत्र पाये जाते हैं। इसलिए इनकी भाषा को लट्ठमार भाषा भी कह सकते हैं। रमणिका के विचारों का आंगन लीपकर समतल बना सुनीता जैन पुरूष का विरोध पतीली में सींझते चावल की खदबदाहट की तरह करती हैं। इनका विरोध न उफनकर गीरता है और न ही शांत होता है।

“वह अभी तक वहीं बैठी है

जिसके संग

माँ ने बचपन में

भाँवर फेरी थी,

नहीं ! नाक में

नकेल गेरी थी”।

-(जैन, सुनीता. सुनीता जैन : अब तक 6, कविता 4. पृ.14. (सीधी कलम सधे न))

इनकी भाषा को खदबदाती भाषा भी कह सकते हैं।

सुशीला टाकभौरे की जमीनी समस्याएँ आसमान तक कौंधती हैं। सहज बोलचाल की भाषा विश्वास, आस्था, चरित्र, ओट, घूँघट, सूरज आग का गोला, झोपड़ा, कपाट, निरीह, तिमिरघनकूप, कनक, कामिनी, कुलबुलाना आदि इनकी शब्द सम्पदाएं ही इनकी भाषा को विशिष्ट बनाती हैं। इनकी कौंधती भाषा की व्यंगात्मकता पाठक के दिलों-दिमाग में कौंधती रहती हैं। सुशीला कौंधती और कड़कती हैं तो निर्मला आसमान से ज्वाला बनकर बरस जाती हैं।

निर्मला पुतुल आदिवासी कवयित्री होते हुए भी आदिवासी स्त्री की व्यथा के साथ-साथ समस्त स्त्री-भावनाओं को अत्यंत कोमलता से उभारती हैं, किन्तु पुरूषसत्ता तथा अत्याचार के विरूद्ध ज्वालामुखी की तरह फूट पड़ती हैं।

“पर याद रहे/ नहीं टूटूँगी इस बार/ बिखरूँगी नहीं तिनके की भाँति/ तुम्हारे भय की आँधी से

अबकी फूटेगा नहीं मेरा सिर/ चकनाचूर हो जाएँगे बल्कि / तुम्हारे हाथ के पत्थर”

-(पुतुल, निर्मला. नगाड़े की तरह बजते शब्द. अनु. अशोक सिंह. पृ. 90-91)

कात्यायनी का प्रेम और विरोध दोनों ही दो टूक भाषा में प्रकट करती हैं। संस्कृतनिष्ठ शब्दावली और शब्दों की मितव्ययिता के कारण इनकी भाषा काफी क्लिष्ट जान पड़ती है, किंतु गद्यात्मक शैली में लिखा काव्य अत्यंत सहज और सरल हैं। कविता को खारे जल में धोती कविता वाचक्नवी खनखनाती भाषा का प्रयोग करती हैं तो नेहा शरद अपनी मृदुता के साथ ही विरोध और प्यार दोनों व्यक्त करती हैं । अत: अनामिका कहती हैं- “हाशिए पर रहने वालों की भाषा हमेशा ही अधिक जीवंत, रंग-रंगीली और ठस्सेदार होती है। जो भी वर्ग-वर्ण, लिंग- एक श्रोता की स्थिति में विधेय स्थान पर, अवरूद्ध और उपभोग होते हैं- पता नहीं किन स्रोतों से, क्षतिपूर्ति सिद्धांत के अनुकूल उनकी भाषा में एक अलग तरह की रवानी, तेजस्विता और अनुगूंज खचाखच समा जाती है”।

-(अनामिका. कविता में औरत. पृ.28)

जिस प्रकार आलोचकों ने कवियित्रियों की भाषा को अपरिपक्व कहकर विलगा दिया था, उसी प्रकार लगता है कि कवियित्रियों ने अपनी स्त्रीत्व को शक्ति बना स्त्री-भाषा से ही भाषा के प्रति एक आंदोलन खड़ा कर दिया है। विलगाओ... देखे कहाँ तक विलगाते हो..? हम तुम्हारा मूँह तोड़कर नहीं बल्कि अपने दायरे में रहकर और अपने औरतपने से ही लड़ेंगे। जैसे इन्होंने हठ ठान ली हो औरतपन को गाली बनाने को बजाय शक्ति बनायेंगी। देखते हैं दुनियाँ अब और कौन सी नई गाली रचती है..? जलते चूल्हे को कितना बुझाओगे, बुझने के बाद अपनी भाषा गरमी से गोईठा भी सेंक सकती है। और अगर बुझ गई तो तुम लोग अपना भात भी किस पर पकाओगे ?... सोचो और सोचते रहो...।

निष्कर्षत: कह सकते हैं कि साठोत्तरी कवयित्रियों की एक अलग ही भाषा-संसार है, जिसमें भाव है, प्रेम है, दर्द है, ललकार भी है। समस्या है और समस्या से मुक्ति पाने का रास्ता भी है, जीवन है, प्रकृति है, प्यास है, आस है, एहसास है, आभास है, दुख का रोना रोया किंतु दुख से उबरने की हिम्मत भी है, ज़मीन रहते हुए आसमान में उड़ने की चाहत भी है। गर्भ से लेकर बिस्तर तक, चौका से लेकर चौखट तक, चौखट से लेकर भूमंडलीकरण तक और हासिए लेकर मुख्यधारा तक स्त्री-भाषा अपनी प्रकृतिगत कोमलता के साथ-साथ लहलहाती ज्वलंत भाषा है।

