शनिवार, 25 अगस्त 2018
Setu ....................... सेतु: कविताएँ: रेनू यादव
Setu ....................... सेतु: कविताएँ: रेनू यादव: - रेनू यादव डॉ. रेनू यादव खामोशी सदियों से खामोश खामोशियों के बीच कहीं न कहीं छुपाने की कोशिश है इच्छाएँ अनिच्छाएँ आँसू, दर्द...
शनिवार, 7 जुलाई 2018
असहमति
पिट्सबर्ग अमेरिका से निकलने वाली वेब पत्रिका 'सेतु' में प्रकाशित...
लिंक - http://www.setumag.com/2018/06/Renu-Yadav-Hindi-Poetry.html
लिंक - http://www.setumag.com/2018/06/Renu-Yadav-Hindi-Poetry.html
असहमति
असहमति
जरूरी
है तुम्हारे होने के लिए
जो
साबित करता है तुम्हारा होना...
जैसे
धरती का सीना चीर कर निकलते है
बीज
से कसमसाते अंकूर
जैसे
शांत मौसम को
झकझोर
देती है आँधी
जैसे
तिलमिलाती धूप को
शांत
करते हैं बारिश
जैसे
चमकते चाँद को अचानक से
ढंक
लेते हैं बादल
जैसे
अटल पहाड़ों में भी
रास्ता
ढूँढ़ लेती हैं नदियाँ
वैसे
ही तुम्हारी असहमति
प्रमाण
है
तुम्हारे
जीवित संभावनाओं संवेदनाओं का
और
तुम्हारी सक्रियता का ।
******
- रेनू यादव
खामोशी
पिट्सबर्ग अमेरिका से निकलने वाली वेब पत्रिका 'सेतु' में प्रकाशित...
लिंक - http://www.setumag.com/2018/06/Renu-Yadav-Hindi-Poetry.html
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खामोशी
सदियों
से खामोश
खामोशियों
के
बीच कहीं न कहीं
छुपाने
की कोशिश है
इच्छाएँ
अनिच्छाएँ
आँसू,
दर्द
और
खुशियाँ
क्योंकि
जानती हूँ
तुम
इन्हें
नहीं
समझ पाओगे
मेरे
काँपते होंठ
तुम्हें
गुलाब की
पखूँडी
नज़र आती है
प्यासी
नज़रों में
दिखाई
देता है समन्दर
मेरे
चेहरे की झुर्रियों
में
नज़र आता है
चाँद
पर दाग
और
मेरी पूरी देह
कोई
तिलिस्म
‘तिरिया चरितर’
!
पर
नहीं नज़र आता
मेरे
मन के कोने में
तड़पते
गीत
और
जख़्म
गुलाब
की पँखुडियों का
लहुलुहान
होकर
लाल
बन जाना
समन्दर
में घुँटती
साँसें
झुर्रियों
के बीच
छिपे
सौन्दर्य का मुकाबला
और
देह से
पूरी
की पूरी
अस्तित्व
में आने की इच्छा ।
इच्छाएँ...
आँधियों
के बीत जाने पर
गहराती
खामोशी
मुस्कराहट
की
उर्वरता
ओढ़े
खामोश
जीवन में
बिन
कहे समझ लेने
की
चाह ।
- रेनू यादव
शुक्रवार, 4 मई 2018
'Naqqashidar Cabinet' Mein Chitrit Bhartiya Avam Amerikan Parivesh-Bodh
'शोध-दृष्टि - सुधा ओम ढींगरा का साहित्य' (संपा. बलबीर सिंह एवं प्रकाश चन्द बैरवा) पुस्तक में प्रकाशित
‘नक़्क़ाशीदार केबिनेट’ में चित्रित भारतीय एवं
अमेरिकन परिवेश-बोध
प्रवासी साहित्यकारों
(सुषम वेदी, तेजेन्द्र शर्मा, सुदर्शन प्रियदर्शिनी, जक़िया जुबैरी, पूर्णिमा
बर्मन, अर्चना पेन्यूली, दिव्या माथूर, डॉ. पुष्पिता आदि) में सशक्त हस्ताक्षर डॉ.
सुधा ओम ढींगरा द्वारा सृजित उपन्यास ‘नक़्काशीदार केबिनेट’ अमेरिका में घटित हो रहे ‘हरिकेन’ एवं ‘टारनेडो’ (प्रभंजन एवं
चक्रवात) की त्रासदी के साथ-साथ ‘फ्लैश बैक’ एवं ‘डायरी शैली’ में लिखा
गया है । यह प्रभंजन एवं चक्रवात जनजीवन के पीड़ा, संत्रास एवं त्रासदी की गाथा
है, जो अलग-अलग कहानियों को एकसूत्र में पिरोते हुए अमेरिकन परिवेश में जी रहे
भारतीय हृदय की स्मृत्तियों में रह-रहकर झंझावात ला देता है । इस संदर्भ में यह कहना
गलत न होगा कि इस उपन्यास में परिवेश-बोध मुख्य है और कथा गौण अथवा परिवेश एक ऐसा
माध्यम है जो भारतीय एवं अमेरिकन कथाओं को खुद में आत्मसात कर लेता है । साथ ही
लोगों के मन में उत्पन्न उन रूढ़िवादी मानसिकता एवं अवधारणाओं (विदेशों में तलाक
की संख्या अधिक है, प्रेम में भी प्रोफेशनल होते हैं, बच्चों की परवरिश पर ध्यान
नहीं दिया जाता अथवा बच्चे संस्कारी नहीं होते, सेक्स के लिए रिश्तों का बंधन नहीं
होता, खंडित परिवार, संवेदनहीन समाज आदि) को तोड़ता हुआ दृष्टिगत होता है । देखा
जाए तो “हर कार्य को ‘सरकार का काम है’, नहीं समझा जाता । लोग स्वयं भी अपने लिए खड़े होते हैं” (ढ़ींगरा, सुधा ओम.
नक़्काशीदार कैबिनेट. पृ. 8), “साम्यवाद तो इस देश में हैं” (ढ़ींगरा,
सुधा ओम. नक़्काशीदार कैबिनेट. पृ. 10), “इस देश में समय भागता है, बीतता नहीं” (ढ़ींगरा,
सुधा ओम. नक़्काशीदार कैबिनेट. पृ. 10), “यहाँ हाई स्कूल तक बोर्डिंग या हॉस्टल की अवधारणा नहीं हैं” (ढ़ींगरा, सुधा ओम.
नक़्काशीदार कैबिनेट. पृ. 11), “किसी नुक्कड़, किसी चौराहे पर खाली ठल्ले बैठे लोग ताश खेलते नज़र नहीं
आते । एवई बेमक़सद कोई घूमता नज़र नहीं आता” (ढ़ींगरा,
सुधा ओम. नक़्काशीदार कैबिनेट. पृ. 10), यहाँ पद,
प्रतिभा को देखकर, काम करने के लिए दिया जाता है, रौब जमाने के लिए नहीं (ढ़ींगरा,
सुधा ओम. नक़्काशीदार कैबिनेट. पृ. 65) आदि वाक्य
भारतीय एवं अमेरिकन परिवेश की तुलना के साथ-साथ हमारी जड़ मानसिकता पर गहरा
व्यंग्य भी है ।
इस उपन्यास में दो प्रमुख पात्र
सम्पदा और सोनल की आपस में गुंफित कथाएँ एक दूसरे की पूरक हैं । चक्रवात (हरिकेन
एवं टारनेडो) के बीच फंसी सम्पदा के घर में रोजवुड की बनी नक़्काशीदार केबिनेट (जो
कि सोनल ने दिया था) से प्राप्त हुई सोनल की डायरी के माध्यम से कहानी आगे बढ़ती
है और यह कहानी मात्र एक कहानी न होकर सोनल के जीवन में आया चक्रवात है जो भारत से
होकर अमेरिका की ओर गुजरता है । पंजाब में जमीदार मनचंदा परिवार (जो कि सोनल का
खानदान था) की सम्पत्ति के लिए सोनल के ऐयाश चाचा मंगल एवं उसकी पत्नी मंगला के
मायके वालों के द्वारा लगातार रचे जा रहे षड़यंत्र, षड़यंत्रों की खबर गाँव में
फैलने पर खुद को बचाने के लिए तथा अपने ही घर वालों से बदला लेने के लिए सोनल की
बहन मीनल से बलात्कार एवं उसकी हत्या और फिर उग्रवादियों के साथ मंगला का मिल
जाना, एक-एक करके सोनल के सहायक पम्मी एवं परिवार (सोनल के दादा, पिता, दादी) की
हत्या, सोनल और उसकी माँ का घर छोड़ने पर मजबूर होना और घर छोड़ने के पश्चात् सोनल
की संपत्ति पर नाना-मामा की नज़र रहना तथा संपत्ति हासिल करने के लिए एक षड़यंत्र
के तहत अमेरिका में रहने वाले एक फर्जी डॉक्टर बलदेव के साथ सोनल का विवाह कर
