सोमवार, 30 अगस्त 2010

Stree-Vimarsh Aur Ramnika gupta ka bold lekhan

                                     स्त्री-विमर्श और रमणिका गुप्ता का बोल्ड-लेखन
     साहित्य-जगत में सदियों से स्त्रियों की दबी-दबी आवाज जब मुखर हुई, तो सर्वप्रथम अपनी व्यथा-कथा से भड़की. स्त्रियों ने स्त्रियों की स्थिति तथा स्त्री का स्त्रीकरण  कैसे हो गया, के विषय में सोचना शुरू किया तो विपक्ष में पुरुषवर्चस्ववादी सत्ता का नया रूप सामने आया. वह अपने शुभचिंतकों के हाथों ठगी गई थी, जो अब उसे स्वीकार्य नहीं था. इसलिए उसने पुरुषवर्चस्ववादी सत्ता का विरोध किया और स्त्री-विमर्श अर्थात नारीवादी आन्दोलन का सहारा लिया. 
     'स्त्री सम्बन्धी विषयों पर विचार करना' ही स्त्री-विमर्श है. स्त्री-विमर्श को परिभाषित करते हुए कहा जा सकता है स्त्री के विषय में उसके सुख-सुविधाओं से लेकर प्रत्येक समस्या के परिप्रेक्ष्य में ऐतिहासिक, सामाजिक,  धार्मिक, सांस्कृतिक, आर्थिक और मनोवैज्ञानिक दृष्टि से सूक्ष्म से सूक्ष्मतम चिंतन-मनन कर अस्वस्थ दृष्टिकोणों  को अस्वस्थता प्रदान करना ही स्त्री-विमर्श है.
     पुरुषवर्चस्ववादी साहित्य में स्त्री-विमर्शी लेखिकाएं और कवयित्रियों ने शुरू-शुरू में अपरिपक्वता के साथ डर-डर कर कदम रखा, किन्तु बाद में उनकी निर्भीकता ने समस्त साहित्यकारों और आलोचकों को आश्चर्यचकित कर दिया. वे मात्र अपनी व्यथा-कथा तक ही सीमित न रही बल्कि सामाजिक, राजनीतिक, सांस्कृतिक और साहित्यिक क्षेत्र में भी बोलना शुरू कर दीं. उनकी निर्भीकता और सीधे-सपाट बेधड़क बोलने और लिखने की शैली को बोल्ड-लेखन का नाम दे दिया गया. बोल्ड अर्थात निर्भीक अथवा साहसी.
     स्त्री-विमर्शी बोल्ड लेखिकाओं व कवयित्रियों जैसे कृष्णा सोबती, प्रभा खेतान, मैत्रेयी पुष्पा, मन्नू भंडारी, उषा प्रियंवदा, अमृता प्रीतम में से रमणिका गुप्ता का भी नाम प्रसिद्द है. कुछ समय से लेखिकाओं के आत्मकथाओं को ध्यान में रखते हुए बोल्ड-लेखन का अर्थ निर्भीकता के बजाय प्रेम-प्रसंगों से लिया जाने लगा है किन्तु प्रेम-प्रसंग हो या अपने अधिकारों की मांग, स्वभावतः बोल्ड-लेखन के लिए लेखकों को भी बोल्ड अर्थात धृष्ट, प्रगल्भ बनना ही पडेगा. शेर की मंद में डर-डरकर जीने वाली औरतों ने शेर के विरुद्ध आवाज उठाई, यह धृष्टता ही उनकी बोल्डनेस है.  
     साहित्य के रण-क्षेत्र में अन्य लेखिकाओं की भांति रमणिका गुप्ता भी अस्त्र-शस्त्रों के साथ कूदीं और अब तक आम आदमियों के लिए युद्धरत हैं. आदिवासी, दलित तथा स्त्री-विमर्श इनके लेखन का प्रमुख क्षेत्र है. अब तक इनकी गद्य और पद्य की ३२ पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी है तथा इन्होने २४ पुस्तकों का संपादन किया है, साथ ही वर्त्तमान में इनकी छः पुस्तकें प्रकाशनाधीन है. गद्य में 'सीता', 'मौसी' उपन्यास , 'बहुजुठाई' कहानी-संग्रह, 'निज घरे परदेसी' 'दलित सपनों का भारत और यथार्थ', 'स्त्री-विमर्श: कलम और कुदाल के बहाने' तथा 'लहरों की लय', निबंधात्मक, आलोचनात्मक और यात्रा-वृत्तांत तथा 'हादसे' आत्मकथात्मक पुस्तकें हैं. शीघ्र ही इनकी दूसरी आत्मकथा 'आपहुदरी'  प्रकाशित होने वाली है. 'सीता', 'मौसी' उपन्यास तथा 'बहुजुठाई' कहानी-संग्रह इनकी आँखों देखा हाल है, जिसमे इनकी नायिकाएं कोलियरी खदानों में अपने हक़ के लिए संघर्षरत हैं. गद्य-साहित्य में अपने बोल्डनेस के कारण इनकी सबसे अधिक चर्चित कृति आत्मकथा 'हादसे' और प्रकाशनाधीन 'आपहुदरी' है. 