बुधवार, 9 मई 2012

Chaukavan Rad (Kahaani)

 
चउकवँ राड़ 

       नहीं... मैं एक पाँच साल के बच्चे से बियाह नाहीं कर सकती

       काहे नाहीं कर सकती, ऊ तोर रखवाला रहेगा, घर में खाये-पीये के मिलेगा ही... पूरे धन-जायदाद की मलिकन रहोगी, जिनगी आसानी से कट जायेगी...

       पर ईया....

       कुछू नाहीं... डरने की का बात है. खावो-पीयो... ओहुके पालो-पोसो... थोर और समय गुजरेगा तब तक तो उ जवान होही जायेगा. सर पर सवांग क साया बहुत ही जरूरी ह, खासकर अपने मरद क... नाहीं त दुनिया औरतन के कच्चा काट खात ह. बच्चा... हमार ईज्ज़त अब तुहारे हाथ में है.

       ईज्ज़त...

       वैसे भी भगवान हम सबके मुँह पर कारिखा पोत दिए हैं, नाहीं त तू चउकवँ राड हो जाती

       राड़...

       सुनते ही नीलम का मुँह करिया झांवर हो गया... आँसू पलक तक आते-आते ठहर गया, बिन गवनहरू लड़की अपने परानी के खतीर रो भी नाहीं सकती.

       

       कितना बड़ा दुर्भाग्य है कि छोटका भाई के जनम के दस दिन बाद ही बाबू जी बलड कैंसर की बिमारी से तड़प-तड़प कर इसी ओसारे में चल बसे. हम दो बहने दो भाई बडका बाबूजी के सहारे पलने लगे. वे पालते क्या थे बेगारी भठते थे. मरे बैल की तरह बाबा-ईया और हम सबकी बैलगाड़ी खींचते थे. अम्मा खेत में काम करने निकल पड़ी, कटनी-सोहनी के साथ-साथ गाय भैंस पालने लगी. तब जाकर कइसो गुजारा होता था. इसी खींचा-तानी में हम भी छ: तक पढ़ लिए. लेकिन रोज-रोज बड़की माई क ताना करेजा छलनी कर देता था, कुछ जवाब दे देने पर बड़का बाबूजी अलगउजी पर उतर आते थे. बड़का बाबा भी हार मानकर अलगाने की बात करने लगे, लेकिन छोटका बाबा सबको एकवटने में लगे रहे. पर ईया अपनी सवारथ भरी आँखों से मुलूर-मुलूर देखती रही और कहती कि जो हमार सेवा-टहल बजायेगा, हम उसी में रहेंगे. उन्हें एक बार भी खयाल नहीं आया कि वैधव्य के दंश के साथ एक विधवा अकेले चार-चार बच्चों को कैसे पालेगी? आखिरकार बड़े बाबूजी के हिस्से में दादा जी और मझले बाबूजी  के हिस्से में ईया आयी. छोटका बाबा हम लोगों के साथ खड़े हो गयें; हमरे त परिवार नाहीं ह, पर इह लोग हमार परिवार हैं. जब तक जीयेंगे हम इनके साथ खड़ा रहेंगे. हमार राड़ पतोहि आखिर अपने चार-चार लइकन के साथ अकेलअ कैसे पालेगी.  जुग जमाना एतना खराब ह. भगवान न जाने कवने पाप क सज़ा दे रहे हैं.

छोटका बाबा के सहानुभूति का गाँव वालों ने अलग ही मतलब निकाला. सबने माई और बाबा के रिस्ते पर ऊँगली उठाई. पर दोनों बड़ी ही सच्चाई और ईमानदारी के साथ हमन के पाल-पोस के बड़ा किया. धीरे-धीरे गाँव वाले अपने-आप चुप हो गए.

       दस-बारह बरस के होते होते बाल फटने लगी, लोग हमरे बियाह के खातीर परेशान होने लगे. अम्मा तो अपनी धराऊ साड़ी के साथ-साथ थोड़ा-थोड़ा करके वियाह अउर गवने क सामान भी जूटाने लगी. खटिया-मचिया से लेकर मउनी-दऊरी, दही-तोपना, बटुली-बटूला और ओकर तोपना, मेजपोस, परदा, गेट सब सी-बीन कर रखने लगी, छठवीं कलास में ही बियाह हो गया. बियाह के बाद भला कैसी पढ़ाई. पढाई तो सिर्फ बियाह करने और पति को चिट्ठी-पतरी लिखने के लिए किया जाता है.