देना, अमेरिका में विवाह की सच्चाई सोनल के सामने आना और उसका ससुराल वालों के जाल
में फँसने से बचने के लिए वहाँ से भागकर जान बचाना, किसी तरह भागकर डनीस और रॉबर्ट
के घर में शरण लेना, उसके बाद संस्था में समाज-सेवा करना और वहीं सम्पदा से
मुलाकात और अपने दोषियों को सज़ा दिलवाने का प्रण लेना तथा अंततः षड़यंत्रकारियों
को सज़ा दिलवाना किसी चक्रवात से कम नहीं ।
सोनल की कहानी अकेले नहीं चलती बल्कि छोटी-छोटी
और भी कई कहानियों से जुड़ती चली जाती है अथवा सोनल के माध्यम से कहलवा ली जाती
हैं । सन् 1801 से 1839 तक के बीच महाराजा रणजीत सिंह के तोशख़ाने की कहानी, अफ़गानिस्तान
के सुजात शाह दुर्रानी द्वारा महाराजा रणजीत सिंह को कोहिनूर हीरा प्राप्त होना,
महारानी विक्टोरिया को कोहिनूर सौंपा जाना, लाहौर पर अंग्रेजों की फतह, 1849 में
अंग्रेज-सिख युद्ध, अफ़गान हमलावरों द्वारा अमृतसर के स्वर्ण मंदिर को नष्ट किया
जाना और महाराजा रणजीत सिंह द्वारा दोबारा सोने की परत चढ़वाना, गुरू तेगबहादूर की
हत्या, राजा खड़क सिंह के जेल जाने के पश्चात् सोनल के पुरखों द्वारा तोशख़ाने से
धन का चुराया जाना और उस धन के लिए पीढ़ी-दर-पीढ़ी कभी डाकुओं द्वारा तो कभी
रिश्तेदारों तथा कभी अपनों के द्वारा खुन खराबा होना, पड़दादी का अधोवस्त्र में धन
छुपाकर घर छोड़ना, हवेली में तहखाना बनवाना और तहखाने में छिपे धन को गुप्त रखना,
सुनारों को गाँव में बसाना और उनसे गहने बनवाना, पंजाब प्रांत में खलिस्तानियों का
उग्र रूप धारण करना, कवि एवं विचारक अवतार सिंह संधु ‘पाश’ की हत्या, 1981 में पंजाब केसरी अखबार समूह के
संपादक लाला जगतनारायण की हत्या, भगत सिंह का जिक्र, ऑपरेशन ब्लू स्टार, इंदिरा
गाँधी की ह्त्या के पश्चात् खूनी खेल, लेनिनवाद, कामरेड, मार्क्सवाद, नक्सलवाद आदि
पर चर्चा करना तथा अचानक से युवाओं में पंजाब के परिस्थितियों को बदलने का उहा-पोह,
मंगला की बड़ी बेटी का उग्रवादियों के साथ भाग जाना और छोटी बेटी के साथ बलात्कार
एवं हत्या, पम्मी की हत्या आदि सामाजिक, राजनैतिक एवं ऐतिहासिक घटनाओं की कड़ियाँ
कहानी को न केवल रोचक बनाते हैं बल्कि कोरी कल्पना से अलग हटकर जीवंतता भी प्रदान
करते हैं ।
इन सबमें सुक्खी यानी सुखवंत का प्रेम
सबसे अधिक सराहनीय कहा जा सकता है कि वह कदम-कदम पर सोनल का साथ देने के लिए तत्पर
रहता है । शुरूआती दौर में सोनल सुक्खी का प्यार समझते हुए भी उसे स्वीकार नहीं कर
पाती परंतु जब तक उसे अपने प्रेम का एहसास होता है तब तक वह अपने नाना के
षड़यंत्रों में फँस चुकी होती है और डॉ. बलदेव सिंह के साथ विवाह करके अमेरिका चली
जाती है । अमेरिका में अपने ससुराल वालों की सच्चाई सामने आने पर एयरपोर्ट पर
सुक्खी द्वारा दी गई हिदायत और डॉलर ही काम आते हैं । बाद में सुक्खी नौकरी छ़ोडकर
अमेरिका आ जाता है और सोनल की रक्षा करता है और अंत में यह प्रेम परिणय में बदल
जाता है ।
इस उपन्यास की खास विशेषता है कि पंजाब
में नशे के गिरफ्त में युवाओं का भविष्य तथा रोजी-रोटी के लिए हर तीसरे चौथे घर से
व्यक्तियों का दुबई, कैनेडा, खाड़ी के देशों में जाना आदि का वर्णन वहाँ की स्थिति
को दर्शाता है तथा साथ ही सोनल जैसी अनेक भोली-भाली मासूम लड़की को फँसाकर उन्हें
देह-व्यापार और नशे के धंधें में उतार देना गंभीर समस्या को उजागर करता है । “बलदेव का गिरोह पंजाब के गाँवों से भोली-भाली लड़कियों से शादी करके यहाँ
लाता । अधिकतर लड़कियों को बाहरी दुनियाँ के बारे में ज़्यादा पता नहीं होता था ।
देह व्यापार से अधिक लोग उनसे नशे का धंधा करवाते । उनके द्वारा एक देश से दूसरे
देश में नशे पहुचाएँ जाते । नशे उनके अंगों में भर दिए जाते थे । अगर किसी देश में
कोई लड़की पकड़ी जाती । उस देश का कानून उसे सज़ा देता । वह उम्र भर वहाँ की जेलों
में पड़ी रहती । ज़िंदा होकर भी मुर्दों सी ज़िन्दगी जीती” ।
(ढ़ींगरा, सुधा ओम. नक़्काशीदार
कैबिनेट. पृ. 107)
बलदेव गिरफ्तार होने के बाद स्वीकार
करता है कि सोनल उसकी भारी भूल थी अन्यथा वह पकड़ा नहीं जाता । सोनल ने कभी हार
नहीं माना बल्कि उसने बलदेव को पकड़वाने की ठान ली थी और निर्णय लिया कि उसके साथ
जैसा हुआ आगे से किसी अन्य लड़की के साथ ऐसा न हो । सुशील सिद्धार्थ के अनुसार, “यह उपन्यास पढ़ते हुए लगता है कि नियती की स्वीकृत व्याख्या को सुधा ने
सोनल के माध्यम से चुनौती दी है । उन्होंने बताया है कि साहस, विवेक, सत्य बना रहे
तो नियति की यति और गतिमति भी बदलती है” । (सुबीर, पंकज (संपा.). विमर्श – नक़्काशीदार केबिनेट. पृ. 19 (बाहरी भीतरी
चक्रवात की रूपक गाथा – सुशील सिद्धार्थ))
एक तरफ पंजाब की समस्याएँ तो दूसरी तरफ
अमेरिकन संस्कृति । दोनों संस्कृतियों के टकराव को लेखिका बखूबी उकेरती हैं ।
सम्पदा न केवल उपन्यास की एक पात्र है बल्कि स्वयं लेखिका का प्रतिनिधित्व करती
दृष्टिगत होती है एक डॉक्टर, एक सामाजिक कार्यकर्ता के रूप में। सम्पदा खुशहाल
जीवन व्यतीत करते हुए भी कहीं न कहीं अकेलेपन की शिकार है । सार्थक का कम बोलना, पुरू
और पारूल का दूर जाना आदि उसे अकेलेपन से भर देता है । लेकिन सम्पदा इन सबमें जीना
सीख गई है । सुधा जी की नायिकाएँ प्रायः सशक्त और आत्मविश्वास से भरी होती हैं ।
वे कभी हार मानना नहीं जानतीं । सम्पदा भयंकर प्रभंजन और चक्रवात में भी तटस्थ
रहती है तथा चक्रवात के पूरे समय में सोनल के जीवन में आये चक्रवातों को डायरी में
पढ़ती है किंतु अपने मन में उठ रहे तुफान (एम्प्टी नेस्टर्ज़) को बड़ी सहजता से
झेल जाती है । वह संवेदनशील होते हुए भी भावुक नहीं होती, चोरी होने के पश्चात् भी
चिखती-चिल्लाती नहीं, दुखी है पर दिखाती नहीं, स्मृति है पर विस्मृति नहीं... जो कि उसके अनुभवी होने और परिपक्वतापन को
दर्शाता है ।
यह उपन्यास न केवल स्त्री-संघर्ष की
दास्ताँ है बल्कि सोनल की कहानी के माध्यम से पंजाब में हो रहे उन तमाम मासूम
लड़कियों के साथ अन्याय, छल-कपट, धोखा, देह - व्यापार, नशे का धंधे में फँसाये