     बचपन से ही लेखिका निर्भीक एवं साहसी रहीं. परिवार में सामंतवाद, नौकरशाही, जातिवाद तथा पर्दा-प्रथा का विरोध, छिप-छिपकर राजनीति में भाग लेना, जाति एवं परम्परा तोड़कर विवाह करना इनके साहस का परिचायक है. रमणिका जी के कथनानुसार भारत और चीन की लड़ाई में इनका गीत जन-जन के मुख पर था-
                           "रंग-बिरंगी तोड़ चूड़ियाँ,
                            हाथों में तलवार गहूंगी
                           मैं भी तुम्हारे संग चलूंगी
                           मैं भी तुम्हारे साथ चलूंगी."
     'हादसे' इनकी राजनैतिक-संघर्ष की दास्तान है तो 'आपहुदरी' प्रेम-प्रसंगों की. जहाँ समाज में अपमानित होने के भय से व्यक्तिगत-प्रेम के विषय में महिलाओं ने चुप्पी साधी थी, वही रमणिका जी किसी अपमान की चिंता किये बिना खुलकर अपने प्रेम प्रसंगों पर चर्चा करती हैं. जिसपर जारकर्म कहकर आलोचकों की मार भी पड़ी. किन्तु अपने लक्ष्य पर अडिग लेखिका व कवयित्री की एक ही पंक्ति सारे सवालों पर भारी पड़ती है-
                        "आज गंगा को अवतरित करने के लिए-
                        शंकर  की दरकार नहीं है.
                        गंगा खुद उतर आएगी धरती पर". 
     पद्य में 'गीत-अगीत',  'अब और तब', 'खूंटे', 'प्रकृति युद्धरत है', 'कैसे करोगे बंटवारा इतिहास का', 'पूर्वांचल एक कविता यात्रा', 'विज्ञापन बनाता कवि', आदिम से आदमी तक', भला मैं कैसे मरती', 'अब मुरख नहीं बनेंगे हम', 'मैं आज़ाद हुई हूँ', 'तिल-तिल नूतन', 'तुम कौन', 'भीड़ सतर में चलने लगी है' तथा 'पातियाँ प्रेम की' नामक काव्य-संग्रह प्रकाशित है. 
     स्त्री-विमर्श से सम्बंधित इनकी दो काव्य-संग्रह महत्वपूर्ण हैं- 'खूंटे' और 'मैं आज़ाद हुई हूँ'. इनका काव्य-संग्रह इनकी स्वछंद विचारधारा और प्रहारक भाषा-शैली के कारण प्रसिद्ध है. इनके स्त्री-विमर्श की खास विशेषता है की स्वयं के सन्दर्भ में इन्होने कभी भी पुरुष को अपने प्रेम और शोषण के लिए दोषी ठहराया. इन्हें न तो अपनी सफलता के लिए पुरुष रूपी वृक्ष पर लता बनकर चढ़ना पसंद था और न ही पुरुष के अस्तित्व को ख़ारिज किया, क्योंकि स्त्री-पुरुष संसार के सबसे बड़े सत्य हैं तथा दोनों के सह्योग से सृष्टि संचालित होगा. अतः इन्होने स्त्री-पुरुष के बीच प्रेम को स्वाभाविक माना. 'एनी मेरी लिंडवर्ग' के इन पंक्तियों - "मैं/ जिससे प्रेम करती हूँ/ मैं चाहती हूँ/ कि/ वह मुक्त रहे/ यहाँ तक कि/ मुझसे भी" को इन्होने अपने जीवन में उतारा तथा सीधे सरल शब्दों में कह देती है- 
                                 "मैं प्यार करने लगी हूँ तुमसे.