       मांग में सेनूर पड़ते ही हमने उनको अपना पति-परमेश्वर मान लिया, मन ही मन उनके ऊपर सबकुछ निछावर कर दिया. गवने की तइयारी हम भी करना शुरू कर दिए, काहे कि एकबारगी में ही सब कुछ होता नाहीं. चुप-चुप ही सखियों और भाभीयों से नीक-नीक ऊन मँगाकर उनके खातीर स्वेटर, कूलही और मोजा-दस्ताना सब बीन लिए. बियाह में घुँघट एतना था कि उनको देख ही नहीं पाये थे, लेकिन ऊज्जर-ऊज्जर गोड़ देखी थी. येसे अन्दाज त लग ही गया था कि गोरहर लोगों पर कैसा रंग खिलता है. सोचा था कि गवना जाड़ा में ही होता है.  गौना के पहली रात को जब अपने हाथ का सिला-बीना सामान दुँगी तो उ त हम पर मर मिटेंगे... जब-जब हमरे हाथ क बीना सुईटर पहनेंगे तब-तब हमरे प्यार क गर्मी उनकी संगी-साथी रहेगी.  

       बियाहे के तीसरे साल में ही गवने क दिन धरा गया. सब समान धराने-उसराने लगा. माई से बिछुड़ने क दु:ख और उनसे मिलने की खुशी एक साथ मेरे मन में हिलोरे लेने लगी. जैसे नदी पहाड़ की गोद से निकलकर सागर में समाने जा रही हो. अपने बाबूजी के मरने के बाद हम ही और छोटका बाबा माई क सहारा थे. बाबा कितनाहूँ तो का, मरद जाति. हर बात तो उनसे माई नाहीं कह सकती थी. येसे हमही माई के सबसे करीब रहें. माई एक महीने पहले से ही रो-रोकर घबराने लगी थी. उसको ये चिंता खाए जा रही थी कि गवने में कहीं कवनो सामान घट न जाये. औकात से जयादा तैयारी में जुट गयी थी. टेंटवाले, हलवाईवाले, कहार-कोहार सबको सट्टा दिया गया. कपड़ा खरीदकर बेलाऊज-साया सिलाने खातीर दर्जी को दिया गया. मन में खुशी क फूल खिलने लगा कि अचानक फूल क पराग गिरकर झहरा गया. गवने के सोलह दिन पहले खबर आयी कि उनका एक्सीडेंट हो गया. और फिर उसी एक्सीडेंट में...

       तब से लेकर हमरे जिनगी के साथ-साथ इ घर में भी सन्नाटा छाया है. न खाये क मन न पीये के, न घर में रहने का मन न ही कहीं जाने का, न कवनो खुशी न ही कवनो दु:ख. सब ने हमारी गरीबी देखकर हमसे नाता तोड़ लिया. माई क आपन घाव भरा ही न था कि उसपर हमारा बैधव्य.. मुँह के बल गिर पड़े हम लोग. माई रो-रोकर भगवान को कोसती रही कि हमके जो किये सो किये, हमरे बेटी के उह दुख काहें दिये. जीवन में हम ही अभागिन थे कि पति अउरी दामाद दूनो चल बसे. जेतना दु:ख मरदा के गईले नाहीं हुआ ओतना दमदा के गईले हो रहा है. कवन गलती हो गयी थी नाथ... अरे हमके उठा ले गये होते पर हमरे परान के राड़ काहे बनाये.

       माई के रोने से बन क पत्ता झहरा जाता था. पर माई से जियादा अभागिन मैं थी कि माई तो रोकर अपना मन हल्लुक कर लेती थी लेकिन हम त रो भी नहीं सकते थे. बियाहे के बाद और गवने से पहले की लड़की क पति न तो आपन होता है न ही पराया. पति नाम क मोहर तो लग जाती है पर उससे कोई सुख-सवारथ की इच्छा रखना पाप ही माना जाता है. अउर त अउर उस पति के अलावा किसी और के बारे में सोचना, बात करना अउरी बड़ा पाप माना जाता है. ऐसे में बिन गवनहरू लड़की अपने पति के खातीर रोये तो कइसे रोये. फफक-फफककर खूब रजाई में रोती रहती थी. ईया देखती तो कहती; जब गवना नाहीं हुआ तो ऊ तुहार मरद काहे का. उ दुसमन हो गया दुसमन. ऐसा सामाजिक चाल मकडी के जाल से कम नाहीं. जबतक ऊँ जिये तबतक हमार सब कुछ उह थे और मरने पर दुसमन हो गए, कइसे..?  जहिया से ये सासू चुटकी सेनूरवा, तहिया से स्वामी हमार गीत अब हमरे खातीर झूठ हो गया. सेनूरदान के समय से उनसे परेम क खुशबू हमरे तन मन में समा गया, लेकिन हम का करें यहां तो फूल सूखने के बाद खुशबू भी जिनगी से लोग मचोड़ देते हैं. करेजा काठ बन गया है.