जाने आदि की गाथा है, जिससे समाज को सदैव सतर्क और जागरूक रहने की जरूरत है । यह न
सिर्फ सोनल की यात्रा है बल्कि दो देशों की संस्कृतियों के टकराहट की खनक है,
जिसमें विश्वास-अविश्वास, बोध-अबोध, ज्ञान-अज्ञान,
जिम्मेदारियों-ग़ैर-जिम्मेदारियों आदि का एक साथ झटके लगते हैं । यह न केवल
परंपरा, आधुनिकता, ग्रामीण, शहरीकरण, भूमंडलीकरण, बाज़ारीकरण की परिस्थितियों को
बयान करता है बल्कि इन सबके अंतःकरण में छिपे घात-प्रतिघातों को भी व्यक्त करता है
। रोहिणी अग्रवाल के शब्दों में कहें तो “यह
उपन्यास निःसंकोच प्रियदर्शन के बेस्टसेलर उपन्यास ‘जिन्दगी लाइव’ की श्रेणी में रखा जा सकता है जो एक ओर पठनीयता के संस्कार को पुनर्जीवित
करती है तो दूसरी ओर अपने समय की विडम्बनाओं को नज़दीक से देखने की निर्भीक नज़र
भी जुटाता है” । (सुबीर,
पंकज (संपा.). विमर्श – नक़्काशीदार केबिनेट. पृ. 25 (‘नक़्क़ाशीदार
केविनेट’ : स्मृति और सृजनेच्छा के बीच – रोहिणी अग्रवाल))
इस
उपन्यास में लेखिका ने लेखकीय कर्तव्य निभाते हुए विकसित देशों के प्रति “जब कोई समस्या का समाधान नहीं निकलता तो पाश्चात्य की देन है कहकर पल्ला
झाड़ लेते हैं” (ढ़ींगरा,
सुधा ओम. नक़्काशीदार कैबिनेट. पृ. 103)
जैसे वाक्यों एवं कथन के माध्यम से विकासशील देशों का नज़रिया भी साफ किया है तथा
दोनों ही देशों की सांस्कृतिक एवं परिवेशगत तुलना करके अनेक भ्रमपूर्ण अवधारणाओं
को दूर करने का प्रयास किया है । अनजान जगह पर डनीस एवं रॉबर्ट जैसे बुजुर्गों
द्वारा सोनल की सहायता, सम्पदा एवं सार्थक द्वारा प्रत्येक मुश्किल क्षणों में
सोनल के साथ होना यह सिद्ध करता है तथा स्वयं लेखिका भी कहती हैं “अमेरिकन में सेवा भाव कूट-कूट कर भरा होता है” । (ढ़ींगरा,
सुधा ओम. नक़्काशीदार कैबिनेट. पृ. 67) अमेरिका
में लोगों को उनके नाम से पुकारना चाहे वे कितनाहूँ वृद्ध हों अथवा किसी उच्च पद
पर आसीन क्यों न हों, जब तक हाथ पाँव काम करे तब तक बच्चों पर निर्भर न रहना,
नौकरों से काम करवाने के बजाय अपना काम स्वयं करना, पुलीस वालों का अत्यंत
जिम्मेदारी के साथ काम करना आदि अमेरिकी परिवेश की विशेषताएँ प्रत्येक स्थान पर
दृष्टिगत होती हैं । दूसरी ओर पंजाब प्रांत में जमीदारी प्रथा, खेत, नहाने और
पेशाब के लिए सिमेंट अथवा ईंट से घर के बाहर बना घेरा, शराब के अड्डे, गाँव वालों
का एकजूट होकर साथ देना, पम्मी और सुक्खी जैसे भले लोगों का होना, मीडिया का
निष्पक्ष होकर न्याय के लिए तहलका मचा देना, मीडिया के द्वारा पुलीस प्रशासन की
धज्जियाँ उड़ाना, मीनल को न्याय दिलवाना, अफवाहों का अफसाना बन जाना आदि पंजाब के
गाँवों को जीवंत कर देता है ।
जहाँ
एक ओर अमेरिकी परिवेश की अच्छाई दर्शायी गयी है तो वहीं दूसरी ओर बुराईयाँ भी
दृष्टिगत होती हैं । ‘हाइजेन’ और ‘टारनेडो’ के बीच सार्थक
और सम्पदा के घर चोरी तथा समाचार के द्वारा ब्रुकलिन में ही 99600 चोरियों की ख़बर
आश्चर्य से भर देता है कि इस विपदा में कैसे कोई चोरी करने की भी सोच सकता है
! भारत के पंजाब प्रांत में 73.5 प्रतिशत युवा पीढ़ी का नशेड़ी
होना, सम्पत्ति के लिए अपनों का खून कर देना, गाँवों में आधा जीवन लड़ाई-झगड़े में
और आधा जीवन कोर्ट कचहरी में बीत जाना, विवाह के नाम पर लड़कियों का खरीद-फरोख्त
होना आदि भारत की गंभीर समस्याएँ है ।
जीवन
उतना ही नहीं होता जितना हम समझते हैं, बल्कि उससे परे भी बहुत कुछ होता है ।
नक़्काशीदार केबिनेट उस ‘परे’ शब्द को अभिव्यक्त करता है । अच्छाई-बुराई प्रत्येक देश में है । ‘दूर के ढ़ोल’ को न तो पूरी तरह से सुहावना समझना
चाहिए और न ही बेसुरा । सरल, सहज और सूक्ष्म तरिके से संदर्भ और कथ्य को गुंफित
करने वाला यह उपन्यास परिवेशगत दृष्टि से सशक्त एवं बेहतरीन है ।
.......................................................................................................................................
संदर्भ-ग्रंथ
– सुबीर, पंकज (संपा.). विमर्श- नक़्क़ाशीदार केबिनेट (बाहरी-भीतरी चक्रवात की
रूपक गाथा). सं. प्रथम, 2018. शिवना प्रकाशन, सीहोर.
- डॉ. रेनू यादव
- डॉ. रेनू यादव
शनिवार, 28 अप्रैल 2018
स्त्री-देह को ‘आइटम’ के रूप में परोसते आइटम सॉन्ग्स
'साहित्य और सिनेमा' पुस्तक में प्रकाशित
स्त्री-देह
को ‘आइटम’ के रूप में परोसते आइटम सॉन्ग्स
डॉ. रेनू यादव
एक समय था जब फिल्मों में सूमधुर
गीत-संगीतों के साथ-साथ कैबरे डांस का तड़का हुआ करता था । सेक्सी कैबरे डांसर
अपनी भाव-भंगिमा वेश-भूषा के माध्यम से नायक-खलनायकों को रिझाते हुए फिल्म में दिए
हुए किरदारों के साथ अपना मकसद पूरा करने में कामयाब हो जाती थीं । उस समय सेक्सी
से तात्पर्य था कैबरे डांसर । लेकिन अब फिल्मों में कोई भी नायिका सेक्सी हो सकती
है । यह आवश्यक नहीं कि कैबरे डांसर की तरह कोई अलग से आइटम गर्ल हो बल्कि फिल्मों
में बदलते मानकों के साथ-साथ शालीन अदाकारा भी आइटम सॉन्ग पर डान्स करने से नहीं
हिचकतीं । गगन गिल के अनुसार “स्त्री देह स्वयं एक भाव है” (पचौरी, सुधीश. स्त्री-देह के विमर्श. पृ. 44) और
यह कहना अनुचित न होगा कि आइटम गर्ल्स देहष्टि के आग पर उत्तेजना के दबे
मनोविकारों को सुलगाने में पूरी तरह कामयाब हो रही हैं । इसीलिए तो सिर्फ एक डान्स
के कारण आइटम गर्ल मुख्य नायिका से अधिक पापुलर और फिल्म उद्योग को अधिक आर्थिक
मुनाफा पहुँचाने वाली हो जाती है । उदाहरण के लिए ‘चिकनी चमेली’ आइटम सॉन्ग का सिर्फ प्रोमोज दिखाकर डायरेक्टर ने अग्निपथ (2012) फिल्म
को 100 करोड़ का आंकडा पार करवा लिया था ।
जिस गीत का फिल्म से कुछ लेना-देना
नहीं होता तथा फिल्म में सिर्फ एक मोड़ देने के लिए अथवा ब्रेक के लिए मौज-मस्ती
के रूप में प्रस्तुत किया जाता है, उसे ‘आइटम सॉन्ग’ कहा जाता है । यह सॉन्ग स्त्री को आइटम गर्ल्स के रूप नई छवि प्रदान करता
है । ‘आइटम’ से तात्पर्य है ‘वस्तु’ और ‘आइटम गर्ल’ एक ‘दैहिक वस्तु’ के रूप में
ही संप्रेषित होती है । यह पत्र-पत्रिकाओं, विज्ञापनों, फैशन जगत में दिखने वाली