                                  इसलिए की 
                                 'तुम' - तुम हो.
                                 तुम्हारे विशेषणों की मुझे चिंता नहीं.
                                 मैं तुम्हारे 'तुम' से प्यार करती हूँ."
     ये स्वयं भी नहीं चाहती की कोई इन्हें इनकी मजबूरियों को या इनके रूप से प्यार करे, इसलिए  कहती हैं-
                               "तरस खाकर मेरी झोली में
                                प्यार की भीख मत डाल.
                                मेरे तन को नहीं,
                                मुझे प्यार कर 
                                नहीं तो मेरा मन 
                                गौड़ हो जाएगा." 
     ये प्रेम करने को  विद्रोह मानते हुए कहती है- "वर्चस्व सत्ता की प्रवृति है तो प्रेम विद्रोह व प्रतिरोध का पर्याय. केवल विद्रोही ही कर सकता है प्रेम. प्रेम परम्परा को तोड़ता है और कायम करता है अपनी नई राह- नई दिशा." क्योंकि भारत में प्रेम करने की मनाही रही. 'पातियाँ प्रेम की' नामक काव्य-संग्रह में ये लिखती हैं- "प्रेम ही बदल सकता है समाज. जो प्रेम करना नहीं जानता वह जीना भी नहीं जानता. हम जीने के लिए ही नहीं जीते बस. कोई न कोई  मकसद होता है जीने का- और वह मकसद है प्यार-जिंदगी से प्यार. प्रायः हर व्यक्ति करता है जिंदगी से प्यार! वह उसके लिए आख़िरी दम तक जद्दोजहद करता है ! मैंने जिंदगी को दम भर प्यार किया है, इसलिए मेरी कोशिश रही की जिंदगी कभी हारे नहीं- मैं भले हार जाऊं ! प्यार जीतता रहे ! प्यार बरकरार रहे !"
     प्रेम के साथ ये यौनेच्छा को नैसर्गिक मानती हैं. जो 'स्व' और 'पर' के बीच प्रेम को चरमोत्कर्ष पर पहुंचाता  है. ये कहती हैं- "'स्व' से समष्टि तक इस अबाध यात्रा में देह का महत्वपूर्ण योगदान होता है. 'स्व' और 'पर दो कायाओं का बोध कराते हैं. 'स्व' से 'परकाया' में प्रवेश इसी प्रेम के सहारे करता है. लेखक का कवि, चूँकि संवेदना और प्रेम का अन्योन्याश्रित रिश्ता है. संवेदना के सहारे दो प्रेमियों के बीच यह रिश्ता आकर्षण की आँखों में पनपता है. 'स्व' से 'समूह' तक की यात्रा संकल्प के दृढ कन्धों पर चढ़ कर तय करता है प्रेम ! लेकिन इसके विपरीत समूह का व्यक्ति-प्रेम विश्वास की बलिष्ठ बाहों से होता हुआ मुठ्ठियों में बंधकर हवा में हिलोरे लेने लगता है! "
     प्रेम को शक्ति मानते हुए दार्शनिक ओशो कहते है- "प्रेम शक्तियों का निकास बनता है. प्रेम बहाव है. क्रियेशन, सृजनात्मक है प्रेम, इसलिए वह बहता है और एक तृप्ति लाता है. वह तृप्ति सेक्स की तृप्ति से बहुत ज्यादा और गहरी है. जिसे वह तृप्ति मिल गई- वह कंकण पत्थर नहीं बीनता, जिसे हीरे-जवाहरात मिलने शुरू हो जाते है." कदाचित इनके उन्मुक्त प्रेम का ही फल है की इन्होने बड़े से बड़े समस्याओं का सामना आसानी से कर लिया.
     प्रेम में ये कोई भी कीमत चुकाने के लिए तैयार है किन्तु अपनी अस्मिता और स्वतंत्रता से कोई समझौता नहीं कर सकतीं. प्रेम में रोक-टोक, अधिकार ज़माना इन्हें बिल्कुल पसंद नहीं. विवेकहीन प्यार की कोई उम्र नहीं होती,  इसलिए प्यार है अथवा नहीं है तो उसे स्वीकार करने की क्षमता होनी चाहिए. स्त्री प्रेमवश पुरुष को अपने सारे अधिकार सौंप देती है, और अनजाने में पुरुष की गुलाम बन जाती है. इसलिए कवयित्री कहती हैं- 
                                                  "मैं ही उसे राजा बनाती हूँ
                                                   और बनती हूँ उसकी रानी
                                                   यहीं से शुरू होती है
                                                   मेरी  गुलामी की दास्तान  
                                                   और इकरार की कहानी." 