       सच तो इ है कि दुनिया के नज़र से बचाने के खातीर छोटहने पर बियाह कर दिया जाता है और बियाह के बाद उस मरद के नज़र से भी बचाया जाता है कि कहीं लड़की बदचलनी न करने लगे. लेकिन दुनिया इ नाहीं समझती कि बियाह और गवने के बीच लड़कपन क सपना हम सबको कोढ़ी बना देता है. तिरसिया के मरद ने गवने से पहले ओके फोन कर दिया, ओकरे पास त फोन था नाहीं, त उसके मरद ने गाँव के लइका के फोने पर फोन किया. तिरसिया उस समय गोबर फेंकने गई थी त उसकी माई ने बतिया लिया. इ बात न जाने कइसे ओकरे बाबूजी को पता लग गई. फिर तो उ एइसन हड़कंप मचायें कि गाँव दंग रह गया. तिरसिया के माई को खूब लाठी-लाठी मारे और तिरसिया को खूब गारी देने लगे; जवानी मान में नाहीं आ रही ह का, कहलवा दें का कि गवना कराके उठा ले जा. तेही बोली होगी तब न उ फोन किया था, नाही त गाँव क लवण्डा क नम्बर ओके कइसे मिलता... तिरसिया लाजन धंसती जा रही थी, उ कहती रह गयी कि हमके कुछ नाहीं पता, लेकिन ओकर बात सुनता कवन. रो-रो कर ओकर आँख फूलके लाल गुब्बा हो गया.

       हमारा भी बहुत मन करता था उनसे बात करने का, लेकिन तिरसिया क हालत देखिके हम मन मार लिए थे कि हमरे बाबूजी नाहीं है तो लोग अउर उधुआ उठायेंगे. अउर पता नाहीं ऊ हमसे बात भी करेंगे कि नाहीं, पता नाहीं ऊ हमरे बारे का सोचेंगे. फिर हमहूँ मन मसोसकर रह गए. आज ऊ हमरे जिनगी से हमेसा-हमेसा के लिए चले गए फिर हम उनके भूल नहीं पा रहे हैं. अब पछताते हैं कि उ जवन भी सोचते कम से कम हम एक बात उनका बोली त सुन लेते, का पता कि उ हमसे कुछ अपने दिल क बात ही करते.

       गवने के खातीर जो साड़ी-वाड़ी सिलाया था उ सब फूँका गया. साथ ही हमार सपना भी राख हो गया. एइसा लगता है कि हम अपने पति से जयादा पति नामक मोहर से परेम कर बैठे थे, सिन्दूर की पहचान से परेम कर बैठे थे, तभी तो आज तक हम उस बिन देखे मनई को याद करके रो पड़ते हैं. बिना कोई रिस्ता बने ही हम उनकी ओर इतना झुक गए कि आज उनके बगैर अपने जिनगी के बारे में सोच भी नहीं पाते. कइसे काटूँगी अकेले एतना बड़ा जिनगी...

       

       ए मुँहझौसी... कवनो काम-धाम नाही ह का, जहाँ बैठती है दूब जाम जाता है....” (ईया गरियाते हुए चली गयी)

       का करें, कवनो काम-धाम में मन नाहीं लगता, अगर करती भी हूँ तो कुछ न कुछ गलती हो ही जाती है, तबो डाँट-फटकार सुनने को मिलती हैं. जियल हराम हो गया है. पहले डाँट पड़ती थी तब हम सोचते थे कि गवनव तक न डाँटेंगे, ओकरे बाद त हम अपने घर चले जायेंगे. लेकिन अब....

       माई क तबीयत दिन-ब-दिन बिगड़ रही है, घर में पइसा न कौड़ी, दवा कइसे कराऊँ. रोपनी-सोहनी से जो पइसा मिलता है उ दू जून की रोटी में ही खतम हो जाता है.



       सुन निलमी... काहे बियाह के खातीर तइयार नाहीं हो रही.. (कहते हुए माई घस्स से बैठ गयी)

        माई अब तुहऊँ... उनके गुजरे हुए साल भर भी नाहीं हुए औऊर हम कइसे किसी और की मेहरारू होने के बारे में सोचें..

       अरे तोके सोचे खातीर कवन कह रहा है, सोचे खातीर हम हैं न... ईया बाबा सब तइयार हैं. देख बेटी.. हमहूँ करेज्जा पर पाथर रखके कह रहे हैं... तू अबहिन छोटी हो, तुहके नाहीं पता कि मरने के बाद आपन परानी दुसमन बन जाला. इ कहो कि गवना नाही हुआ था, अगर गवना हो गया होता तो तुहार दूसर बियाह नाहीं हो पाता. कुवाँर-कचनार लड़की हो बियाह हो जायेगा त तुहार जिनगी सुधर जायेगी. तू नाहीं जानती एक राड़ की... ऊपर से जवान राड़ क जिनगी कइसन होती है, पूरा गाँव नोचने खाने को दउड़त है. कवनो खर्चा नाहीं देते लेकिन ईज्ज़त पर हाथ साफ करने खातीर और ईज्ज़त उछालने के खातीर सब तैयार रहते हैं. राड़ क जिनगी कवनो जिनगी नाहीं होती है. पहले पति के चिता पर मेहरारू सति हो जाती थीं, कम से कम मरके सरग तो मिलता था लेकिन अब हर दिन हर रात समाज चिता पर चढ़ाता है जिससे हम हर रोज मरकर भी नाहीं मरते और जीकर भी नाहीं जी पाते. बियाह के बाद कम से कम तुहार ईज्ज़त तो बची रहेगी.    