अथवा टी.वी. सीरियल तथा फिल्म जगत में काम करने वाली नायिकाओं-खलनायिकाओं से अलग
छवि है । फिल्म की कहानी में इनकी भागीदारी न होते हुए भी ये फिल्म उद्योग को बड़ा
मुनाफा पहुँचाने में कामयाब होती हैं । इसलिए इनकी फीस भी फिल्म की नायिका के
बराबर अथवा उनसे अधिक होती है । ‘मुन्नी बदनाम हुई’ के लिए मलाइका अरोड़ा खान ने 2 करोड़, ‘बेबी डॉल’ के लिए सनी लियोनी ने 3 करोड़ और ‘फेबीकोल से’ के लिए करीना कपूर ने 5 करोड़ रूपये मेहनताना लिया
था । (जैन,
उज्वल. फीस सुनकर रह जायेंगे आप दंग. http://punjabkesari.com/entertainment/these-items-will-be-stunned-by-hearing-the-crores-of-girls-fees/
10 जुलाई, 2017)
ये सभी ‘आइटम गर्ल्स’ उत्तर-आधुनिक नारीवाद की ‘स्वतंत्रता, समानता और सद्भावना’ के नारे को मात दे
रही हैं । ‘पर्सनल इज पॉलिटिक्स’ के
सिद्घांत के तहत दैहिकता के दहकते अंगारे पर रातों-रात अपनी प्रसिद्धी की रोटी
सेंक रही हैं । इनकी छवि साहित्य और फिल्मी
स्त्रियों पद्मिनी, यशोधरा, पारो, चित्रा, श्रद्धा आदि से बिल्कुल भिन्न कामूक,
आक्रामक और बेधड़क हैं । उत्तर-आधुनिक नारीवाद अपनी देह पर अपना स्वतंत्र अधिकार
चाहता है किंतु ये स्त्रियाँ स्वतंत्रता के नाम पर देह की एक राजनैतिक षड़यंत्र से
निकल दूसरे षड़यंत्र के दलदल में फँस चुकी हैं... कभी अपनी इच्छाओं के नाम पर तो
कभी जीवन-शैली के नाम पर, कभी करियर के नाम पर तो कभी आर्थिक सक्रियता या
जागरूकता के नाम पर । अब कबीर की नारी को
देखकर ‘अंधा होत भुजंग’ की बात नहीं है
बल्कि नारी खुद अपने नए ‘ब्यूटी मिथ’
में दिग्भ्रमित हो ‘बॉडी डिस-प्ले’
करके गीतों के बोल और हाव-भाव के माध्यम से लोगों को अंधा करने के लिए उद्धत है । ‘कुंडी न खड़काओ राजा, सीधे अंदर आओ राजा... मुड बनाओ ताजा ताजा’ (गब्बर इज बैक, 2015) आदि ‘सेक्स
टॉक’ अथवा अब ‘सेक्स सॉन्ग’ की संज्ञा दें तो गलत न होगा, के माध्यम से ‘सॉफ्ट पोर्नोग्राफी’ परोस रही हैं । अपने समूची बदन को निचोड़ते हुए ‘नमकीन
बटर’ और ‘तंदूरी चिकन’ (‘फेबीकोल से’, दबंग – 2, 2012) बनकर मर्दों की थाली में उछल-उछल कर स्वतः ही
गिर रही हैं तथा लार टपकाते हजारों मर्द ‘चिकनी’, ‘आइटम’ ‘(टिंकू जिया’,
यमला पगला दीवाना, 2011) आदि से संबोधित कर उसे अपनी-अपनी ओर खींचने
की होड़ में हैं । और तो और आइटम गर्ल कभी ‘पऊवा चढाकर’
(‘चिकनी चमेली’, अग्निपथ,
2012) ख़ुद आयी होती हैं तो कभी ख़ुद को ‘एल्कोहल के साथ
गटकने’ (‘फेबीकोल से’, दबंग – 2,
2012) के लिए मर्दों से गुहार लगा रही होती हैं, इतना ही नहीं ‘आँखों से सेंकवाना’ उसे बिल्कुल पसन्द नहीं बल्कि ‘हाथों से मनमानी’ (‘हल्कट
जवानी’, हिरोइन, 2012) करवाने के लिए बेकरार होती हैं ।
सुधीश पचौरी के अनुसार, “स्त्री की नई छवि बनाने वालों ने
स्त्री को ‘अतिरिक्त मूल्य’ पैदा करने
वाली बनाया है । उसकी नई छवि धन उपार्जित करती है । वह समूची अर्थव्यवस्था को गति
देने वाली है । वह अब एक उद्योग है” । (पचौरी,
सुधीश. स्त्री-देह के विमर्श. पृ. 15)
जिस प्रकार सिनेमा पर समाज का प्रभाव
पड़ता है उसी प्रकार समाज पर सिनेमा का भी प्रभाव पड़ता है । सिनेमा जगत
शिक्षित-अशिक्षित, बाल-बच्चे-बूढ़े तथा युवा वर्ग यानी हर तबके को अपनी चपेट ले
लेता है, जिसमें गीत-संगीत चलते-फिरते हर समय हमारे जीवन का एक अभिन्न हिस्सा बनकर
साथ होता है । जिसमें से आइटम सॉन्ग्स (पार्टी ऑल नाइट, अभी तो पार्टी शुरू हुई
है, तम्मा-तम्मा, जुम्मा-चुम्मा) में कुछ समय के लिए ही सही, अत्यधिक प्रभावकारी
कारक होते हैं, जिससे अधिकतर लोग प्रभावित हो गुमराह होने के कगार पर भी आ जाते हैं
।
फिल्म-जगत् में इन सेक्सी बोल वाले और
तड़कते-भड़कते गानों के नाम ‘आइटम सॉन्ग’ नाम के रूप में भले ही 2010 के आसपास अधिक प्रचलित हुआ हो लेकिन इसकी
परंपरा अलग-अलग रूपों में पहले से ही चली आ रही है । 50 के दशक में आवारा (सन्
1956) फिल्म में कुक्कू मोरे पर फिल्माया गया डान्स “एक दो
तीन आजा मौसम है रंगीन” को यदि आइटम सॉन्ग (उस समय आइटम
सॉन्ग नाम नहीं था) कहा जाए तो गलत न होगा, जिसमें नायिका अपने यौवन की मादकता से
नायक को अपनी ओर खींचने की भरपुर कोशिश करती है । 70 के दशक में बिन्दू जावेरी पर फिल्माया
गया गाना “ढ़िन्चक ढ़िन्चक… कितने बीत
गए हैं दिन कितनी बीत गयी रातें दिलरूबा, सब कुछ मिला तू ना मिला” (आरोप, 1974), उसी समय 60-70 के दशक में डान्सिंग क्वीन हेलन “ये मेरा दिल यार का दीवाना, दीवाना दीवाना प्यार का परवाना” (डॉन, 1978) और “पिया तू अब तो आजा” (कारवाँ, 1971) ने अपने डान्स के माध्यम से शरीर में झनझनाहट पैदा कर देने
वाली अदाओं से हंगामा ला दिया था । 70 के दशक में जयश्री टी.
“रेशमी उजाला है, मखमली अंधेरा आज की रात ऐसा कुछ करो हो नही
हो नही सबेरा...” (शर्मिली, 1971), 70 के
दशक में जीनत अमान कुर्बानी (1980) फिल्म में “लैला मैं
लैला, ऐसी मैं लैला, हर कोई चाहे मुझसे मिलना अकेला” (जिसे
अब रईस फिल्म में सनी लियोनी पर फिल्माया गया है) ने काफी धूम मचा रखा था । “जवानी जानेमन हसीन दिलरूबा” (नमक हलाल, 1982) और “रात बाकी बात बाकी, होना है जो हो जाने दो” (नमक हलाल, 1982) में परवीन बॉबी का ग्लैमर स्पष्ट
नज़र आता है । शालीन किरदार निभाने वाली मुमताज भी इस प्रभाव से बच न सकीं, फिल्म
भाई-भाई (1970) में “आज रात है जवाँ, दिल मेरा न तोड़िये, कल
ये रात फिर कहाँ, कल की बात छोड़िये” के माध्यम से अपने
बोल्डनेस का परिचय दे ही दिया ।
साथ ही मुजरा स्टाइल में आइटम सांग कहा जाये तो अरूणा ईरानी का इंसान
(1982) फिल्म में “राजा मोरी बाली उमर, बाली उमर का रखियो खयाल” का एक
रूप दिखाई दिया, जिसके अनेक रूप बाद में भी सामने आए । चाइना गेट (1998) में
उर्मिला मातोन्डकर ने “छम्मा छम्मा ओ छम्मा छम्मा... बाजे रे
मेरी पैजनिया” के माध्यम से लोगों की नींदें उड़ा दी । पतली
कमर मटकाकर, नागीन सी बलखाकर, नैन से नैन लड़ाकर, धानी चूनर सरकाकर शिल्पा शेट्ठी
ने “दिलवालों के दिल का करार लूटने, मैं आयी हूँ यू.पी.