     स्त्री की जब आँखें खुली तब उसे समझ में आया-
                                                 "पर तुम तो पिंजरा बन गए
                                                  मेरे पंख और डैने बांध
                                                  सुनते मेरी गुटरगूं
                                                  मुझे रात-रात भर जगाते
                                                  सुनते
                                                  मेरी फड़फड़ाहट-छटपटाहट
                                                  चारा फेंक कर
                                                  जाल बिछा कर !"
                                                  ------------------
                                                  "तुम तो
                                                   खूंटा बन गए
                                                   जिसे देख रूह कांपती है मेरी
                                                   इसलिए
                                                   मैं रुकती नहीं कभी
                                                   कहीं भी !"
     सम्पति की अवधारणा के साथ ही स्त्री भी पुरुष की सम्पति बन गई. उसके सारे फैसले पुरुष लेने लगा. वह उसे सम्पति की भांति सजाने-सवाने और संभालने लगा. धीरे-धीरे वह उसी मानसिकता से ग्रसित होने लगी और पुरुषवर्चस्ववादीसत्ता की जकड़न में जकड गई. किन्तु जब उसे साजिश समझ में आई और वहां से निकलना चाहि तब तक रिश्तों की परिभाषा बदल चुकी थी. परिवार, परम्परा और संस्कृति की पाबंदियों से निकालना इतना आसान नहीं था. घर की चौखट लांघना और अचानक पुरुष के क्षेत्र में ही जाकर नौकरी करना उसके लिए मुश्किल ही नहीं मधुमक्खी के छत्ते में हाथ डालने जैसा था. तत्पश्चात वह आर्थिक रूप से निर्भर हुई, उसकी आर्थिक निर्भरता ने ही उसका आत्मविश्वास वापस लौटाया और उसने मात्र जमीन पर ही नहीं बल्कि अंतरिक्ष में भी विचरण करना शुरू कर दिया. वह किसी पुरुष पर अवलंबित होने के बजाय अपना जीवन-निर्वाह स्वयं करने लगी, किसी पुरुष का अत्याचार सहने के बजाय अत्याचार के खिलाफ आवाज उठाने लगी. वह अपने सारे फैसले स्वयं करने लगी. रमणिका गुप्ता इस बात की प्रत्यक्ष उदाहरण हैं. उन्हें पुरुष द्वारा मंदिर में स्थापित की गई देवी अथवा कुलटा  या माया,ठगिनी कहलाना पसंद नहीं . उनके अनुसार यदि औरत औरत होने की हीन ग्रंथि से मुक्त हो जाए  तो उसे कोई नीचा नहीं दिखा सकता. वह सर उठाकर जी सकती है. इस सिद्धांत को मानते हुए कवयित्री 'पंखों में होंगे निश्चय' नामक कविता में कहती हैं-
                                                      "मुक्त होने दो हमें
                                                       अपने आप से
                                                       मन की गाँठ
                                                       आँचल की आबरू
                                                       आँखों की लाज और
                                                       अपनी ही गिरफ्त से
                                               जुल्म अपने आप बंद हो जायेंगे"
     लेकिन स्त्री की आत्मनिर्भरता से उसका श्रम दोहरा हो गया. वह घर और ऑफिस दोनों संभालने लगी. भूमंडलीकरण  के दौर में अतिव्यस्तता के कारण वह परिवार में कुछ कम समय देने लगी. इसलिए उसके विषय में रूढ़ हो गया है की औरतों ने परिवार को नकारना शुरू कर दिया है, जिससे परिवार टूट रहा है- किन्तु रमणिका जी कहती हैं-
                                                         "मैंने कब तोड़े हैं रिश्ते ?
                                                          कब तोड़े हैं नेह के धागे ?