       बेटी... हम तुहार दुसमन नाहीं हैं. तू सोच तुहरे पीछे दो भाई और तुहार छोटकी बहिन हैं, उनका का होगा.

       तुहार सास-ननद गाँव के बहरा मिलने आई थीं. बड़ी भलमानस हैं ऊ लोग. तुहार सास रो-रो कर पपिहरा हो गई हैं, कह रहीं कि जवन गहना-कपड़ा हम दिए हैं वापस नाहीं लेंगे, एतना लगा-बझा के हम बियाह किए थे अपने बेटा का अऊर रऊरे भी की थी, सो सारा खर्चा भी बच जायेगा. बस दू जोड़ी कपड़े में बिदा कर देना.

        तुहार ननद त जइसे गऊँ हैं, उ तो कहने लगीं कि हमके रांड़ होने से कवनो परेसानी नाहीं है. हमरे भाई क एकलौती अऊरी आखिरी निसानी बची है. हमरे अँचरा में हमरे भऊजाई को हमरे पतोहि बनाकर डाल दो. रहल बात उनके छोटकी बहिन क त जवन हो सकी सब लगा-बझा के उनहू क बियाह हम करा देंगे.

       अब तू ही सोच कवन एतना सबके बारे में सोचता है. सोग पडी लड़की के केहू नाहीं अपनाता है. छूटकी क भी बियाह उ लोग करा देंगे. बेटी... हमहन में त एतना दम नाहीं है कि हम तूहार बियाह फिर कहीं अच्छे घर में करा पायें, जवन था सब वो बियाहे में लग गया. अब त दू जून की रोटी मिल जाए उह ढ़ेर है. अब जो कुछ सोचना है उ छोटकी के बारे में सोचना है कि उहो कइसो निबुक जाए, और दूनो लइके कइसो पढ़ लिख लें. जब भगवान हमहन के मुँह पर राड़ क करिखा पोत दिए हैं, तो कईसो जिनगी बिताना ही है. हम तो अपने बचवन क मुँह देखके कइसो बिता रहे हैं, पर तूहरे तो कवनो आधार नाहीं है.

       देख तुहरे ननद क एक ही बेटा है, बियाह के बाद दूनो जगहीं क धन-दऊलत तुहार अउरी तुहरे लइकन-फइकन क ही होगा. तू ठीक से सोच ले बेटी...

       इ सोचे चाहे न सोचे, हम बियाह कर देंगे. वइसे भी बियाहे में लइकनीन क मन कवन पूछता है (ईया बड़बड़ाते हुए चली गयी)



       अगर हमरे बियाहे से सबका भला होता है, त हम बियाह कर लेंगे. लेकिन का हमरे मरे हुए पति हमें इस बात के लिए हमें माफ कर देंगे, वे दूसरे के साथ हमके देख के भूत बनके नाहीं पकड़ेंगे? वइसहों बियाहे से पहले उनको सोखा-ओझा से बइठवाना पड़ेगा. पर हम त उनसे परेम करते हैं, फिर हम किसी और मरद से बियाह कइसे कर सकते हैं...

      नाहीं...हमके सिर्फ अपने बियाह के बारे में सोचना चाहिए...



       माई... हम बियाह कर लेंगे. उसके बाद त आप लोग खुश रह पाओगे न, का सचमुच उ लोग छूटकी क बियाह कर देंगे.

       हँ..हँ.. उ लोग कहे हैं तो करेंगे ही.

       अगर नहीं करें तो...

       कइसन बात करती हो, सुभ-सुभ बोलो. हमके पूरा भरोसा है.



       हम बियाह कर लेंगे.. नीलम कई दिनों तक सोचती रही. उधर बियाह की तैयारी होने लगी. नीलम ने खाना-पीना छोड दिया. चेहरा उतर आया. ईया कहने लगी लगन लग गई है, बडा सुभ बियाह है हमरे बहिनी क.

       नीलम दुविधा में जीने लगी. बियाह होगा तो परिवार क भला होगा, हमरो जिनकी जइसे-तइसे कट जायेगी. लेकिन कइसे...? उ तो पाँच साल का लइका है, एतना छोट त हमार छोटका भैयवा है. हम उसे पालेंगे, तब उ बड़ा होगा. कम से कम हम उससे पंद्रह-सोलह साल के बड़े होंगे. जब इ जवान होगा, तबतक हमार आधी उमर बीत चुकी होगी. फिर उ बच्चा हमरे बारे में न जाने का-का सोचेगा. हम सबकुछ जानते हुए कइसे उस बच्चे की जिनगी बरबाद कर दें...