बिहार लूटने” (शूल, 1999) गाकर सबका दिल लूट लिया था, जिसमें
वे जवानी की सारी बहार लूटा रही होती हैं । मुजरा स्टाइल में आइटम सान्ग्स पर नए
नए प्रयोगों के साथ गोलियों की रास लीला राम-लीला (2013) फिल्म में ब्लॉउज का बटन
बंद करते हुए प्रियंका चोपड़ा के ऊपर फिल्माया गया “राम चाहे
लीला चाहे लीला चाहे राम इन दोनों के लव में दुनिया का क्या काम” (जिसे प्रियंका आधुनिक मुजरा का नाम देती हैं), एजेन्ट विनोद
(2012) फिल्म में करीना कपूर पर “दिल मेरा मुफ्त
का” फिल्माया गया है ,जिसमें हॉटनेस का पूरा खयाल रखा गया है
। बंटी और बबली (2005) फिल्म में अमिताभ और अभिषेक के साथ
ऐश्वर्या “कजरारे कजरारे , तेरे कारे कारे नैना” पर ठुमके लगाती हुई दिखाई देती हैं ।
समय के साथ साथ बोल्ड गीतों का प्रचलन
बढ़ा । खलनायक (1993) फिल्म में धक् धक् गर्ल् माधुरी दीक्षित ने अपनी ‘आह’ से मर्दों की सिसकारियाँ (Moaning) निकाल देने वाला गाना “चोली के पीछे क्या है, चुनरी
के नीचे क्या है” से धमाल मचा दिया था । जिसे इला अरूण और
अलका याज्ञनिक ने आवाज दिया था, जिसके लिए इन्हें उस साल का ‘फिल्म-फेयर अवार्ड’ भी मिला था और फिर से इन्हीं
दोनों गायिकाओं की जोड़ी अपनी ‘आह’ ‘हाय’ और ‘दईया’ की सिसकारियों भरी आवाज से फिल्म करन-अर्जून (1995) में ममता कुलकर्णी के
हॉट अवतार में राणा जी से माफी माँगती हुई नज़र आती हैं, जिसमें “गुप चुप गुप चुप ... लम्बा लम्बा घुंघट काहे को डाला रे” कहते हुए गाने के आखिरी में नायिका को मुँह काला होने से बचा लेती हैं । माधुरी
दीक्षित के थिरकते कदम पर ‘एक दो तीन’ (तेज़ाब, 1988), अमिताभ बच्चन का ‘जुम्मा चुम्मा दे दे’ (हम,
1991) माँगना, चलती ट्रेन में शाहरूख खान के साथ मलाइका अरोड़ा ख़ान
का “चल छईयाँ छईयाँ” (दिल से,1998), “देख ले आँखों में आँखें डाल” (मुन्ना भाई
एम.बी.बी.एस., 2003) में मुमैथ खान का अविस्मरणीय बोल्ड अवतार, “बाबू जी जरा धीरे चलो बिजली खड़ी यहाँ बिजली खड़ी”
(दम, 2003) याना गुप्ता का बिजली बनकर गिरना, बिपाशा बासू पर
फिल्माया गया सुलगता गाना “बीड़ी जलाइले ज़िगर से पिये” (ओमकारा, 2006), “माइया माइया गुलाबी तारे चुन” (गुरू, 2007) में
मल्लिका शेरावत के थरथराते कदम और कमर, रसपान के लिए बेकरार मलाइका अरोरा ख़ान का “होठ रसीले तेरे होठ रसीले” (वेलकम, 2007), राखी
सावंत का सर चढ़कर बोलता क्रेज “अरे ये तो बता देखता है तू क्या” (क्रेजी – 4, 2008) आदि फिल्म में विशेष उपस्थिति (spatial
appearance) की एक लम्बी परंपरा है, जो दर्शकों के दिलो-दिमाग पर
छाकर उन्हें सिनेमाघरों तक खींच लाने में कामयाब होते हैं ।
2010 से आइटम सॉन्ग्स फिल्मों में एक
आवश्यक तड़का बन गया, फिल्म को सूपर-डूपर हिट कराने में जिसकी महत्त्वपूर्ण भूमिका
होने लगी है । करोड़ों रूपये खर्च करके बने अकेले आइटम सॉन्ग में भरपुर
सेक्सुआलिटी का प्रदर्शन होता है । सन् 2010 में कैटरीना कैफ़ पर फिल्माया गया सफेद
चादर में लिपटी “शीला की जवानी” (तीसमार ख़ान, 2010) किसी के हाथ में तो नहीं आना चाहती किंतु अपनी कामूक अदाओं से सबको लुभाकर
एक सूपरहिट सॉन्ग दे जाती हैं । मलाइका अरोरा ख़ान अर्थात् मुन्नी कभी झंडूबाम
बनकर, कभी टकसाल, कभी आइटम से आम, आइटम बम, कभी अमिया से आम, सरेआम, सिनेमाहाल का
रूप धारण कर डार्लिंग के लिए बदनाम (“मुन्नी बदनाम हुई डार्लिंग
तेरे लिए”, दबंग, 2010)
होती है । 2011 में इश्क का मंजन घिसने वाले धर्मेन्द्र और बॉबी देओल
अर्थात् पिता और पुत्र “टिंकू जिया”
(यमला पगला दीवाना, 2011) गाकर एक ही लड़की के साथ रोमांस करके “कजरारे कजरारे” में अमिताभ और अभिषेक की याद दिलाते
हुए एक ऐसी संस्कृति को दर्शाते हैं जो कि भारतीय संस्कृति में वर्जनीय है । सन्
2012 में मलाइका अरोरा सलीम की गली छोड़कर “अनारकली डिस्को
चली” (हाउसफुल 2, 2012) तो कैटरीना कैफ़ “चिकनी चमेली छुपके अकेली पउवा चढ़ा के आयी”
(अग्निपथ, 2012), करीना कपूर ऊँह आह की आवाज से अँगडाईयाँ लेते हुए मिस कॉल से भी पटने
के लिए तैयार हैं - “मेरे फोटो को सीने से यार चिपका ले सईयाँ
फेबिकोल से” (दबंग – 2, 2012), छोकरों के जवानी की प्यास को
और बढ़ाती हुई गौहर ख़ान “हुआ छोकरा जवाँ रे” (इशकजादे, 2012), “हल्कट जवानी” (हिरोइन, 2012) से सबकी नीयत
हलाल करने वाली करीना कपूर स्वयं को चखना बनाकर चख लेने की ख्वाहिश रखती हैं । सन्
2013 में सनी लियोनी एक दिन के लिए, एक पल के लिए और सिर्फ कल के लिए दुल्हन बनना
चाहती हैं, जिस पर “लैला तेरी ले लेगी, तू लिखकर ले ले” (शूटआऊट एट बडाला, 2013) का स्वांग
भरा जाता है तो प्रियंका चोपड़ा पिंकी बन “पैसा फेंक तमाशा
देख, नाचेगी पिंकी फुल टू लेट” (जंजीर, 2013) में वह न तो
मुम्बई की है न दिल्लीवालों की, वह सिर्फ पैसों वालों की हैं जबकि यह ध्यान देने
योग्य बात है कि वे एक स्वावलम्बी महिला होते हुए इस तरह के गाने पर अभिनय कर रही
हैं । सन् 2015 में सम्भावना सेठ पर फिल्माए गए गाने में गाती हैं “मैं सोडा तुफानी, कैरम की रानी, तीखी कचौरी मुँह में आ जाए पानी” (बेलकम बैक, 2015), मलाइका अरोरा ख़ान पर आकर सारे फैशन ही खत्म हो जाते
हैं “फैशन ख़तम ख़तम मुझपे” (डॉली की
डोली, 2015) तो करीना कपूर की जवानी बीमा करवाकर संदूक में रखने लायक चीज नहीं है इसलिए
यूज करने के लिए आवाहन करते हुए कहती हैं - “मेरा नाम मैरी
है” (ब्रदर्स, 2015) तो सनी लियोनी खुद को ‘अव्वल नम्बर चीज’ मानती हुए “पानी वाला डांस” (कुछ
कुछ लोचा है, 2015) और चित्रांगदा सिंह पर फिल्माए गए गाने
के बोल “कुंडी मत सरकाओं राजा” (गब्बर
इज बैक, 2015) ने अश्लीलता की सारी हदें पार कर दी है । सन् 2016 में रिचा चड्ढा
का कैबरे डान्स “मैं तो तेरे वास्ते हुई पानी-पानी, सरेआम ही
लुट गई ये जवानी” (कैबरे, 2016) सेक्सिएस्ट सॉन्ग में रखा जा
सकता है तो सन् 2017 में ‘हिकी’ को
सार्वजनिक करती “सईयाँ ने मोड़ी मेरी बहियाँ वो दे गया हमका
हिकी हिकी (भूमी, 2017) सनी लियोनी पर फिल्माया गया “लैला मैं लैला” (रईस, 2017) पर सिनेमाघरों में न
सिर्फ दर्शकों ने अपनी अपनी कूर्सियाँ छोड़कर नाचना और सीटी बजाना शुरू कर दिया
बल्कि पैसों की बरसात तक करने लगें ।
ये नायिकाएँ आइटम सॉन्ग्स तो करती हैं
परंतु इन्हें ‘आइटम गर्ल’ कहलाना पसंद नहीं बल्कि ये फिल्मों में अपनी
‘विशेष उपस्थिति’ (स्पेशल अपियरेंस)
मानती हैं । यह उपस्थिति चाहे समाज के लिए कितनाहूँ घातक क्यों न हो ? ये ‘उपभोग’ बनकर उपभोक्ताओं को
लुभाती हैं । इन्हें अपनी जवानी जानलेवा जलवा... देखने में हलवा लगता है, ट्रेलर
दिखाकर पूरी फिल्लम दिखाने के लिए आमंत्रित करती हैं, शाम के अकेलेपन को बाँटने के
लिए तैयार खड़ी होती हैं अथवा ज़िस्म की तिजोरी को तोड़कर लूट लेने के लिए आमंत्रित
भी करती हैं (‘चिकनी चमेली’, अग्निपथ,
2012), या फिर निःसंकोच कहती हैं - “आजा मेरे राजा तूझे
जन्नत दिखाऊँ मैं, बर्फिले पानी में फायर लगाऊँ मैं...”