                                                          मैंने तो तोड़ी है सदियों से सीखी चुप्पी"
     यह सत्य है की स्त्री के विषय में उसके जन्म से लेकर मृत्यु तक, विवाह से लेकर प्रजनन तक के सारे फैसले पुरुष ही लेता था तथा हिंसा, उत्पीडन, बलात्कार जैसी समस्याएं आम बात हो गई थी इसलिए क्षुब्ध होकर स्त्री-विमर्शियों ने विवाह करने से इंकार कर दिया, और तो और सुलामिथ फायरस्टोन ने गर्भाशय को काटकर फेंकने की बात कर डाली. किन्तु स्त्री-विमर्श के तीसरे दौर ने मातृत्व को अपनी शक्ति माना. मातृशक्ति औरत की सबसे बड़ी शक्ति है. उन्होंने स्पष्ट किया है उन्हें मातृत्व से नहीं बल्कि स्त्री का स्त्रीकरण से इंकार है. अतः रमणिका एक       ऐसे सूरज को जन्म देना चाहती हैं, जो कभी अस्त न हो. 'मैं आजाद हुई हूँ' नामक काव्य संग्रह में वे कहती हैं-
                                                  "खिड़कियाँ खोल दी है
                                                   कि सूरज आ सके अन्दर
                                                   मेरी कोख से जन्म ले ले
                                                   एक नया दिन 
                                                   दिन-
                                                   जो सदियों से नहीं आया था
                                                   दिन-
                                                   जो कभी छिपेगा नहीं सांझ में सूरज के साथ
                                                   क्योंकि  सूरज को मैं अपनी कोख में
                                                   भर लिया हैं!"
     इसलिए रमणिका जी ने स्त्रियों के विषय में पुरुषों द्वारा बनाए गए नियमों के विपक्ष में 'न' कहने का संकल्प कर लिया हैं. यदि पुरुष वर्ग समाज में अपने शक्ति का झंडा लहरा सकता है तो स्त्री क्यों नहीं? स्त्री को पुरुष की नक़ल करके नहीं बल्कि स्त्री रहकर ही अपनी शक्ति का परिचय देना होगा. तभी सही अर्थों में औरत की सही अस्मिता स्थापित हो सकती है-
                                                  "मेरे होने के इजहार के लिए-
                                                   विकल्प
                                                   वजूद का मिटना ही है
                                                   तो मिटूँगी मैं
                                                   पर चाकुओं को हवा में तैरने से-
                                                   रोकूंगी मैं ! रोकूंगी मैं !! रोकूंगी मैं !!!"
      स्त्री विमर्शियों ने यह चुनौती पुरुष दिखाने के लिए नहीं बल्कि पुरुषवर्चस्ववादी सत्ता से मुक्ति पाने के लिए और स्वयं को इंसान की श्रेणी में गिने जाने लिए दी है. क्योंकि "संस्कृति से ऊपर है मनुष्यता, जो स्त्री को अब तक उप्लब्ध नहीं हो सकी है. यदि होती तो दुनियाँ में इतना आतंक नहीं फैलता. स्त्री तो मनुष्य बनने की प्रक्रिया में है, उस और अग्रसर है". इसलिए सदियों से निर्धारित मूल्यों में कवयित्रियों ने परिवर्तन कर मानव मात्र के हितोपयोगी मूल्यों को ही अपनाया. रमणिका गुप्ता के शब्दों में-
                                                 "आज मैं मूल्य बदल दिए हैं-- फिर से
                                                  भले दुनियाँ ने उन्हें नहीं माना.
                                                  मैंने  रिश्ते तोड़ दिए हैं
                                                  ताकि नारीपन की ग्रंथि से मुक्ति पा सकूँ.
                                                  इंसान बन सकूँ."
     निष्कर्षतः कहा जा सकता है कि स्त्री-विमर्श कवयित्रियों ने अपने निर्भीक लेखन और कविताओं में प्रजातांत्रिक मूल्यों समता, समानता और भाईचारा के माध्यम से मानव को मानव समझाने कि मांग की है. उनके सुख-दुःख की  अभिव्यक्ति मात्र उनकी नहीं बल्कि समस्त पीड़ित एवं शोषित वर्गों कि है तथा उनकी 'मैं' शैली विश्व कि समस्त स्त्रियों कि व्यथा को एकता के सूत्र बांधती है. उनकी आत्मनिर्भरता ही उनकी स्वतंत्रतता कि पहली सीधी है, जिसके माध्यम से वे किसी भी तूफ़ान का सामना कर सकती हैं. जिसका प्रत्यक्ष उदाहरण रमणिका गुप्ता हैं. स्वच्छंद विचारों वाली, यायावर , मजदूरों कि मसीहा, समाज-सेविका, स्त्री-विमर्शी कवयित्री, लेखिका, समीक्षक रमणिका गुप्ता समस्त नारी के लिए प्रेरणा स्रोत हैं.

  
 




              
         

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