       वह बड़हन होगा तब का हमरे रिस्ते को अपना लेगा, का जवान होने के बाद उ हमसे प्यार करेगा,  वह मुझे अपनी पत्नी का दर्जा देगा या महतारी का ? का उ हमसे नफरत नाहीं करेगा, का उ हमरे परिवार अऊर अपने माई-बाप को माफ कर पायेगा ?  अगर रिस्ता भी हमसे बना ले तबो उ मन से हमें नाहीं अपनायेगा... उ हमरे साथ कहीं जाने में भी लजायेगा काहें कि हम उनके आगे बुढ़ हो चुके होंगे. वह  अपनी जमीन जायदाद सब तो दे देगा लेकिन पत्नी का दर्जा...??? आखिर उनका भी तो मन होगा अपनी उमर की मेहरारू लाने का, फिर उ हमरे साथ काहे जिनगी गुजारेगा...

       आज हम जान रहे हैं कि अपने सवारथ के खातीर पूरा परिवार एकवट के हमारा बियाह कराना चाहता है, लेकिन उ बच्चा त इहो नाहीं जानता कि बियाह क मतलब का है. हमार जिनगी त मेहनत मजूरी चाहे यहाँ चाहे वहाँ करके गुजर जायेगा लेकिन उ बच्चा के बारे में केहू नाहीं सोच रहा. हम उनको पाल-पोस के उनके संरक्षक बन जायेंगे लेकिन पत्नी कभी नाहीं बन पायेंगे. हम औरतन के गाय समझके कवनो भी खूंटे में बाँध दिया जाता है, लेकिन उ तो मानूस है. वह हमरे साथ काहे बंधना चाहेगा. आखिर धन-दौलत ही तो सब-कुछ नाहीं होता, मनुस्यता भी तो कवनो चीज है. हम का करें, कुछू समझ में नाहीं आ रहा. एक ओर हमारा परिवार, बहन की जिनगी अऊरी दुसरे ओर उ बच्चा क जिनगी..



       दू अछर पढ़ का लिहनन, अपने आपके पंड़ित समझने लगनन. सहर से आया है.. इह सीख के आया है.. लतखउका... ईया गरियाते हुए कपारे पर खाची रखे चली आ रही है.

       का ह ईया”?  नीलम ने कांपती आवाज में पूछा.

        अरे हऊ रामरतना क सपूत सहरिया गया है, अधिकाराम... तुहरे बियाह के बारे में सुनते ही भड़क गया और कहने लगा कि काहे ओकर जिनगी बरबाद कर रहे तुहन लोगन. बिधवा ह त का हुआ कहीं न कहीं बियाह हो जाई. कह रहा था पाँच साल के लइका से बियाह कराओगे तो जेल में ढुकवा देंगे. लतमरूआ..          भला बता... कवन समझदार लइका राड़ी का हाथ थाम्ही.  जेल में ढुकवायेगा... इह दिन देखना रह गया था. हमन के दिन-रात क कवनो हैं नाहीं, कइसो तुहार बियाह हो जाता तो छोटकियो क पार-घाट लग जाता. बियाह करके हमनो तर जाते. रहल दूनों लइकन क बात त उ त लवण्डा जाति हैं, अपना कमायेंगे खायेंगे...

       बस ईया बस... उ लईका हैं तो कमा-खा सकते हैं अउर हम लइकी हैं त काहें नाहीं. अरे मेहनत मजूरी ही करनी है तो जइसे वहाँ करेंगे वइसहीं यहाँ भी कर लेंगे. अपने सवारथ के खातीर एक बच्चा क जिनगी बरबाद कर देना कहाँ क समझदारी है. का पता कि हमरे बियाह के बाद छोटकी क बियाह उ लोग करें ही न, छोटकन के पढावे खातीर पईसा ही न दे, फिर तब तुम लोग हमें कवने करे ढ़केलोगे...

       चुप रह.. बहुत बोलने लगी है, हमके पूरा विसवास ह कि उ लोग आपन वचन पुरावेंगे. और उ बच्चा कईसन, अब उ तोर भतार ह भतार... होखे वाला मरद है, अब उह तुहार सब-कुछ ह.

        नाहीं है हमार मरद... (तमतमा उठी नीलम) मेरा मरद अब ये दुनिया में कवनो नाहीं है, अऊर उ पाँच साल क लईका हमार मरद कब्बो ना बन पायेगा. उ बड़हन होके हरदम हम सबको कोसेगा. मति मारी गई है तुम लोगन की. सच त इ है कि अपने सवारथ के खातीर तू लोग हमार सौदा कर रहे हो, उहो उसके साथ जिसे बियाह क मतलब भी नाहीं पता है...

       अरे सोगियानउनी... मुँह क करिखा छूट जायेगा, अकेल वेवस महतारी राड़ बेटी लेके कवने-कवने घाट क पानी पियेगी, समझती काहे नाही. कवनो सौदा नाहीं हो रहा तुहार...”