(दबंग – 2, 2012), या “जोबन है प्यासा तो जोर करे... आइटम
बनाकर रखले” (हिरोइन
(2012) । माचीस की तीली से भीगी बीड़ी जलाना, बबली बनकर बंटी के साथ कमरे में
20-20 होना और स्वयं को लुटवाने की चाह (बेलकम बैक, 2015) अथवा “उ ला ला उ ला ला” (द डर्टी पिक्चर, 2011) आदि गानों
पर अभिनय करके मर्दों के दिल की धड़कने बढाना और अपने दैहिकता का वस्तुगत
मूल्यांकन करना और करवाना स्वतंत्रता और समानता का स्वांग भरना ही तो है !! जहाँ स्त्री को खुलकर कहा जाता है और हम उस पर एन्ज्वॉय भी करते हैं – “तू चीज बड़ी है मस्त मस्त” (मोहरा, 1994) या “पैसा पैसा करती है तू पैसे पे क्यूँ मरती है” (यह
ध्यातव्य है कि इस फिल्म में नायक स्वयं पैसे के लिए मर रहा होता है जबकि यह गाना
नायिका के लिए फिल्माया गया है, दे दना दन, 2009) ।
आइटम सॉन्ग फिल्म-जगत का औद्योगिक
दाव है जिसका उद्देश्य बड़ा मुनाफा अपने हक़ में करने का होता है, लेकिन इन सस्ती
लोकप्रियता के कारण हम एक बार फिर स्त्री के वस्तुगत मूल्यांकन की ओर बढ़ रहे हैं
। पतली दुबली छरहरी कामूक शरीर का ‘ब्यूटी मिथ’ भले औद्योगिक जगत के लिए फायदेमंद हो पर स्त्रियों के प्रति समाज का
नज़रिया अत्यधिक घातक होता जा रहा है । एक तरफ स्वयं स्त्रियाँ भी उसी ‘ब्यूटी मिथ’ की ओर बढ़ रही है तो दूसरी ओर पुरूष भी
आम औरतों में भी वही दैहिक संरचना देखना चाहते हैं । नाओमी वूल्फ के अनुसार, “सुन्दरता का यह मिथ एक राजनीतिक मुहिम है जो औरत के खिलाफ जाती है ।
औद्योगिक क्रान्ति में घर के भीतर रहने वाली आरंभिक स्त्री ‘गृहिणी’
थी । उत्तर-औद्योगिक क्रांति ने उसे बाहर निकाला
लेकिन एक ‘ब्यूटी मिथ’ के साथ । यह ‘ब्यूटी मिथ’ ही नया नियंत्रण है । स्त्री घर से
निकलती है और ब्यूटी के उद्योग में फंस जाती है । सौन्दर्य की यह विचारधारा ही मिथ
है जो नए ढंग से स्त्री पर सामाजिक नियंत्रण लागू करती है”
। (पचौरी,
सुधीश. स्त्री-देह के विमर्श. पृ. 27) देखा
जाय तो यह कट्टरपंथी नारीवादी कैथरीन मेकनॉन का ‘पोर्नोग्राफी’ संबंधी मूल्यांकन के साथ सटिक बैठता है कि इसमें सामाजिक संबंधों के
संगठन हेतु स्त्री अपने कामुकता भरे समर्पण के द्वारा अपना प्रभुत्व स्थापित करती
है, लेकिन इसमें पुरूष अपना वर्चस्व बनाये रखता है । (चतुवेदी,
जगदीश एवं सुधा सिंह. कामुकता पोर्नोग्राफी और स्त्रीवाद. पृ. 14) यह
कहना गलत न होगा कि जिस अस्मिता के लिए नारिवादियों ने अपनी जी-जान लगा दी उसे
आइटम सॉन्ग्स ने एक झटके में उखाड़ फेंका । आज लड़कों के लिए लड़कियों के साथ
छेड़खानी करना सहज एवं प्राकृतिक लगने लगा है और शीला, मुन्नी, जिया, टिंकू, पिंकी,
मैरी आदि लड़कियों का घर से निकलना दूभर हो गया है । आज सेक्स बेडरूम से निकल कर
पब, पार्टी, घर, स्कूल और सड़कों पर सार्वजनिक हो गया है । स्त्री अपनी अस्मिता को
तार-तार होते हुए न सिर्फ देख रही है बल्कि आज़ादी के नाम पर उसे एन्ज्वॉय भी कर
रही है । होमी के. भाभा का उत्तर-उपनिवेशवाद के द्विविधावादी (Ambivalence) सिद्धांत के तहत देखा जाए तो स्त्री पितृसत्ता के जकड़न के दो तरिकों के
बीच फँसी हुई दिखाई दे रही है । वह स्टीरियोटाइप इमेज को तोड़ने में सफलता तो
हासिल कर ली है लेकिन ख़ुद को आइटम होने से बचा नहीं पा रही अर्थात् वह कल भी
वस्तु थी और आज भी है । स्त्री को वर्चस्ववादी सत्ता के इस षड़यंत्र को समझना होगा
। आज़ाद स्त्री को सोचना होगा कि क्या वह सचमुच आज़ाद है ?
कहीं वह इन सॉन्ग्स के माध्यम से लोगों के दिमाग में यह तो नहीं भर रही कि वह ‘तंदूरी चिकन’ और ‘बटर नमकीन’ ही है अथवा ‘चखना’ बनकर कहीं
भी कभी भी ‘चख’ लेने वाली चीज है ?
क्या वह सिर्फ एक ‘चीज’
बनकर तो नहीं जीना चाहती ? या फिर वह प्यास बुझाने का सिर्फ
एक साधन है ? क्या वह एन्ज्वॉयमेंट का साधन ही बने रहना
चाहती है अथवा जीवन एक अहम् हिस्सा ?
****************
संदर्भ
ग्रंथ –
·
पचौरी, सुधीश. स्त्री-देह के
विमर्श. सं. प्रथम 2000. प्रकाशक – आत्माराम एंड संस, दिल्ली.
·
चतुर्वेदी, जगदीश्वर एवं सुधा सिंह.
कामुकता पोर्नोग्राफी और स्त्रीवाद. सं. 2007. प्रकाशक – आनन्द प्रकाशन, कोलकाता.
·
http://punjabkesari.com/entertainment/these-items-will-be-stunned-by-hearing-the-crores-of-girls-fees/
10 जुलाई, 2017
सोमवार, 15 जनवरी 2018
रिस्तों की जटिलताओं में सुलगते नारी मन और देह की गुत्थी
डॉ. कमलेश कुमारी द्वारा संपादित पुस्तक 'प्रवासी कथाकार तेजेन्द्र शर्मा मुद्दे और चुनौतियाँ' में मेरा लेख 'रिश्तों की जटिलताओं में सुलगते नारी मन और देह की गुत्थी' प्रकाशित । पृ. 164-170, प्रथम सं. 2018, साहित्य संचय प्रकाशन, नई दिल्ली ।
रिस्तों
की जटिलताओं में सुलगते नारी मन और देह की गुत्थी
प्रवासी
साहित्यकारों में सुप्रसिद्ध कथाकार तेजेन्द्र शर्मा की रचनाएँ भारतीय संस्कारों
से बंधे किंतु इंग्लैण्ड की धरातल पर पंख फैलाये रिस्तों के मनोविज्ञान का आश्रय
लेकर सामाजिक एवं पारिवारिक संरचना की गुत्थम गुत्थी है किंतु न ही पूरी तरह
नॉस्टेल्जिया और न ही पूर्ण रूप से पाश्चात्य का अनुकरण । हर कहानी का अपना एक
दर्द है और उस दर्द की छाँव में पिघलते पात्रों का जीवन सुखांतक तो कभी दुखात्मक
मोड़ से होकर गुजरता है । इन कहानियों को समझने के लिए रूढिवादिता से दूर आधुनिकता
के फलक पर व्यापक नज़रिए की आवश्यकता है जो रिस्तों के बीच फँसें मन और देह की
जटिलताओं को समझ सकें । प्रायः सरसरी निगाह से पढ़ने पर लगता है कि इन साधारण-सी
कहानियों में स्त्री महज एक देह है, जिसकी भावनाएँ गौण हो जाती हैं । लेकिन कहानी के गहराई में उतरने पर उस देह के
नीचे कूढ़ते मन और मन में चल रहे हलचलों को समझने पर समझ में आता है कि रिस्तों का
हर हिस्सा अस्तित्व के प्रति सजगता और सर्तकता के ताने बाने से बुना हुआ है । ‘कोख
का किराया’ की नायिका मैनी का सरोगेसी की आड़ में अपने एकतरफा प्रेम करने वाले
प्रेमी से गर्भवती होने की जिद्दी इच्छा हो या फिर ‘कल फिर
आना’ की रीमा का अचानक घर में घुसे चोर से प्राप्त शारीरिक
तृप्ति, ‘एक बार फिर होली’ की नायिका
नज़मा के अधूरे प्रेम का पूरे होने की चाह हो या फिर ‘छूता
फिसलता जीवन’ की मैडी के साथ अपने एकतरफा प्रेम से उत्पन्न
बलात्कार की पीड़ा और उस पीड़ा में प्रेमी के वापसी का इंतज़ार, ‘अभिशप्त’ की नायिका निशा का अपने पति और बच्चों को
बाँधे रखने की चाह हो या फिर ‘ये क्या हो गया’ की नायिका अनुष्ठा का अपने पति से
बदले की आग में खुद को ही वेश्यावृत्ति की राह में धकेल देना आदि जीवन की वह
सच्चाई है जिसे हम स्वीकार करें या न करें फिर भी सच तो हैं ।
ये
कहानियाँ रिस्तों की जटिलाओं में फँसे पात्रों की वैवाहिक और विवाहेत्तर संबंध दोनों
ही स्तरों पर चलती हैं । अपनी शारीरिक जरूरतों को पूरी करने की अधिकारिक माँग...
वह भी इतनी निर्भिकता और निर्लज्जता से, यह तेजेन्द्र की नायिकाएँ ही कर सकती हैं
। जिसमें सिर्फ एक पुरूष ही नहीं स्त्री भी बेझिझक प्रथम स्तर पर पहल करती अथवा
पहल में जिद्द भी करती हुई भी दृष्टिगत होती हैं और समय मिलते ही सीमाओं को लाँघने
में संकोच नहीं करतीं । यह विशेषताएं ही उन्हें भारतीय नारियों से दूर कर
इंग्लैण्ड के धरातल पर ला खड़ी करती हैं ।
‘कोख का किराया’ कहानी में नायिका मनप्रीत का फुटबाल
खिलाड़ी डेविड पर मुग्ध होना और मुग्धावस्था के कारण ही सरोगेसी का निर्णय लेना,
मन ही मन डेविड से प्रेम करना और और अपने पति गैरी के साथ बिस्तर पर होते हुए भी
डेविड के बाँहों में होने की कल्पना करना, साथ ही अपने पति गैरी की भावनाओं के
कुचलते हुए और उसके फैसले के विरूद्ध जाकर डेविड का बच्चा अपने कोख में धारण करना आधुनिक
नारी के स्वच्छंद निर्णयात्मक शक्ति को दर्शाता है । उसकी इच्छा है कि डेविड उसे
प्राकृतिक रूप से गर्भवति करे किंतु डेविड का जया से अटूट प्रेम और गौरी के साथ
मित्रवत् वफादारी के कारण इंकार ने मैनी उर्फ मनप्रीत भारतीय और इंग्लैण्ड का
परिवेशगत तुलना “यहाँ तो हर कोई किसी दूसरे के बिस्तर में
घुसने को तैयार रहता है” (शर्मा,
तेजेन्द्र. बेघर आँखें. पृ. 37. (कोख का किराया)) करके
खीझ उठती है । गैरी के लाख समझाने के पश्चात् भी डेविड का बच्चा अपने कोख में धारण
करना कोख का किराया तब लगने लगता है जब डेविड और जया अपने बच्चे को लेकर चले जाते
हैं और बाद में फोन के द्वारा सारी मित्रवत् भावनाओं को ताक पर रखते हुए मैनी को
बच्चे से दूर रहने सलाह देते हैं, जबकि बदले की भावना से गैरी अपने दोनों बच्चों
को लेकर मैनी से बहुत दूर नीना के साथ रहने जा चुका है । मैनी ठगी-सी रह जाती है
उसकी जिन्दगी हैल (नर्क) की भाँति लगने लगती है । “ ‘सरोगेट माँ’ बनने के चक्कर में न वह माँ रह पाई और न
ही पत्नी” । ((शर्मा,
तेजेन्द्र. बेघर आँखें. पृ. 42. (कोख का किराया))
‘कल फिर आना’ कहानी बेमेल विवाह से उत्पन्न तृप्ति-अतृप्ति की कहानी है । कबीर उम्र के उस पड़ाव पर है जब उसके लिए सेक्स का
कोई मतलब नहीं रह जाता और रीमा जवानी के शिखर पर । रीमा का अपने पति से शिकायत है
- “कबीर आप पचास के हो गये तो इसमें मेरा
क्या कसूर है ? मैं अभी सैंतीस की ही हूँ ।... आप कहना चाहते
हैं कि हमारी शादीशुदा ज़िन्दगी बस आपके वाक्य से ख़त्म हो गई ?... जिस तरह पेट को भूख लगती है, कबीर, जिस्म को भी वैसे ही भूख महसूस
होती है । वैसे पेट की भूख शांत करने को तो कई तरिके हैं । मगर जिस्म...” (http://www.rachanakar.org/2012/10/blog-post_4755.html (कल
फिर आना))
जिस्म पति के साथ बीते पलों को स्मरण कर इतना व्याकुल है कि अचानक घर में घुसे चोर
के साथ अपनी तृप्ति ढूँढ़ लेता है । “कुछ पलों में ही जो कुछ
एक बलात्कार की तरह शुरू हुआ था अब आनंददायी रतिक्रिया में परिवर्तित हो चला” । (http://www.rachanakar.org/2012/10/blog-post_4755.html (कल
फिर आना)
यह स्त्री-मन की अत्यंत जटिल मनःस्थिति ही है कि एक तरफ वह पति और बच्चे से बहुत
प्रेम करती है परंतु सेक्स के समय बिल्कुल अलग किस्म की लगती है.. कृत्रिम एवं वस्तुगत
अथवा देह के स्तर पर बेवश । सरसरी निगाह
से देखें तो यह भारतीय परिवेश के लिए अग्राह्य प्रतीत होता है और तो और बलात्कार
सुख में बदल जाये ! अत्यंत आश्चर्य का विषय है । परंतु भारतीय संस्कृति के दोहरे मानदंड़ों
के बीच ही यह सम्भव है कि सेक्स विषय पर खुलकर बात नहीं किया जाता और अपने घुटती
इच्छाओं को छिप-छिपकर मूर्तवत् रूप दे दिया जाता है, अन्यथा आज विवाहेत्तर संबंध
के उदाहरण नहीं मिलतें । इस कहानी पर चर्चा के समय डॉ. बिपाशा सोम कहती हैं कि “स्त्री मन के इस जटिल सूत्र को भारतीय परिवेश में ही समझा जा सकता है । क्योंकि
दुराव-छुपाव यहाँ अधिक है”। तो डॉ. रितुपर्णा मजूमदार का
कहना है “अचानक घर में घुसे चोर से पाँच बार सुख लेना
अर्थात् स्त्री का सहयोग है और जब अतृप्त भावनाएँ तृप्ति का माध्यम बन जाये तब वह
बलात्कार नहीं रहता” । इसीलिए नायिका कहती है – कल फिर आना
।
‘एक बार फिर होली’ कहानी बुलन्दशहर में जन्मी नज़मा
को प्रेम, भावुकता, तकलीफ और मिलन की
उत्कंठा से जुडी है । नज़मा के प्रेमी चन्द्र प्रकाश का होली के दिन उसके गालों पर
गुलाल लगाना और दुर्गा मासी द्वारा हो-हल्ला मचाने पर नज़मा का विवाह कराची में
फौज़ी इमरान से किया जाना, फौज़ियाना अंदाज में पति इमरान का नज़मा के साथ शारीरिक
भूख मिटाना और हिन्दुस्तान की तारिफों के कारण प्रायः उसकी उपेक्षा करते रहना तथा
बार बार प्रताड़ित करना नज़मा को परदेस में और भी अकेला कर जाता है । करगिल-युद्ध
में इमरान की मृत्यु ने नज़मा में फिर से हिन्दुस्तान आने की उत्कंठा उत्पन्न कर
दी और वह आ भी जाती है लेकिन उसकी आँखें दुनिया से छिपकर चन्द्र प्रकाश को ढ़ूँढ़
रही होती है । 26 साल बाद भी बदले हुए हिन्दुस्तान में चन्द्र के लिए नज़मा की
भावनाएँ नहीं बदलतीं । एक हफ्ते बाद फिर से आने वाली होली में चंद्र का इंतज़ार यह
सिद्ध करता है कि प्रेम सचमुच उम्र और समय से परे है ।
‘अभिशप्त’ नायक प्रधान कहानी है परंतु देखा जाय तो
धोखा नायिका निशा के साथ हुआ है कि उसका पति रजनीकांत लंदन में टिके रहने के
उद्देश्य से स्वार्थवश उससे विवाह करता है और मन ही मन स्नेहा से प्रेम करता है ।
निशा एक तर्कशाली आधुनिक नारी है जो अपने पति और बच्चों से ही अपना परिवार समझती
है न कि सास-श्वसूर आदि अन्य सदस्यों से । लेकिन नायिका का वस्तुगत मूल्यांकन उस
समय किया जाता है जब लेखक लिखते हैं - “चाहे दिन-भर एक दूसरे से बात भी न करें, किंतु रात को बिस्तर में
निशा को जब तक उसका हक ना मिल जाए, से तृप्ति नहीं होती”। (शर्मा, तेजेन्द्र. बेघर आँखें. पृ.
63. (अभिशप्त)) नायक की संवेदनशीलता दर्शायी गयी हैं किंतु
नायिका की नहीं । इस कहानी से कई प्रश्न उठ खड़े होते हैं कि क्या संबंध निभाने के
लिए सिर्फ सेक्स ही आवश्यक है ? क्या भावनात्मक लगाव के कमी के कारण
तो ही नहीं कि नायिका निशा रजनीकांत को उसके घर पैसे नहीं भेजने देती ? उसे पति के मन में चल रहे स्नेहा से प्रेम और खुद को तलाक देने का
अंतर्द्वन्द्व पता है इसलिए पति और बच्चों को बाँध कर रखना चाहती है, जिसमें शरीर
एक हथियार है ? या फिर रजनीकांत का ‘मध्यमवर्गीय
बौड़मपन की उड़ान’ में दोहरी जिन्दगी ने निशा को कठोर होने
के लिए विवश कर दिया है ?
‘ये क्या हो गया’ किसी को अपना आदर्श मानने, उसके
जैसा बनने, उसपर अंधविश्वास रखने और अनुकरण के कारण स्वयं से विश्वास खोने के
पश्चात् ‘ये क्या हो गया’ ! जैसा
प्रश्न, आश्चर्य एवं अफ़सोस की कहानी है । राजकुमारी डायना को अपना आदर्श मानने
तथा उनका अंधानुसरण करने वाली अनुष्ठा का अभिजात्य कुल के अनिल के साथ प्रेम
विवाह, अनिल का कोमल भाभी के साथ संबंध और संबंधों में खाये धोखे से आहत अनुष्ठा
में बदले की भावना, अनिल को आहत करने के उद्देश्य से उसके ही दोस्त विजय के साथ अनुष्ठा
का संबंध बनाना, ‘ककॉल्ड’ (जिसकी पत्नी
विवाहेत्तर संबंध में हो ऐसे पुरूष को ककॉल्ड कहते हैं ) बना अनिल का अनुष्ठा का
पीछा करना, तड़पना, सवाल करना किंतु उसे रंगे हाथों पकड़ने में झिझकना अनुष्ठा को
और भी घायल और व्यग्र बना देता है इसलिए वह कहती है- “मुझे अनिल पर दया भी आ रही थी और क्रोध भी, अरे, कोई तुम्हारी पत्नी को
तुम्हारे सामने घुमा रहा है और तुम केवल जासूसी में लगे हुये हो ! तुम्हारी मर्दांगनी क्या मर गई है ! लानत है ऐसे
मर्द पर ! उसकी रगों का खून सचमुच ठण्डा हो चुका था” । (शर्मा, तेजेन्द्र. बेघर आँखें. पृ. 91. (ये क्या हो गया)) यहाँ
तक कि वह प्रिंस चार्ल्स से अनिल की तुलना करते हुए कहती है कि “क्या सारे मर्द एक से होते हैं ? क्या इस सदी के सभी मर्द नामर्द हो चुके
हैं” ? (शर्मा, तेजेन्द्र.