       हो रहा है हमार सौदा... तुम लोग लालच में आन्हर हो गए हो, उ बच्चा से बियाह करके हम खुद अपनिय आँख से गिर जायेंगे. अब हम तुहन के सामने एकदम नाहीं झुकेंगे... छूटकी क बियाह ही करना है न... त हम करेंगे अउर अपने बलबूते पर... भगवान ने सुहागिन की किस्मत नाहीं दी त का हुआ, गुन-ढ़ंग और जांगर तो दिया है. रोपनी-सोहनी, कटिया-दवरी के साथ-साथ कढ़ाई-सिलाई सब करेंगे. एक-एक रूपिया जुटाकर दूनों भैयवन के पढ़ायेंगे अऊर छोटकी क बियाह भी करेंगे. इ राह जरूर कठिन है लेकिन एतना भी कठिन नाहीं कि हम कर न सकें. इ सब करके कम से कम हम अपने जिनगी भर उ बच्चा क जिनगी बरबाद करने के अपराधबोध से तो बच जायेंगे. तुहन लोगन कुछू कर लो लेकिन हम बियाह नाहीं करेंगे.

       ....................................

.............................................”

       बिहानअ जाकर उनके घर से जो कुछ मिला था, रूपया- पैसा, कपड़ा-लत्ता और जेवर सब लउटा देना अउर कह देना हमने बियाह करने से मना कर दिया है.





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Rishton Ka Ganit

        रिश्तों का गणित 

रिश्तों का गणित 'प' से शुरू होता है 
पिता, पति, पुत्र, परमेश्वर,
परमात्मा और पहरेदार 

इनके गणित का फल बड़ा ही
विचित्र होता है
प-प (पिता-पति) = प (पति)
प+प (पति+पत्नी) = प (पुत्र)
पxप (पतिxपुत्र) प (पहरेदार)
प%प (पति%पुत्र) प (परमेश्वर-परमात्मा)
प से शुरू और प पर ख़तम
इन्हीं रिश्तों की सीपी में बंद 
हो जाता है देह विदेह 
जीवन इन्हीं रिश्तों के इर्द-गिर्द घुमता हुआ 
ढूंढ़ता  है अपनी पसंद, परम-आत्मा और प्रेम 
निहारता है जीवन की कलई में 
रिश्तों के प्रलेख 
और चाहता है प्रकाश 
क्या इनसे भिन्न भी होता है कोई प्रलाप 
जिस पर चलकर मिले प्रगति 
और मन हो जाये प्रसन्न
इन सबसे वंचित होकर अथवा पाकर 
मिले  परम-आनंद  

शुक्रवार, 3 फ़रवरी 2012

वक्त की आँधियों में पाया है आपको
दिल से परे होकर चाहा है आपको,
चाहते हैं आपको आँखों में बसाना
पर आँखों से जुदा नहीं जाना है आपको।

गुरुवार, 2 फ़रवरी 2012

वक्त की आँधियों में पाया है आपको
दिल से परे होकर चाहो आपको,
चाहते हैं आपको आँखों में बसाना
पर आँसुओं से अलग नहीं जाना है आपको।

रविवार, 15 जनवरी 2012

Kahaan ho tum?

    कहाँ हो तुम ?

कहाँ हो तुम?

जड़ में या चेतन में
पतझड़ या विरानों में 
जल में या हवाओं में
घर में या राहों में
शून्य में या साँसों में

नवजात शिशु की मुस्कानों में
गूंगे की भावनाओं में
बहरे की आंकन में
सबल की प्रगति में
या निर्बल के विश्वासों में

महसूस किया हर ओर
नज़र आते हो चारों ओर
मगर मृगमरीचिका बन
बहलाते हो या
बसते हो मेरी आहों में

कहाँ हो तुम ?

शुक्रवार, 25 नवंबर 2011

Vikshipt

             विक्षिप्त 

लाल रंग
प्यार का प्रतीक माना जाता है।
मैं भी दीवानी थी
   लाल रंग की
      बचपन से ही
बढ़ती उम्र के साथ-साथ
लाल रंग में होती गई लाल
पर..
लोगों के डर से कभी
   अपना न पाई
      रंग लाल
क्योंकि लोग कहेंगे
लड़की बिगड़ गई है।

फिर तुम...
मेरे जीवन में आए
मेरी मांग में सजाए
सुनहरा लाल
सजा दिया मेरा तन मन
समय हो गया नारंगी लाल
लजा गई मैं होकर
शूर्ख लाल

जब तुमने मुझे प्यार के
लाल रंग में रंग दिया था
तब जीवन में दिखने लगा था
हर रंग सूवर्ण लाल
तब सफेद रंग शांत
   होते हुए भी
      लगता था कड़वा
क्योंकि मैं थी टहाटह लाल

लेकिन...
आज सफेद रंग में भी अशांत हूँ
मन ढूँढ़ता है तुम्हारी ही लालिमा
यत्र-तत्र-अन्यत्र, और फिर....
निराश हो लौट आता है अपने
बेरंग घोसले में

याद है.. जब तुमने मेरी गोदी में
डाला था हमारा लाल
तब हमारा जीवन हो गया था
खुशनुमा लाल
उसकी हँसी किलकारी से हुआ था
आंगन प्यारा लाल
और तुम...