बेघर आँखें. पृ. 91. (ये क्या हो गया) उसका
डायना के जीवनी के तर्ज पर मुंबई के टाटा अस्पताल में जाकर कैंसर रोगियों की
देखभाल करना और अखबार की सूर्खियों में भी आ जाना, बदले की राह में अब आजमानी का
साथ होना आदि बदले की आग में वह समझ नहीं पाती कि वह किससे बदला ले रही है अपने
पति से या खुद से ? अनिल से तलाक और उसके किसी भी काम से अनिल पर कोई भी फर्क न पड़ने से वह
और भी आहत हो जाती है क्योंकि उसका मकसद ही अनिल को तड़पते देखना था जैसे कि अनिल
की बेवफाई के बाद यह स्वयं तड़पी थी । वह अनिल के दिल में जगह बनाना चाहती थी परंतु
वेश्यावृति की राह चुनकर हर जगह से बजगह हो जाती है ।
‘छूता फिसलता जीवन’ में पंजाबी लड़की मैडी यानी मंदीप
ब्रार का जेम्स से एकतरफा प्रेम, जेम्स द्वारा मनदीप का बलात्कार और पैरी नामक
बच्चे का जन्म तथा मैडी का प्रेम, नफ़रत, घृणा के बीच जटिल अंतर्द्वन्द्व को बड़े
ही सरल तरिके से दर्शाया गया है । मैडी जेम्स से मन ही मन प्रेम करती है, उसके साथ
जीवन बीताने के सपने देखती है । “जेम्स उसके लिए सिर्फ एक
नाम नहीं था, वह उसके लिए जीने का प्रयाय बनता जा रहा था” । (शर्मा,
तेजेन्द्र. बेघर आँखें. पृ. 109. (छूता फिसलता जीवन) लेकिन “जेम्स के लिए गर्लफ्रेण्ड का अर्थ था सेक्स !… बस और
अधिक सेक्स” । (शर्मा,
तेजेन्द्र. बेघर आँखें. पृ. 109. (छूता फिसलता जीवन) परंतु
अचानक पार्क में हुए मैडी से जेम्स की मुलाकात के पश्चात् कब्र दिखाने के बहाने
उसका बलात्कार उसे अंदर से झकझोर देता है । वह अपने माँ-बाप के कहने पर जेम्स को
सज़ा दिलवाले के लिए कोर्ट भी जाती है लेकिन कहीं न कहीं उसका मन शरीर पर हावी है
। बलात्कार और प्रेम जैसी विपरीत मनःस्थिति एक साथ दिखाई देते हैं । वह अब भी
उम्मीद लगाये बैठी है कि उससे जेम्स प्यार के दो शब्द बोलेगा, उसे मनाने आ जायेगा
या फिर आई लव यू कह कर उससे माफी माँग लेगा । जहाँ उसे अपने प्रेमी से घृणा है
वहीं वह उससे अपनाने की भी सोच रही है । आश्चर्य है कि ये दोनों विपरीत
मनःस्थितियाँ प्रेम और घृणा संचारी भाव की तरह कैसे आलोडित हो सकते हैं ? क्या घटनाक्रम की क्रूरता धीरे धीरे समाप्त होकर पुनः प्रेम को जीवित कर
देती हैं ?
इन
कहानियों के पात्र रिस्तों के वर्जित क्षेत्रों में जाकर पूरे आत्मविश्वास के साथ
अधिकार माँगने की हिम्मत रखते हैं । ये हिम्मत प्यासी दमित इच्छाओं की परिणति हैं
जो परिणाम की चिंता किए बगैर अपने आपको विद्रोह की आग में झोंक देते हैं । प्रबोध
कुमार गोविल के अनुसार, “जिस तरह हिन्दी में महिला लेखन
पर बात करते हुए कुछ महिला कथाकारों के बारे में समय समय पर कहा जाता रहा है कि वे
पुरूष मनोभावों को चित्रीकरण में भी सिद्धहस्त हैं, ठीक उसी तरह तेजेन्द्र की
कहानियों को पढ़ते समय लगता है कि तेजेन्द्र महिला पात्रों के भीतर से भी बड़ी
स्वाभाविक से बोलते हैं निश्चय ही यह एक बड़ी उपलब्धि है” । (https://www.sahityakunj.net/LEKHAK/T/TejinderSharma/Aalochkon_ki_nigah_mein.htm)
वे
महिला-मन को न केवल समझते हैं बल्कि परत दर परत उसे बड़ी ही सहजता से साहित्य में
उकेरते भी हैं अपने पति से अतृप्ति के पश्चात् “रीमा तड़पकर
उठी । उसकी आँखों में एक अलग किस्म का दर्द था जिसे समझने के लिए दिल में
सेंसेटिविटी होना बहुत ज़रूरी है” ।
(http://www.rachanakar.org/2012/10/blog-post_4755.html (कल
फिर आना)
डेविड
की पत्नी जया के मन में बच्चा किसी और के गर्भ में पलने और पति के छिन जाने का
अनजाना भय का दर्द “जया की भावनाओं को व्यक्त करने के लिए किसी भी भाषा के शब्दों में सामर्थ्य
नहीं है । उन भावनाओं को व्यक्त करने के लिए तो नई शब्दावली बनानी होगी, नये
मुहावरे गढ़ने होंगे” । (शर्मा,
तेजेन्द्र. बेघर आँखें. पृ. 44. (कोख का किराया) इमरान
द्वारा नज़मा की भावनाओं को तार तार किये जाने पर नज़मा की तकलीफ “उसे तो अपनी भूख
शांत करनी होती थी जो हो ही जाती थी । प्रकृति ने बनाये हैं नर और मादा शरीर और
प्रकृति ने ही बनायी है वासना । सृष्टि ने उत्पत्ति के लिए ही वासना को जन्म दिया
है... यदि प्रेम एवं वासना दोनों का समन्वय हो जाये तो जीवन के अर्थ ही बदल जाते
हैं” । (शर्मा,
तेजेन्द्र. बेघर आँखें. पृ. 76. (एक बार फिर होली) अनिल
से बदला लेने के लिए अनुष्ठा का विजय के साथ संबंध बनाते हुए विजय द्वारा की गई
तारिफों से अनुष्ठा के मन में हलचल – “मुझे बहुत दिनों बाद याद आया था कि मेरी आँखें, मेरे बाल, मेरी त्वचा,
मेरे होंठ, मेरी छातियाँ, यानि कि मेरा संपूर्ण बदन ही बला का खूबसूरत है” । (शर्मा, तेजेन्द्र. बेघर आँखें. पृ.
89. (ये क्या हो गया) बोन
मैटास्टेसिस कैंसर से जूझ रही सुरभि का स्तन का पाँच वर्ष पहले ही कट जाने पर नरेन
से पूछे जाना वाला प्रश्न – “मेरी छाती तो कटवा आए, मुझे
प्यार कर पाओगे अब” ? (http://www.abhivyakti-hindi.org/kahaniyan/vatan_se_door/2005/apradhbodhkapret/apradhbodhkapret2.htm (अपराधबोध
का प्रेत)
परमजीत उर्फ पम्मी का अपने पति हरदीप की मृत्यु के पश्चात् उसके साथ बिताये हुए
चार-पाँच महिने के विषय में तथा सूजी आँखों से अस्थि कलश के साथ मिले हुए 3 लाख
रूपये “उसे समझ नहीं आ रहा था कि यह उसके पति की देह की क़ीमत है या उसके साथ
बिताए पाँच महिनों की क़ीमत” । (http://www.abhivyakti-hindi.org/kahaniyan/vatan_se_door/2008/dehkikeemat/dkk3.htm (देह
की क़ीमत)
या
फिर “जया सदा ही दिलीप में एक मित्र तलाशती रही, किंतु वह मित्र उसे राज में ही मिला । पति पत्नी एक दूसरे के मित्र क्यों
नहीं रह पाते” ? (http://www.abhivyaktihindi.org/kahaniyan/vatan_se_door/gandagi_ka_baksa/gkb2.htm गंदगी का बक्सा) आदि
से पता चलता है कि तेजेन्द्र को नारी मन की सूक्ष्म परख है ।
प्रायः
स्त्री-विमर्श को मात्र देह-विमर्श का पर्याय के रूप में आरोपित कर उपेक्षित किया
जा रहा है लेकिन सच तो यही है कि देह से मनुष्य का मूर्त अस्तित्व है । यथार्थ के
धरातल पर पति-पत्नी के रिश्तों में देह की स्वाभाविक एवं प्रयोगात्मक रूप से
महत्वपूर्ण भूमिका है । उस भूमिका में कहीं मन देह पर भारी है तो कहीं देह मन पर ।
मन और देह की चाह की राह को तेजेन्द्र ने बड़ी बारिकी से परखा और चित्रित किया है,
जिसमें टूटन, घूटन, पीड़ा, संत्रास, कुंठा, जीजिविषा, काम, लोभ, मोह, प्रेम,
ईर्ष्या आदि पिघल-पिघलकर परिवारिक संरचना को रौशन करते हैं तथा साथ ही रिस्तों को
बड़े ही सून्दर ढ़ंग से दर्पण दिखाकर उसे व्याख्यायित कर सचेत करने का अनूठा
प्रयास भी हैं ।
***************
संदर्भ ग्रंथ –
·
शर्मा, तेजेन्द्र. बेघर आँखें. सं.
2014. यश पब्लिकेशन, दिल्ली.
रेनू
यादव
रिसर्च
/ फेकल्टी असोसिएट
हिन्दी
विभाग
गौतम
बुद्ध विश्वविद्यालय
यमुना
एक्सप्रेस-वे, नियर कासना, गौतम बुद्ध नगर,
ग्रेटर
नोएडा – 201 312 (उ.प्र.)
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