और तुम...
उस लाल आंगन, लाल जीवन
और हमें तथा हमारे प्यारे लाल को
न जाने किसके सहारे छोड़ गए
कभी न वापस आने के लिए

तू ही बता... कि तेरी याद में मैं
कैसे भरूँ रंग लाल
जीवन का सूनापन मिटता ही नहीं
मिट जाती है दुनियाँ

एक रात...
दुनियाँ से छिपकर
तुम्हारी याद में मैंने कभी
पहन ली थी लाल साड़ी,
लाल चूड़ी और लाल बिन्दी के
साथ-साथ लाल सिन्दूर भी
मैं पूरी तरह से तुम्हारी लालिमा में
खो गई थी उस रात
तुम्हारा प्यार, दुलार, स्पर्श और नोंक-झोंक
के लाल साये में लिपट गई थी उस रात
किंतु...
साथ ही याद आया तुम्हारे जाने के बाद
मेरी लाल भावनाओं की चूड़ियों का
बेरहमी से तोड़ दिया जाना
मेरे सुनहरे लाल सिन्दूर का
मेरी मांग के साथ-साथ
मेरे जीवन से भी धो डालना
मुझे मेरे लाल जोड़े से
अनावृत कर देना
..............
..............
मैं तार-तार होती गई
घाट पर नहाते हुए उन दस दिनों में
जब मेरे लाल जोड़े के साथ-साथ
मेरे बदन से हर तार उतारकर
नहलाया था गाँव की औरतों ने
न लाज, न हया, न ही ईज़्जत बची
................
................

क्या तुम्हारे जाने के साथ ही मेरी
ईज़्जत भी चली गई ?
क्या तुम्हारे जाने के साथ-साथ
मेरा जीवन भी ख़त्म हो गया ?
बोलो न...

यही सोच रोती-तड़पती रही
रात भर
उमड़ती- घुमड़ती रही और
ढूँढ़ती रही ओर-छोर ज़िन्दगी की
और...
न जाने कब..
सूरज सिर चढ़ आया
और मैं...
क्रूर समाज के हवाले कर दी गई
लोगों ने मुझे कुलटा, कूलच्छिनी, बदचलन
और न जाने क्या-क्या कहा
फिर मुझे सभ्य समाज ने
बहिष्कृत कर देना चाहा

अब तुम्हीं बताओ...
क्या तुम्हारे जाने से
इच्छाएँ भी मर जाती हैं
या मर जाता है मान-सम्मान
या मनुष्य की प्राकृतिक चेतनाएँ ?

तुम्हारा स्पर्श नहीं रहा, पर
सिंहरन अभी भी सिंहरती हैं
तुम्हारा संसर्ग नहीं रहा, पर
स्पन्दन अभी भी जीवित हैं
तुम्हारा साथ छूट गया, पर
मन के व्याकुल सागर में
लहरें अभी भी मचलती हैं

अब तुम्हीं बताओ... कैसे रोकूँ
इन स्पन्दनों, सिंहरनों और
आलोड़ित मचलनों को ?
बोलो न..
अगर मैं छोड़ गई होती तुम्हें, तो
क्या तुम अपने मन पर अंकुश
लगा पाते ?
या फिर मेरे रीते आहट का
जीवन भर इंतज़ार करते ?
बोलो न...
पत्नी के मरने से पति की इच्छा, आकांक्षा
जीजिविषा सब जीवित रहती है
फिर पति के गुजरने से पत्नी
जीते-जी क्यों मर जाती है ?

क्यों नहीं उबर पाती मैं
तुम्हारी वेदना से, या फिर
क्यों नहीं चाहता समाज
कि मैं
तुम्हारा ग़म भूलूँ ?
क्यों नहीं चाहती दुनियाँ
कि मैं इस ग़मगीन रंग से बाहर निकलूँ ?

मैं भी औरों की तरह जीना चाहती हूँ
खुश रहना चाहती हूँ, एक अच्छी
जिम्मेदार पत्नी की तरह
घर सम्भालना चाहती हूँ
फिर क्यों होती है हरदम रोकटोक
क्यों डालते हैं लोग मुझपर कूदृष्टि
क्यों है जीवन में घनघोर वृष्टि
क्यों देखते हैं लोग बगूले की नज़र से
क्यों पास आते हैं लोग  भूखे भेड़िये से
हमारे बेरंग जीवन में पुन:
लाल रंग भरने के बहाने
क्यों छीन लेना चाहते हैं हमारी
जीजिविषा हमारे जीवन से ?

अब तुम्ही बताओ...
कैसे जीऊँ मैं
क्या सति-प्रथा समाप्त होने के बाद भी
सति करने की प्रथा इस रूप में जीवित नहीं
क्या चिता पर जलाने के बजाय
रोज तिल-तिल कर जलाने की प्रथा
अब भी प्रचलित नहीं ?
कैसे बताऊँ तुझे... मैं हर रोज जलकर
हो गई हूँ काली लाल
दुखियारी लाल

दुनियाँ... अब मुझे पागल कहती है
पर मुझे पता है,
मैं पागल नहीं....
      'विक्षिप्त' हूँ
अब सभी रंग गड्डमड्ड हो चूके हैं
नहीं बचा है जीवन में कोई
रंग लाल।